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Sunday, March 8, 2015

दुनियाँ तुमपे हँसे तो तुम भी हँसो

 


दुनियां डरपोकों से भरी है, जिनमे डर के पार जाने का साहस नहीं होता, वे अपनी लीक पर जीते जाते है| पर कुछ अपने डर से पार उतरना, सपने देखना, और कोशिश करना जानते है| दुनियाँ के लिए यह हजम करनी कठिन है, कठिन है, अपने डरपोक होने को स्वीकार करना| तो लोग कोशिश करने वालों का मज़ाक उड़ाते है| लिहाजा अपने भय के साथ-साथ दुनियां की हँसी के पार उतर जाना, सफलता पाने कि पहली शर्त है |

तैमूर, एक गड़ेरिया, राजा बनने की बात करता ! लोग ठहाके लगाते उसका मजाक उड़ाते, कभी हुई एक झड़प में तैमूर के पैरों पर लगे तीर ने उसे लंगड़ा कर दिया, लोग मजाक में उसे “लंग” कहते, दुबले, सामान्य काठी के तैमूरलंग के शरीर का दायाँ हिस्सा विकलांग था, पर तब भी तैमूरलंग हिन्दुस्तान के साथ-साथ पश्चिम और मध्य एशिया के एक विशाल साम्राज्य का मालिक बना |

स्वामी विवेकानंद जिनकी वक्तृत्व शैली पर समूचा अमरीका मुग्ध था, यह हमेशा नहीं था, स्वामी विवेकानंद जब शुरू शुरू में अमरीका गए तो लोगों ने उनके पहनावे और जीवन शैली का खूब मजाक उड़ाया, कई जगह उनके वक्तव्य के दौरान उनपे असभ्य टिप्पड़िया भी कि गई, पर इन सारी बातों से स्वामीजी तनिक भी विचलित नहीं हुए, अपने धैर्य कि बदौलत स्वामी विवेकानंद ने अंततः समूचे अमरीका को अपना प्रशंसक बना लिया, जो लोग कभी स्वामी विवेकानंद का मजाक उड़ाते नहीं थकते थे, वे स्वामी विवेकानंद का गुणगान करते नहीं थकते थे |


जर्मनी के वान ने काठ की साइकिल “रनिग मशीन” बनाई तो लोग उसपे खूब हसें थे, जेम्स वाट के भाप-इंजन पर लोग उसे पागल कहने लगे, आइन्स्टीन को करीबी रिश्तेदार तक “भुलक्कड़ और मूर्ख” कहते थे, पर ये सब आज एक सम्मानित नाम है| इनकी नज़र दुनियां कि हँसी पर नहीं, अपने लक्ष्य पर थी |

बेहद निर्धन फ्रेंकलिन, सत्रह भाई-बहन थे, महज दस वर्ष की उम्र में काम कि तलाश में घर त्याग फिलाडेल्फिया चले आये, भूख से व्याकुल फ्रेंकलिन नें तीन रोटियाँ खरीदी, दो बगलों में दाबी और एक खाते, चिथड़े कपड़ों में सड़क पे चले जा रहे थे, एक अमीर की बेटी “देबोरा रीड” ने यह देखा, फटेहाल गवांर फूहड़ लड़के पर वह खिलखिला कर हँस पड़ी, खुद का मजाक देखना फ्रेंकलिन के लिए नई बात नहीं थी, ऐसी बातों से वह निराश नहीं हुए|

उन्होंने कड़ी मेहनत की, लोहे पीटे, बर्तन बनाये, बेकरी पर काम किया, जूते गांठे, लोगों के कपडे धोये और अपना छापाखाना लगाया | अखबार निकाला, किताबे छापी, संगीत कि धुनें बनाई, शिक्षा संस्थान खोले, आविष्कार किये और अमरीका की स्वतंत्रता कि लड़ाई लड़ अमरीका को मुक्त किया, उन्हें “पहला अमरीकन” भी कहते हैं | जो अनिंध सुंदरी “देबोरा रीड” बेंजामिन पर हँसी थी, उसने इस घटना के सात वर्ष बाद बेंजामिन फ्रेंकलिन से स्वयं शादी का प्रस्ताव किया |

कस्बे से लगा, साधकों का आश्रम था, सब एक से लगते| एक दिन कस्बे के बच्चों में सहज जिज्ञासा उठी, कैसे पता चले इनमें सबसे ज्ञानी कौन है ? एक बूढ़े ने बच्चों से कहा यह जानने का सबसे आसान तरीका साधकों का मजाक उड़ाना है, अतः अगले दिन से बच्चे साधको को देखते ही उनपे हँसने लगते|

बच्चों की मजाकिया हँसी कुछ साधकों को नागवार लगती, कुछ साधक निरपेक्ष रहते, कुछ बच्चों को भगाते, एकाध मुस्कुरा भी देते पर एक साधक बच्चों के मजाक पर उनके साथ ठहाके लगाने लगा, अब बच्चे उसके साथ वाकई ठहाका लगा लगा कर हँसने लगे | कस्बे को सबसे ज्ञानी साधक का पता चल चुका था |
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कश्यप किशोर मिश्र

