Wednesday, December 3, 2014

उस बाज़ार की औरतें

दर्द से टूटती देह,
पीड़ा से चमकती कमर के साथ,
इन औरतों की सुबह वैसी ही होती है,
जैसे प्याली की तलछट में छूटी चाय,
बेशक कितनी भी स्वादिष्ट थी,
पर जूठी प्यालियो से छलकती,
बस ऊबकाई आती है !
उस बाजार की औरतें,
चढ़ती शाम के साथ,
गर्म-गर्म भाप उठती चाय हैं, बबुआ !
पर रात-उतरते,
बेस्वाद बदबूदार तलछट में पड़ी
ऊबकाई दिलाती,
बची जूठन हो जाती हैं |
प्यालियाँ अभी भी वही की वही हैं |

तो जब इन जूठन को देख आपको ऊबकाई आ रही होती है,
तब कराहती हुई,
किरचों-किरचों में बिखरी
अपनी शख्शियत को समेटती,
उस बाजार की औरते उठती है,
उन्हें अपने सामने पसरे,
एक उदास और उजाड़ दिन का विस्तार लांघना है |
ख़ुद को टाँकती, अपनी उधड़ी सिलाई की तुरपन करते,
अलग-अलग कोनों में पड़ी पुतलियों से,
अलग-अलग रिश्तो के कंगन पहन,
वो बन जाती हैं, अम्मा, भाभी, दीदी, मामी, ताई !
ये रिश्ते
बेटियाँ वाले रिश्ते दफ्न,होने के बाद ही बने थे |
अब इन औरतों को चलानी हैंघर-गृहस्थी
करना है सौदा-सुलफ़,
पकाना है, खाना-खिलाना है,
पूरे का पूरा एक दिन, दोपहर भर में निपटाना है,
गो कि, शाम के पहले, धुल-पूछ
भाप उठती गर्म चाय की प्याली बन जाना है |
वो सोचती है, यह सब,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

तो वो जल्दी-जल्दी खरीदती है,
तेल-चावल-मसाला किराने से|
उसे जल्दी है और लाला वक़्त रोकने  को आतुर है,
उसे पड़ी है जल्दी से किराने की
उसकी निगाहों में है,
तेल का नपना, तराजू की डंडी |
इधर लाला की निगाहें उस पे धसी जा रही है,
वह झिकती है, सामान तौलों लाला- समय की तंगी है
लाला की निगाह और धस जाती है,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

सब्जी खरीदते,
सब्जी वाला उसे अर्थाते
घटिया मजाक करते जाता है,
उसका जी करता है, एक चमाट रख दे,
सब्जीवाले के गाल पर |
पर आखिरकार उसे चुप रह्जाना सही लगता है
अन्दर की पीड़ा से एकबार फिर,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

अब, वह मछली खरीद रही है
मछली वाला कह रहा है, पैसे की क्या बात है,
पूरी मछली ले जाए, खुश हो जाए !
बस उसे खुश कर जाए |
वो कहना चाहती है, 
जा अपनी बेटी को खुश कर
पर बेटी शब्द उसके कलेजे में फंसते हैं,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

जैसे-तैसे पूरे करती है, घर के काम धंधे,
हलक के नीचे, जल्दी-जल्दी उतार रही है कुछ कौर,
अभी भूख पेट में बाकी है,
वह पेट भर लेना चाहती है,
सब इस पेट का किया-कराया है |
कि आहट होती है,
साथ की सहेली बताती है, उसका गाहक है,
कुछ और निवाले उतार लेना चाहती है,
पर मजबूरी में उठती है,
गाहक को देख मुस्काती है,
ढक कर छोड़ आई थाली की ललक उठती है,
और वह,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

बबुआ !
उस बाजार की औरते,
बड़ी फ़रेबी है,
आँखों ही आँखों में जाल बुनती है,
होठो ही होठो में करती हैं, भेदिया इशारे,
उनके इशारों के ज़ाल गहरे है,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे|
_______________
कश्यप किशोर मिश्र 

1 comment:

  1. कितनी मार्मिक है।। bunavat behad sunder

    ReplyDelete