Sunday, August 24, 2008

बहुत पहले, बहुत बहुत पहले ...........

दोस्तों काफी पहले एक कहानी लिखी थी । छोटी ही थी , पर ख़ुद मुझे बड़ा सुकून दे रही थी । कालांतर में कही खो गई । आज आप सब के लिए उसे एक बार पुनः लिख रहा हू । कृपया अपने सुझाव जरुर देंगे ।


के काफी पहले की बात है । एक सहरा था खूब लंबा खूब चौडा, यानी की काफी बड़ा , उस सहरे के बीच एक रह (दस्त ) गुजरती थी , जिसपर काफी भीतर जा कर एक बस्ती पड़ती थी , बस्ती के काफी आगे तक , और आस पास , दूर दूर तक कोई दूसरी बस्ती नही थी ,

तो बस्ती अपने तनहा वजूद की वजह से बाकी दुनिया से कुछ खास सरोकार नही रखती थी, और दुनिया को किया फिकर पड़ी थी की वो उस बस्ती की जानिब तवज्जो दे , तो बस्ती और उसके लोग अपने में और अपनी रवायतो में मस्त थे, मशगूल थे।

बस्ती की अपनी रवायतो में एक बड़ी अजीब रवायत काफी दिनों से थी, कि साल के सांतवे महीने की दसवी चाँद रात को बस्ती के ठीक बीचोबीच के एक मैदान में, बस्ती के सारे के सारे बूढे और जवान, बच्चे और औरते इक्ट्ठे होते थे और रोते थे, जार जार होकर। के वो ऐसा क्यों करते थे उनमे से किसी को नहीं मालुम था . यहाँ तक के उनकी पीढियों के पहले की पीढियों के काफी बूढे बुजुर्गो को भी इस रवायत की वजह नहीं मालूम थी, पर पीढी दर पीढी, साल दर साल, हरेक साल और साल के सांतवे महीने की दसवी चाँद रात को, ठीक उसी मैदान में पूरी की पूरी बस्ती इकठ्ठी होती और रोया करती जार-जार होकर
यू वक़्त गुजरता रहा और बनी रही ये रवायत भी, पर एक साल ऐसा हुआ की उस रह से गुजर रहे एक राहगीर ने जब की वह उस बस्ती के बगल से गुजर रहा था तो उसने रात के ठिकाने के लिए उस बस्ती को चुना , वो दिन और कोई नहीं बल्कि साल के सांतवे महीने की दसवी चाँद रात था ।
तो जब रात हुई और बस्ती के सारे के सारे मर्द और औरत, के वो चाहे जवान हों या बूढे या फिर बच्चे ही क्यों ना हों, इक्ट्ठे होने लगे बस्ती के ठीक बीचों बीच के मैदान में, तो कुछ वक़त के लिए एक शोर पैदा हों गया, तो वो जो की राहगीर था जो बड़ा जानकर और आलिम आदमी था जब की उसने देखा की पूरी की पूरी बस्ती, बस्ती के बीचों बीच के उस मैदान में इकट्ठी हों रही है, तो वो भी उस मैदान की जानिब चला और मैदान के एक कोने में, के उस सारे इकठ्ठे गाम से थोडी दूरी पर खडा होकर उस सारे तमाशे को देखने लगा