दैनिक भास्कर- रसरंग में प्रकाशन का लिंक :- दुनियाँ तुम पे हँसे तो तुम भी हँसो

Sunday, December 14, 2014

दुःख तो दुःख होता है


आज के तेज रफ़्तार समय में, एक जान पर वक़्त देना फिजूल लगता है, यह बात एक बैंकर को भी फिजूल ही लगी थी, जब काम से वापिस लौटते मोहल्ले के चौराहे पर जमा भीड़ ने उसकी कार रोक मदद की गुहार लगाईं, किसी लड़के को सड़क-दुर्घटना में चोट आई थी और उसे अस्पताल ले जाना था, पर वह बहाना बना आगे बढ़ लिया, उसने मन ही मन सोचा “रोज ही का किस्सा बन गया है, यह सब” पर दुर्भाग्य से जिस लड़के के साथ यह दुर्घटना हुई थी, वह उसकी ही इकलौती संतान था, जिसकी समय से अस्पताल न पहुच पाने की वजह से मौत हो गई | रोजमर्रा की, सड़को पर होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं, जिन्हें वह देखा-अनदेखा किया करता था, उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी | 
  
आज के समाज का तानाबाना “न्यूनतम संसाधन से अधिकतम लाभ” अर्जित करने की आर्थिक सोच से इतना अधिक प्रभावित है, कि जीवन का मूल्य भी इकाई दहाई सैकड़े की गिनती से तय होने लगा है, ऐसे में किसी एक अकेले आदमी की जरूरते, ख़ुशी दुःख परेशानिया बहुतों की जरूरतों खुशियों दुःख और परेशानियों के सापेक्ष गौण हो जाती हैं, पर इससे उस अकेले आदमी की पीड़ा परेशानी या ज़रूरत महत्वहीन नहीं हो जाती |

भूख सौ लोगों की मिटे या एक आदमी की पर जिसे भोजन मिला उसके लिए यह बड़ी बात होती है, मौत एक आदमी की हो, या सौ आदमियों की, पर जो मर गया, उसके लिए सबकुछ ख़तम हो जाता है| यह बात मानवीय समझ का सहज हिस्सा है, पर परपीड़ा का आकलन जब संख्या के हिसाब से किया जाने लगे तो इसका आशय यह निकलता है, कि समाज से रफूगर कम हो रहे है | छोटी-छोटी घटनाओं, एक अकेले आदमी की पीड़ा, उसकी टूटन की रफू कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की रफूगरी, हमारा समाज भूलता जा रहा है |

आज के दौर में, हम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार करते है, हमारी प्रतिक्रिता किसी बड़ी घटना पर होती है, हमारी संवेदना किसी बड़ी घटना पर जाग्रत होती है | भयानक बाढ़ में पांच सौ लोगों की मौत से हम करुणा से भर उठते है, अपने वेतन से कटा कर पैसा भी भेजते हैं जबकि पड़ोस में सड़क की पटरी पर ठण्ड से मर गए भिखारी पर हमारी करुणा नहीं जगती, हांलाकि बस एक कंबल उसकी जान बचा सकता था | व्यक्तिगत पीड़ा और सुख दुःख की सहज समझ बच्चो में मौजूद है, पर आदमी अपनी समझदारी में इस सहज समझ को भूलता जा रहा है|

वैसे ही जैसे, उतर चुके ज्वार के बाद समंदर की रेत पर फंसी तड़फड़ा रहीं खूब सारी मछलियों के बीच, एक छोटा बच्चा एक-एक मछली उठाता और पानी में फेंकता जा रहा था | एक आदमी ने बच्चे को टोका, “यहाँ हजारो मछलियाँ मर रही है, उनमें से पचास सौ को बचा लेने से क्या होगा” बच्चे ने हाथ में पकड़ी तड़फड़ा रहीं मछली को देखते हुए कहा “कम से कम यह मछली जिन्दा रहेगी और इस मछली के लिए यह बहुत बड़ी बात है”|  

इस आलेख का प्रकाशित लिंक ;- दुःख तो दुःख होता है
भास्कर रसरंग का पृष्ठ लिंक ;- भास्कर रसरंग 14-दिसंबर-2014, पृष्ठ 2 एवं 3

Sunday, October 19, 2014

अपने अपने राम-अपने अपने दीप























अज्ञान के अंधकार सी सघन, अमावस की गहन काली रात, कार्तिक माह में रूपवती नारी सी दिखती है, ढलती शाम के साथ-साथ एक एक दीप जलते हैं और अमावस दीपावली में बदल जाती है | साल की सबसे काली रात, साल की सबसे सुन्दर प्रकाशपूर्ण-पर्व बन जाती है, दुनिया भर के मिथकों और परम्पराओं से इतर यह मनुष्य के सामूहिक प्रयास से गहन से गहन अन्धकार पर विजय प्राप्त कर उसे “प्रकाशोत्सव” में तब्दील करने के विजयघोष की रात होती है |

एक प्रतीक के तौर पर दीपावली एक पर्व उत्सव या त्यौहार की बजाय मनुष्य की सामुदायिकता और निरंतरता के जरिये असंभव को संभव बना देने का प्रतीक है, एक ऐसा प्रतीक जिसमे समाज के हर एक प्रत्येक इकाई का योगदान होना है, यह योगदान एक दीपक का भी हो सकता है और जगमग दीपों की तमाम श्रृखला का भी, पर जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि मनुष्य का सामूहिक प्रयत्न प्रकृति के अत्यंत निष्ठुर स्वरुप को भी कोमल सुन्दर भाव में बदल देने में सक्षम है |

