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आज के तेज रफ़्तार समय में, एक जान पर वक़्त देना फिजूल लगता है, यह बात एक बैंकर को भी फिजूल ही लगी थी, जब काम से वापिस लौटते मोहल्ले के चौराहे पर जमा भीड़ ने उसकी कार रोक मदद की गुहार लगाईं, किसी लड़के को सड़क-दुर्घटना में चोट आई थी और उसे अस्पताल ले जाना था, पर वह बहाना बना आगे बढ़ लिया, उसने मन ही मन सोचा “रोज ही का किस्सा बन गया है, यह सब” पर दुर्भाग्य से जिस लड़के के साथ यह दुर्घटना हुई थी, वह उसकी ही इकलौती संतान था, जिसकी समय से अस्पताल न पहुच पाने की वजह से मौत हो गई | रोजमर्रा की, सड़को पर होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं, जिन्हें वह देखा-अनदेखा किया करता था, उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी |
आज
के समाज का तानाबाना “न्यूनतम
संसाधन से अधिकतम लाभ”
अर्जित करने की आर्थिक सोच से इतना अधिक प्रभावित है, कि जीवन का मूल्य भी इकाई
दहाई सैकड़े की गिनती से तय होने लगा है, ऐसे में किसी एक अकेले आदमी की जरूरते,
ख़ुशी दुःख परेशानिया बहुतों की जरूरतों खुशियों दुःख और परेशानियों के सापेक्ष गौण
हो जाती हैं, पर इससे उस अकेले आदमी की पीड़ा परेशानी या ज़रूरत महत्वहीन नहीं हो
जाती |
भूख सौ लोगों की मिटे या एक आदमी की पर जिसे भोजन मिला उसके लिए यह बड़ी बात होती है, मौत एक आदमी की हो, या सौ आदमियों की, पर जो मर गया, उसके लिए सबकुछ ख़तम हो जाता है| यह बात मानवीय समझ का सहज हिस्सा है, पर परपीड़ा का आकलन जब संख्या के हिसाब से किया जाने लगे तो इसका आशय यह निकलता है, कि समाज से रफूगर कम हो रहे है | छोटी-छोटी घटनाओं, एक अकेले आदमी की पीड़ा, उसकी टूटन की रफू कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की रफूगरी, हमारा समाज भूलता जा रहा है |
भूख सौ लोगों की मिटे या एक आदमी की पर जिसे भोजन मिला उसके लिए यह बड़ी बात होती है, मौत एक आदमी की हो, या सौ आदमियों की, पर जो मर गया, उसके लिए सबकुछ ख़तम हो जाता है| यह बात मानवीय समझ का सहज हिस्सा है, पर परपीड़ा का आकलन जब संख्या के हिसाब से किया जाने लगे तो इसका आशय यह निकलता है, कि समाज से रफूगर कम हो रहे है | छोटी-छोटी घटनाओं, एक अकेले आदमी की पीड़ा, उसकी टूटन की रफू कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की रफूगरी, हमारा समाज भूलता जा रहा है |
आज
के दौर में, हम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार करते है, हमारी प्रतिक्रिता किसी बड़ी
घटना पर होती है, हमारी संवेदना किसी बड़ी घटना पर जाग्रत होती है | भयानक बाढ़ में
पांच सौ लोगों की मौत से हम करुणा से भर उठते है, अपने वेतन से कटा कर पैसा भी
भेजते हैं जबकि पड़ोस में सड़क की पटरी पर ठण्ड से मर गए भिखारी पर हमारी करुणा नहीं
जगती, हांलाकि बस एक कंबल उसकी जान बचा सकता था | व्यक्तिगत पीड़ा और सुख दुःख की
सहज समझ बच्चो में मौजूद है, पर आदमी अपनी समझदारी में इस सहज समझ को भूलता जा रहा
है|
इस आलेख का प्रकाशित लिंक ;- दुःख तो दुःख होता है
भास्कर रसरंग का पृष्ठ लिंक ;- भास्कर रसरंग 14-दिसंबर-2014, पृष्ठ 2 एवं 3
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