तो अब इकठ्ठे थे सारे के सारे बस्ती वाले मैदान के ठीक बीचों बीच, और फिर उनमे से जो की सबसे जियादा उम्र का था उसने रोना शुरू कर दिया आंसू उसकी बूढी आँखों से निकाल कर उसके गालों पर और फिर चेहरे पर फैलने लगे ,और रोना शुरू हों गया एक एक कर रोने वालो की तायदात बढ़ने लगी और एक वक़्त ऐसा आया की समूची की समूची बस्ती रो रही थी, और फिर हिचकिया पैदा होने लगी, अब लोग हुलक हुलक कर हिचकिया ले ले कर रो रहे थे, के हर तरफ मातम का मंजर था कुछ एक अपने सीने भी पीट रहे थे , और फिर रोते रोते वो पस्त हों गए, अब उनमे रोने का दम नहीं बचा था और वो थके क़दमों अपने घरों को लौट गए, इन सबसे अलग वो राहगीर बडे हैरत से इन सबको देख रहा था और कुछ भी उसकी समझ में नहीं आया ।
तो अगली सुबह उसने बस्ती के सबसे बुजुर्ग से उस रात वाली रवायत की वजह पूछी, एक एक कर उसने सभी बूढे बुजुर्गो से उस रवायत की वजह पूछी पर किसी एक को भी इस रवायत की वजह नहीं मालूम थी ,लिहाज़ा उसके इसरार पर सारे के सारे बस्ती वालों को एक जगह इकठ्ठा किया गया, उस काफी जानकर आदमी ने अपनी बात बडे ही जानदार तरीके से रखी, कि जिस काम की वजह किसी को भी मालूम नहीं क्या उसे यूँ ही इसलिए करते रहना समझदारी कि बात है ,क्योंकि पहले भी साल दर साल ऐसा होता रहा है? तो उसकी बातो पर गौर करते हुए, बस्ती वाले भी इस राय पर पहुचे की यकीनन राहगीर की बात सही है, और फिर सारी की सारी बस्ती ने आपस में मिलकर ये राय कायम की की बेशक ये एक पुरानी और बहुत पुरानी रवायत है, पर इसे जरी रखा जाय इसमें कोई समझदारी नहीं, लिहाज़ा तय ये हुआ की आइन्दा के लिए इस रवायत को छोड़ दिया जाये . और बस्ती वालो ने इस रवायत को ख़तम कर दिया
इस फानी दुनिया का एक ही सबसे बड़ा सच है, की ये दुनिया किसी के भी बगैर चलती रहती है , अपनी रवायत के बगैर भी बस्ती का वक़्त गुजरता रहा, गुजरते रहे साल दर साल और उनके सांतवे महीने और सांतवे महीने की दसवी चाँद रात भी. वक़्त के अक्स चेहरों पर जमा होते है और बच्चो को जवान और जवान से बूढा बना देते है, तो गुजरता रहा वक़्त अपनी रफ्ता रफ्तार से और छोड़ता रहा अपने निसान पीढियों के चेहरों पर, और दो पीढिया गुजर गई, तो उस वक़्त जो बच्चे थे जब की साल दर साल, साल के सांतवे महीने की दसवी चाँद रात को बस्ती के सारे के सारे लोग रोया करते थे वो अब बूढे हों चले थे.....
बस्ती के बूढे हर शाम इकठ्ठे होते थे, बस्ती के उस मैदान में और अपना दुखो-ग़म आपस में बनता करते थे, अक्सर वो काफी रात गए आपस में बाते करते और जैसा की सारी दुनिया में बूढे किया करते है, अपने वक़्त को और अपने बाप दादों की याद करते तो एक बार कि जब रात के वक़्त बस्ती के बूढे इक्ट्ठे हों कर आपस में पुराने वक़्त कि यादें ताज़ा कर रहे थे, तो एक बूढे को ख्याल आया कि ये सांतवे महीने कि दसवी चाँद रात है, उसने याद दिलाया कि कैसे उसके बाप दादे साल दर साल, साल के सांतवे महीने कि दसवी चाँद रात को, जो कि यही रात हुआ करती थी, इसी मैदान पर इक्ट्ठे होकर रोया करते थे जार-जार होकर, तो अब वो याद कर रहे थे अपने पुराने लोगों को और रोये जा रहे थे, रोये जा रहे थे जार जार हों कर।

तो दोस्तों,आज भी उस बस्ती में, उसके ठीक बीचों बीच के मैदान में साल दर साल, साल के सांतवे महीने कि दसवी चाँद रात को, कि सारी कि सारी बस्ती के लोग एकठे होकर रोते है जार जार होकर और याद करते है कि बहुत पहले, बहुत बहुत पहले उनके बडे बुजुर्ग रोया करते थे इसी जगह पर इसी तरह जार जार होकर