दीपावली का दीप गहन काले अन्धकार में “तमसो माऽ ज्योतिर्गमय” का प्रतीक है, यह प्रतीक है ज्ञान के आलोक की | जिस आलोक से प्रदीप्त राम काले होते हुए भी काले न दीख, भक्ति और ज्ञान की गहन नील गहराई की आभा से युक्त नीलाभ दिखते है | राम प्रतीक है, आदमीयत के | राम प्रतीक है, मनुष्यता के उन भावों के जिनके न रहने से “गौरवर्णा” तमामो तमाम विधाओ का ज्ञाता महान पराक्रमी और महान ज्ञानी ऋषि विश्वेश्रवा का पुत्र दशानन, रुक्ष राक्षस रावण बन जाता है |
राम प्रेम करना जानते हैं, विरह-व्याकुल हो सकते है, भाई के घायल होने पर आर्तनाद कर सकते है, पिता की मृत्यु सुन अशांत हो सकते है | राम कोमल है, कोमलता से अपनी पत्नी का श्रृगार कर सकते है, पर्ण कुटीर बना सकते है, सबरी के जूठे बेर खा सकते है, केवट के प्रेम को समझ उसका आलिंगन कर सकते है | राम सतत चिरंतन चलते रहने वाले, ज्ञान-पथ के पथिक हैं, सीखते जाते हैं | राम को पता हैं, रणभूमि में आसन्न मृत्यु के करीब पड़ा रावण, महान पंडित है लिहाजा “क्षत्रिय-राम” “क्षात्र-राम” बन लक्ष्मण को रावण के पास भेज सकते है | दीपावली राम के उस सहज मनुष्य रूप की स्मृति का पर्व है | मनुष्य के निरंतर सीखते-सुधार करते, ज्ञान के पथ पे चलते जाने का पर्व है | एक मनुष्य के मनुष्यता की मर्यादानुकूल आचरण करते हुए “उत्तमोत्तम” होते जाने की प्रक्रिया की सामाजिक वैद्यता का पर्व है |

रावण महान पंडित है, पर सत्य सुनने का उसे साहस नहीं, वह गर्वोन्मत्त है, मनुष्य को अत्यंत तुच्छ समझता है, विरोध की सिमित संभावना पर भी किसी को बंदी बना सकता है, सहज ही वध करना उसका स्वभाव है, नारी उसके लिए वस्तु है, रिश्ते-नाते युद्ध के पांसे| रावण परम प्रतापी है, महान पंडित है पर वह “क्षात्र-रावण” से पूर्णत: “क्षत्रिय-रावण” में बदल गया है| रावण रुक गया है, वह ज्ञान की राह का पथिक नहीं रहा, उसे ख़ुद पर अभिमान हो चुका है | दीपावली “उत्तमोत्तम-पुरुष” रावण के “क्षात्र-भाव” को त्याग “क्षत्र-गर्व” में उन्मत्त राक्षस हो जाने का चेत-पर्व है | “जन्मना श्रेष्ठ रावण” पर “कर्मणा श्रेष्ठ राम के” अभ्युदय की प्रक्रिया के सामाजिक वैद्यता का पर्व है |

दीपावली एक व्यक्ति के लिए सामाजिक सरोकारों के प्रति व्यक्तिगत जबाबदेही और जुडाव का भी पर्व है | यह पर्व है, चिरंतन भाव का | राम आ रहे हैं, सभी राम के आने की राह देखते साफ़-सफाई में लगे दीप जलाने की तैयारियों में हैं |
राम के आने की दिशा के एकदम विपरीत, सूदूर सरयू-तट पर एक बूढे मल्लाह ने घाट की सफाई की, बाती बनाई, मृदु-मिट्टी के दीप बनाये और उन्हें जला दिया |
कोई पथिक पूछ बैठा “यह तो राम के आने का रास्ता नहीं” मल्लाह ने कहा “ मेरे राम के आने का रास्ता मेरे ह्रदय से होकर गुजरता है |”


दीपावली अपने अपने राम-अपने अपने दीप के भाव का पर्व है |   

प्रकाशित लेख का PDF लिंक ;- अपने अपने राम अपने अपने दीप

प्रकाशित लेख का लिंक :- अपने अपने राम अपने अपने दीप

Sunday, July 20, 2014

हर दिल अजीज़ "अज़ीम प्रेमजी "



