Wednesday, September 23, 2015

औरत

इन औरतों के हाथ पत्थरों से कठोर और खुरदुरे थे, तीखी तेज खूली धूप में काम करते-करते इन औरतों की चमड़ी जल कर आबनूस सी काली हो चुकी थी, जिससे चमकती आँखें बड़ी विद्रूप लगती थी.
मोटे मोटे होंठों की चमड़ी मोटी और जहाँ तहाँ से फटे हुए थे, सर के बाल रूखे और एड़ियाँ दरारो से भरी थी.
दरवेश ने दुनिया घूमी थी, औरतों से जुड़ी कोई भी एक विशेषता इस बस्ती की मजदूर औरतों में उसे नहीं दिखाई दीं, इन औरतों को देखते सोचते उसकी आँख लग गई.
गहरी नींद में सो रहे दरवेश ने अपनें परिवेश में किसी औरत के होने के एक बेहद मजबूत अहसास को महसूस किया और हड़बड़ा कर उठ बैठा. पसीने से तर-बतर एक मजदूर औरत दरवेश के बगल में बैठकर सुस्ता रही थी, उसकी पसीने की गंध दुनिया की पहली औरत सी थी.
उसके शरीर से उठ रही गंध में सातों देवियों की गंध समाई थी, दरवेश का मन आशनाँ हो उठा, उसनें कायनात से मन ही मन शुक्रिया कहा और सजदे में झुक गया.
कश्यप किशोर मिश्र
(एक हर्फ आदमी से )
प्रकाशन का लिंक : औरत ; (एक हर्फ़ आदमी )

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