अजीम हाशिम प्रेमजी का जन्म 24-जुलाई-1945 को बम्बई में हुआ था, विप्रो कारपोरेशन के अध्यक्ष अज़ीम भारतीय कार्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े दानकर्ता हैं, अबतक वो अपनी एक चौथाई से जादा संपत्ति दान कर चुके हैं    
स्टेनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग स्नातक कर रहे 21 साल के युवा अजीम प्रेमजी की पढ़ाई अभी बाकी थी, जब नियति ने उनकी सहज जीवन की राह बंद कर दी, पिता की मौत के साथ अज़ीम के पास विकल्प सिमित थे | पढ़ाई पूरी न कर पाने की कसक के साथ युवा अजीम ने अमरीका से वतन वापसी की और वनस्पति तेल के अपने पारिवारिक व्यवसाय की बागडोर थाम ली| 1966 में अजीम ने जब अपने व्यवसाय की बागडोर थामी तो उसका सालाना व्यवसाय 2 मिलियन डालर था, अजीम चाहते तो बड़ी आसानी से अपने व्यवसाय को दुनियादारी से चला सकते थे, पर प्रेमजी को आरामतलबी और समझौतापरस्ती स्वीकार नहीं थी|
भारत उस वक्त कोटे परमिट राज में था, जहाँ पामोलिन आयल जैसी आम जरूरत की वस्तु का कोटा भी देखते देखते आदमी को धनवान बना सकता था, पर अज़ीम प्रेमजी ने अलग राह चुनी, नौकरशाहों की खुशामद करने की बजाय अपने धंधे के गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित किया | उस वक़्त अचरज की बात थी, कि  इस स्तर पर कोई व्यवसायी नौकरशाही को खुश कर परमिट या लाइसेंस में अपना वक़्त जाया करने की बजाय, सीधे सीधे अपने ग्राहकों को उनकी अपेक्षा से भी बेहतर माल देने, ग्राहक और उत्पादक के बीच कम से कम बिचौलियों के जरिये, सबको जादा मुनाफा के सिधांत के साथ बाजार में उतर रहा हो|
पर अजीम को यहीं नहीं रुकना था, उन्होंने अपने व्यापार का प्रबंधन पूरीतरह पेशेवर रवैये से किया और देश के सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन और इंजीनिरिंग स्नातको को नौकरी पर रखा| आज भी जब भारत के तमाम कार्पोरेट घराने पारिवारिक प्रबंधन से संचालित होते हैं, तो सत्तर के दशक के भारत में यह बहुत बड़ी बात थी, जिसके साथ बहुत बड़ा जोखिम भी जुड़ा था, पर अजीम तो सबकुछ सिर्फ और सिर्फ “उत्कृष्ट” चाहते थे, अपने भावों को शब्द देते उन्होंने कहा भी “उत्कृष्टता सिर्फ दिमाग से नहीं, बल्कि दिल और आत्मा से भी सोचो तब आती है”
अजीम के लिए व्यवसाय दिमाग से नहीं दिल और आत्मा से होता था, जहाँ कठिनाइयों नजर नहीं आती नज़रों में बस अपने आदर्स बसे होते है, यही वजह थी कि 1979 में जब कंपूटर मशीन की दिग्गज कंपनी आईबीएम् को भारत छोड़ना पड़ा तो उससे उपजे शून्य को भरने के लिए अजीम की “विप्रो कारपोरेशन” ने वनस्पति तेल के धंधे से कंपूटर निर्मार्ण में छलांग लगा दी | अजीम का यह निर्णय इतनी बड़ी बात था कि भारत में विप्रो कारपोरेशन के विकास की कहानी कंपूटर उद्योग के विकास की कहानी है |
दो मिलियन डालर के सालाना धंधे से शुरुआत करते हुए आज अजीम की कंपनी का व्यवसाय 8 बिलियन डालर सालाना का है, पर आज भी अज़ीम और उनकी कसक जस की तस है, बेशक अजीम अपनी पढाई अधूरी छोड़ने को मजबूर हुए पर 2 मिलियन की हजार गुनी रकम अर्थात 2 बिलियन डालर की रकम अज़ीम प्रेमजी ने बच्चो की पढ़ाई से जुड़े कार्यो के लिए 2010 में दान की, अज़ीम प्रेमजी की कसक अभी बाकी है, उनकी जिंदगी लम्बी चले यह दुआ है |
अजीम के जीवन की रोचक बातें :
·         अजीम का परिवार गुजरात के कच्छ इलाके से है, ये इस्माइली मुसलमान है |
·         अजीम के पिता को बंटवारे के वक़्त जिन्ना ने पाकिस्तान में बसने औए वहां के वित्तमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे अजीम के पिता एम एच प्रेमजी ने नकार दिया
·         अजीम के दादा एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे, उन्हें “बर्मा का राइस किंग” भी कहा जाता है
·         1999 से 2005 तक लगातार छः वर्ष तक फ़ोर्ब्स के अनुसार अज़ीम सबसे अमीर भारतीय थे
·         दुनिया के साठ देशो में विप्रो का कारोबार फैला है, जिसमे डेढ़ लाख कर्मचारी है
·         “विप्रो” ब्रांड “वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्टस लिमिटेड” का संक्षित नाम है
·         2013 तक अजीम अपनी कुल संपत्ति का एक चौथाई दान कर चुके है    
·         “टाइम” पत्रिका द्वारा अज़ीम को दो बार, 2004 और 2011 में, दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया जा चुका है, “एशियावीक” ने 2000 में उन्हें दुनिया के सर्वाधिक प्रभावी बीस लोगों में शुमार किया
·         अज़ीम जीवन में सादगी को महत्वपूर्ण मानते है और हवाई यात्राए “मितव्ययी श्रेणी” अर्थात इकोनामी क्लास में करते है, किसी शहर में अगर उनकी कंपनी का गेस्टहाउस हो तो होटल की बजाय गेस्टहाउस में रुकना पसंद करते हैं
·         शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन भारत के सात राज्यों के तीन लाख से जादा स्कूलों में कार्यरत है  
सम्मान और पुरस्कार :
·         2005 में पदम् भूषण भारत सरकार द्वारा
·         2011 में पदम् विभूषण भारत सरकार द्वारा
·         फैराडे मेडल पाने वाले पहले भारतीय
·         “लीजन ऑफ़ आनर” फ़्रांस की सरकार द्वारा 
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कश्यप किशोर मिश्र 

Tuesday, June 3, 2014

एक आम आदमी का ख़त, प्रधानमंत्री के नाम

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी जी,

इस देश के एक नागरिक के तौर पर मै अपने प्रधानमंत्री को, उनके निर्वाचन पर बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ, वह यकीनी तौर पर, किसी व्यक्ति, जाति, राज्य या सम्प्रदाय के प्रधानमंत्री न होकर, पूरे मुल्क के प्रधानमंत्री होंगे और एक भारतवासी के तौर पर हमें अपना सर गर्व से ऊँचा रखने का मौका प्रदान करेगे, कि हमने जिस व्यक्ति को अपने प्रधानमंत्री के रूप में निर्वाचित किया है, वह लोकतंत्र की हमारी अधूरी समझ का नतीजा नहीं है, बल्कि भारत का मतदाता और लोकतंत्र समय के साथ-साथ परिक्व हो चुका है और उसके चयन में, समय के साथ-साथ खामियां कम से कमतर होती जा रही है|

प्रधानमंत्री जी, आपने अपने संसदीय क्षेत्र के रूप में दुनिया के सर्वाधिक प्राचीन शहर बनारस का चयन कर, हमारे भीतर एक उम्मीद की लौ जगाई कि आपके बनारस का चयन करने के पीछे की वजह, इसका महज एक संसदीय क्षेत्र न होकर, मानवता की सतत जिजीविषा के प्रतीक रहे शहर के साथ जुड़ने की चाह भी रही होगी| एक ऐसा शहर जो सतत-निरंतर अनादी काल से मानव-सभ्यता के उत्थान-पतन के साथ साथ अविचल रूप से जुड़ा रहा| बनारस सिर्फ एक शहर, संस्कृति या समाज नहीं है, बल्कि उससे जादा एक भाव है| हमें उम्मीद है मनुष्य जाति के सतत-निरंतर अविचल शंघर्ष के भाव, बनारस को चुनने के पीछे, आपकी वजह यही रही होगी|

आपने यह कह कर हमें उद्धेलित कर दिया कि आपको
“माँ गंगा ने बुलाया है” एक माँ का ह्रदय अपने बच्चो को सदैव ही बुलाता रहता है, आपने माँ गंगा की पुकार सुनी, उनका ख्याल किया हम इसके आभारी है|

प्रधानमंत्री महोदय, संसद में प्रवेश करने के पूर्व जब आपने संसद की सीढ़ियों पर अपना माथा टिकाया, तो आपने इस देश की सवा अरब आबादी के लोकतान्त्रिक अधिकारों की उम्मीद पर भी एक टेक लगाईं| आपके लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों पर सादर माथा टिकाने ने, हमें आश्वस्त किया कि हमारा प्रधानमंत्री, इस देश के किसी भी नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार को अपनी टेक देगा, भले ही इसके लिए एक व्यक्ति के तौर पर नरेंद्र भाई मोदी को झुकना भी क्यों न पड़े, लोकतंत्र को दी गई इस प्रतीकात्मक टेक पर हमने बड़े गर्व से अपने भारत के प्रधानमंत्री को देखा, सराहा|

शपथ के पूर्व आपका गाँधी समाधि पर जाना और महात्मा गाँधी को श्रध्दा-सुमन अर्पित करना, उन गांधीवादी मूल्यों को पुनः वैद्यता प्रदान करना था, जिसका आधार समरसता, सहिष्णुता, समानता, बंधुत्व और समदृष्टि जैसे भाव होते है| हम यह यकीन करते है, कि सत्य के इन आधारभूत मूल्यों का सम्मान करने को आप सतत सजग रहेगें|

प्रधानमंत्री जी, निश्चय ही देश की जनता, जनतांत्रिक प्रतीकों से प्रभावित होती है और अपने नायकों के समान आचरण की कोशिश भी करती है, लिहाजा यह जरूरी हो जाता है कि अपने निर्वाचन के पूर्व, दौरान और ठीक बाद एक निर्वाचित शासक जिन जनतांत्रिक प्रतीकों और मूल्यों का प्रतीक रूप में इस्तेमाल करता हो, उन्हें अपने शासन के दौरान अपने व्यवहार में भी अमल करता हो| ऐसा होने पर न सिर्फ उस शासक पर जनता की निष्ठा बलवती होती है, बल्कि एक नागरिक के तौर पर ऐसे राष्ट्र के नागरिकों के आचरण में भी जनतांत्रिक मूल्यों के सम्मान की भावना बलवती होती है|

लिहाजा जनतांत्रिक प्रतीकों के सांकेतिक सम्मान के पश्चात आचरण से भी तदनुरूप ही जनतांत्रिक मूल्यों का संवर्धन करना, किसी देश के नागरिको के आचरण में भी गुणात्मक वृद्धि करता है|

प्रधानमंत्री जी, दुनियां के सबसे बड़े जनतांत्रिक मुल्क का नागरिक होने के बाद भी, बीते चौदह बरस से एक महिला ख़ामोशी से, बड़े ही लोकतान्त्रिक तरीके से अपने लोकतान्त्रिक हक़ के लिए सत्याग्रह रत है| यह आश्चर्य की बात है कि एक महान लोकतंत्र होने का दावा करने वाले हमारे मुल्क में, बीते चौदह बरस से, एक औरत जो बेहद विनम्रता से अपनी बात कहना चाहती है और सत्याग्रह कर रही है, उसकी बात कोई सुन ही नहीं रहा| इस देश की एक नागरिक बड़ी ही विनम्रता से अपनी बात कहना चाहती है और इसके लिए उसके सत्याग्रह की, इस मुल्क के शासक वर्ग में, कही भी कुछ भी कोई पूछ ही नहीं है|

आमरण अनशन पर बैठी एक महिला के इरादों का दमन करने को बड़े ही पाशविक जतन किये गए| कोशिशे होती रही वह थक-हार कर टूट जाए पर बजाय टूट जाने के वह महिला मानवता की सतत जिजीविषा की प्रतीक-बनारस बन गई| इस महिला ने टूटने से इन्कार कर दिया, इसे जबरजस्ती नाक में नली के जरिये तरल पदार्थ देकर, इसका अनशन तोड़ने की कोशिश हुई, पर यह महिला, इस महान मुल्क की महान मातृशक्ति का प्रतीक बन अड़ गई| इसका अनशन सिर्फ अपने लिए थोड़े था, यह तो मणिपुर, जो इसका गृहराज्य है, के बच्चे-बच्चे के लिए था, यह मणिपुर की आवाज बनारस बन गई, इसने टूटने से इन्कार कर दिया, अविचल हो गई| यह एक शरीर से एक भाव बन गई, सम्पूर्ण मणिपुर के जनतांत्रिक अधिकार की मांग का भाव, यह मणिपुर में बनारस बन गई|

प्रधानमंत्री जी, यह महिला कविताएँ लिखती थी, जिसमे भावों की लहर बनती बिगड़ती दिखती, गंगा की लहरों की ही तरह| इसका मन एक माँ का मन था, कोमल और सबको प्यार करने वाला, यह जीवनदायनी भावों से अभिप्रेरित थी, गंगा की तरह ही| इसका ह्रदय भी अपने बच्चो को पुकारता था, जैसे माँ गंगा ने आपको पुकारा था, पर दुर्भाग्य से इस माँ के बच्चो में से तमाम बच्चे, निरपराध ही, बस शक के आधार पर, सेना द्वारा मार दिए गए| इस माँ के तमाम बच्चे, अपनी माँ की पुकार सुनने को बचे ही नहीं थे| 

इस माँ की तमाम बेटियों ने बलत्कृत हो आत्महत्या कर ली| प्रधानमंत्री जी, जिस माँ की बेटियाँ बलत्कृत हो जाये उसके लिए कुछ बचा नहीं रह जाता, वो नंगी हो जाती है, शरेआम| 15-जुलाई-2004 की दोपहर जो घरेलू औरते “भारतीय सेना आओ हमारा बलात्कार करो” का नारा लगाते और यही नारे लिखे परचम लहराते असम राइफल्स के मुख्यालय पर एकदम नगी खड़ी हुई, वो इस आमरण-अनशन पर बैठी महिला के भाव की सामूहिक अभिव्यक्ति मात्र न होकर, नग्न खड़ी हमारी भारत माँ भी थी| आजाद भारत के लिए यह सबसे शर्मशार करने वाली बात थी, जब इस मुल्क की जननी अपने जनों के सामने नग्न खड़ी थी, “आओं हमारा बलात्कार करो” कहते पर न उन औरतो की आवाज सुनी गई न गंगा बन सत्याग्रह कर रही इस महिला की आवाज सुनी गई|

प्रधानमंत्री जी, इस महिला के सवाल बड़े सरल है, उदार मन से, ईमानदारी पूर्वक इन्हें सुना जाए तो इनका जबाब इस मुल्क के एक बच्चे के पास भी है, बस नियत में खोट न हो| यह औरत जानना चाहती है, भला वह कौन सा जनतंत्र है, जो बस शक के आधार पर अपने नागरिको के एक तबके को गोलियों से भून देने वाली सेना पर कोई सवाल न उठाने का विशेषाधिकार देता है| प्रधानमंत्री जी, यक़ीनन किसी मुल्क में, उसके शासको का जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान होता है, पर उससे महत्वपूर्ण वह नागरिक चेतना होती है जो जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरक्षण को अपनी टेक देती है| लिहाजा जब आप संसद भवन की सीढ़ियों पर अपना शीश टिका, इस देश के किसी भी नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार को अपनी टेक दे रहे थे, तो आपकी टेक के साथ एक टेक इस सत्याग्रही मणिपुरी महिला की भी थी|

प्रधानमंत्री जी, यह महिला आंदोलनरत है, आमरण अनशन पर है, पर अपनी बात कड़े लहजे में कहने से इन्कार करती है, अपने सत्याग्रह के जरिये यह कोई भी अराजकता नहीं पहुचाना चाहती, अपने आन्दोलन से यह किसी को कष्ट या ठेस भी नहीं पहुचाना चाहती, किसी को सजा दिलवाना भी, इस महिला के अनशन का उद्देश्य नहीं है, बल्कि किसी को उसकी वजह से कोई कष्ट या नुकसान ना हो, इसका ध्यान रखना, इस दशा में भी, वह अपना दायित्व समझती है| प्रधानमंत्री जी, गाँधी जी की आत्मा का वास उनकी समाधि पर हो न हो, पर हमारे देश की इस महान माँ में बापू की आत्मा का वास अवश्य है |

प्रधानमंत्री जी, जरा सोचिये! आपके निर्वाचन के दौरान चुने गए समूचे जनतांत्रिक प्रतीकों को यह एक अकेली महिला जिसे हम “शर्मिला ईरोम” के नाम से जानते है, अपनी करनी में धारण करती है, प्रतीकात्मक संकेतो के बाद अब वक्त इन संकेतो को अपने आचरण में उतारने का आ गया है, हम भारत के लोग बड़ी उम्मीद से आपसे आस लगाये बैठे है, आप इस महिला की बात जरूर सुनेगे और बीते चौदह बरस से, एक महान जनतंत्र के नागरिक के तौर पर, हम जिस शर्मनाक सवाल से अहर्निश रु-ब-रु है, उससे हमें मुक्ति दिलायेगे |


एक नागरिक के तौर पर हम सम्मान महसूस करें, इसके लिए हमें आपसे बड़ी आशा है |

इस देश का एक आम नागरिक

कश्यप किशोर मिश्र  

Sunday, May 25, 2014

जिन्होंने बुलंद हौसलों से दी अक्षमता को मात

वीरान रेगिस्तान में दो दरवेस बैठे बात कर रहे थे, दूर-दूर तक फैले वीराने को देखते हुए पहले दरवेस ने लम्बी साँस भरी और कहा, कितना वीरान है यहाँ सबकुछ| दूसरा दरवेस जो बुजुर्ग था, वह उन पत्थरों को उललने-पुलटने लगा, जिसपर वो बैठे थे, रात की ओस पत्थरों की तली में मौजूद थी, एक पत्थर के तले एक अंकुरित बीज दिखा, बुजुर्ग दरवेस ने उसे दिखाते हुए कहा “यह देखो, यहाँ जीवन है”|

आदमी का अपना दृष्टिकोण उसकी जीवन दृष्टि तय करता है, एक ऐसा आदमी जो अपने शरीर का कोई भी हिस्सा नहीं हिला सकता, कोई इशारा नहीं कर सकता, कुछ बोल नहीं सकता, कुछ खा पी नहीं सकता, इसके बाद भी, हार मानने से इन्कार करता है और दुनिया उसे ब्रह्माण्ड की जटिल गुत्थिया सुलझाने वाले शख्स “स्टीफन हाकिंग” के नाम से पहचानती है| हाकिंग की लिखी किताब “अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम’ की एक करोड़ से जादा प्रतियां बीस वर्षो के भीतर बिक चुकी है, हाकिंग थमे नहीं है, उनकी जीवन यात्रा सतत जारी है|

एक ऐसा मनोरोगी जिसे भ्रम होता हो कि कोई उससे बात कर रहा है, वह यह समझ ही नहीं पाए कि सामने जो आदमी खड़ा है, वो असल में खड़ा है अथवा मनोविकार की वजह से उसका भ्रम है| एक ऐसा आदमी जो अपने दिमाग में विकार के वजह से, जो नहीं है, उन्हें भी उसी तरह देखता समझता हो जैसे असल दुनिया को देखता समझता हो और इस पागलपन की वजह से महज इकतीस वर्ष की उम्र में ईलाज के लिए पागलखाने भेज दिया गया हो, जीवन से हार मान लेने से इन्कार कर देता है, ग्यारह साल बाद वह पागलखाने से बाहर आता है और दुनियाँ को एक से एक गणितीय और आर्थिक सिधांत देता है और “नोबेल पुरस्कार” प्राप्त करता है, दुनियाँ “जॉन नैश” को आज उसके ढेर सारे गणितीय और अर्थशास्त्र के सूत्रों की वजह से जानती है|

कुँए की पथरीली सिल पर रस्सी बार-बार ऊपर-नीचे आती-जाती है, यह सतत-निरंतर प्रक्रिया पत्थर को घिस देती है, पथरीली जगत पर रस्सी के निशान बन जाते है, दुनियाँ ऐसे लोगो से भरी पड़ी है, जिनकी उपलब्धियां “रस्सी से पत्थर की जगत पर पड़े निशान” की तरह सतत प्रयास का नतीजा है|

हम थामस एडिसन को जानते है, जो बहरा था पर बहरापन उसके लिए अवरोध नहीं बन सका | एक नया धर्म चलाने वाले, सम्पूर्ण भारत में अपना विशाल साम्राज्य बनाने वाले, जमीनों की ठीक ठीक पैमाईस की व्यवस्था करने वाला अकबर पूरी तरह अनपढ़ था, पर लिखना-पढ़ना न जानना भी, कभी उसके लिए बाधा नहीं बन सका|
जरा कल्पना करिए उस संगीतकार की जिसका संगीत सुनकर श्रोता अपने भाव पर नियंत्रण न रख सके, एक तरफ जिसकी धुनों की उदासी सुननेवाले को रुला दे, तो दूसरी तरफ़ उसके संगीत का उल्लास, उदासी भरे माहौल में भी लोगो को नृत्य करने को मजबूर कर दे, बीती दो शताब्दियों से जादा वक्त से अपने संगीत से दुनिया को अभिभूत करने वाला संगीतकार लुडविग बीथोवन ख़ुद अपना संगीत सुनने में असमर्थ  था, पर उसका बहरापन उसकी बाधा नहीं बन सका|
जीवन वही है, जैसा उसे हम देखते है, जैसा उसे हम बनाते है, मन के हारे हार, मन के जीते जीत है |

Sunday, April 20, 2014

बहार ...एक दिन में नहीं आती


बहार एक दिन में नहीं आती...

Rasrang|Apr 20, 2014, 04:00AM IST

वायु गतिकी के लिहाज से भवरे के शरीर की बनावट इतनी बेडौल और वजन ऐसा होता है, कि उसे किसी भी लिहाज से उड़ने में सक्षम नहीं होना चाहिए| पर वायु-गतिकी के किसी भी नियम से परे, भंवरा न सिर्फ खूब उड़ता है, बल्कि फूलो के ऊपर उड़ते हुए हवा में एक जगह रुक भी जाता है|
महान वैज्ञानिक थामस एडिसन, विद्यालय में महज तीन महीने ही नियमित रूप से पढ़ पाए, वो ऊँचा सुनते थे और बच्चो के बीच उनकी हरकते मूर्खता भरी लगती थी, वो अपने अध्यापको का कहा नहीं सुन पाते थे, एक दिन वह अपनी शिक्षिका के एक नोट के साथ लौटे जो उनकी माँ के लिए था “आप का बेटा बेवकूफ है, इसे स्कूल से निकाल दीजिये” माँ ने तय किया अपने बेटे को वह खुद पढ़ाएगी | आज हम जिस एडिसन को जानते है, उसके नाम हजार से भी जादा वस्तुओ के पेटेन्ट दर्ज है| मूर्खो सी हरकत करने वाला यह बालक कितना दृढ़ था, यह इस बात से पता चलता है, कि सन 1914 में जब एडिसन की फैक्ट्री जल कर राख हो गयी, तो अपनी जीवन भर की जमा-पूँजी को राख होते देख उन्होंने कहा था “विनाश की भी एक सार्थकता होती है। फैक्ट्री के साथ हमारी अतीत की सारी गलतियाँ भी जल गयी| अब हम नई शुरुआत करेगे” और महज तीन हफ्तों के अन्दर उनका फोन का आविष्कार दुनिया के सामने था|

अंधो के लिए इस्तेमाल होने वाली ब्रेल लिपि का आविष्कार करने वाले, लुई ब्रेल ख़ुद भी जन्मजात नेत्र-हीन थे| कृष्ण की बाल लीलाओं का भावप्रण वर्णन करने वाले सूरदास भी नेत्रहीन ही थे|
लुई ब्रेल की लिपि का बड़ा माखौल उड़ाया गया, पर दुनिया भर के नेत्रहीन आज ब्रेल लिपि की बदौलत पढने में सक्षम है तो दूसरी तरफ सूरदास के अंधी आँखों से किये वात्सल्य वर्णन का मुकाबला शायद ही कोई कर सके| 
ऐसे कई उदाहरण हैं, जो बताते है, कि मनुष्य की इक्छा-शक्ति किसी भी अवरोध को नकारती है| यह अवरोध अज्ञान का हो, भय का हो, दुर्जेयता का हो, या अगम्य, अलघ्य होने का हो|

मनुष्य अपनी इक्षा-शक्ति के बूते असंभव से दीखते वाले कार्य कर जाता है, वरना थोर हैरदोल के पहले किसने सोचा भी होगा, कि सरकंडे से बनी नाव से, समूचा अंध-महासागर पार किया जा सकता है|
धीरूभाई अम्बानी महज चौथी तक पढ़े थे, पर अपनी मौत के पहले वो दुनिया के शीर्ष उद्योगपतियों में शुमार थे|

अब्राहम लिंकन, अमरीका के राष्ट्रपति बनने के पहले, न सिर्फ अपनी वकालत में असफल साबित हुए, बल्कि राष्ट्रपति चुनाव के पहले, लिंकन ने जीवन भर, जितने भी चुनाव लडे, सबमे उन्होंने पराजय ही झेली| पर जीवन भर अच्छा करने के जुनून से अभिप्रेरित रहे|
जीवन लगातार कोशिश करते रहने का और अच्छा करते रहने का नाम है| जरूरी नहीं नतीजा तुरत ही निकल आये, जरुरी नहीं नतीजा हमारी मेहनत के सापेक्ष परिणाम लेकर आये पर यह ज़रूरी है, हम हार न माने, हमारी कोशिश जारी रहे |
कोई भी सुगंध, जो किसी फूल से पैदा होती है, वह किसी सूखे फूल या फल के बीज से शुरू होकर, मिट्टी में एक अरसे दबे रहने के बाद, उगने, बढ़ने, फलने, फूलने के बाद अपनी खुशबू के साथ बाहर आती है| पहले फूल और फिर ढेर सारे फूलों के बीच का अंतराल बड़ा थोड़ा होता है, खुशबू और बाहर से भरपूर लहलहाते फूलों की सुरभि के बीच, बीज से पहली कली के लम्बे अंतराल का शंघर्ष सहज ही दिखाई नहीं देता, नहीं दीखता है वह जतन भी, जो बीज से होता हुआ कली तक पहुचने के बीच किया जाता है|
सहज और सच्चे अर्थो में जीवन इसी जतन से करते रहने का नाम है, जीवन करते रहने और अनुभूत करने का नाम है, जब हम अच्छा करते है, हमें भला महसूस होता है| जब हम बुरा करते है, हमें बुरा महसूस होता है| लिहाजा अच्छा करते रहे, अच्छा महसूस करते रहे| जीवन से सहज अपेक्षा बस इतनी ही होनी चाहिए| यह सहज अपेक्षा ही जतन से करते रहना है, और एक दिन नतीजे की कोई कली चट्केगी | बस, उसी के बाद सफलता की खुशबू अपने बहार के साथ जीवन में उतर आती है, पर यह बहार एक दिन की ही क्यों न हो, पर एक दिन में कभी नहीं आती | 
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