बहार एक दिन में नहीं आती...
वायु
गतिकी के लिहाज से भवरे के शरीर की बनावट इतनी बेडौल और वजन ऐसा होता है, कि उसे
किसी भी लिहाज से उड़ने में सक्षम नहीं होना चाहिए| पर वायु-गतिकी के किसी भी नियम
से परे, भंवरा न सिर्फ खूब उड़ता है, बल्कि फूलो के ऊपर उड़ते हुए हवा में एक जगह
रुक भी जाता है|
महान
वैज्ञानिक थामस एडिसन, विद्यालय में महज तीन महीने ही नियमित रूप से पढ़ पाए, वो
ऊँचा सुनते थे और बच्चो के बीच उनकी हरकते मूर्खता भरी लगती थी, वो अपने अध्यापको
का कहा नहीं सुन पाते थे, एक दिन वह अपनी शिक्षिका के एक नोट के साथ लौटे जो उनकी
माँ के लिए था “आप का बेटा बेवकूफ है, इसे स्कूल से
निकाल दीजिये” माँ ने तय किया अपने बेटे को वह खुद
पढ़ाएगी | आज हम जिस एडिसन को जानते है, उसके नाम हजार से भी जादा वस्तुओ के
पेटेन्ट दर्ज है| मूर्खो सी हरकत करने वाला यह बालक कितना दृढ़ था, यह इस बात से पता चलता है, कि सन
1914 में जब एडिसन की फैक्ट्री जल कर राख हो गयी, तो अपनी जीवन भर की जमा-पूँजी को
राख होते देख उन्होंने कहा था “विनाश की भी एक सार्थकता होती है। फैक्ट्री के साथ हमारी अतीत की सारी गलतियाँ भी जल गयी| अब हम नई शुरुआत करेगे” और महज तीन
हफ्तों के अन्दर उनका फोन का आविष्कार दुनिया के सामने था|
अंधो के लिए इस्तेमाल होने वाली ब्रेल लिपि का आविष्कार करने वाले, लुई ब्रेल ख़ुद भी जन्मजात नेत्र-हीन थे| कृष्ण की बाल लीलाओं का भावप्रण वर्णन करने वाले सूरदास भी नेत्रहीन ही थे| लुई ब्रेल की लिपि का बड़ा माखौल उड़ाया गया, पर दुनिया भर के नेत्रहीन आज ब्रेल लिपि की बदौलत पढने में सक्षम है तो दूसरी तरफ सूरदास के अंधी आँखों से किये वात्सल्य वर्णन का मुकाबला शायद ही कोई कर सके| ऐसे कई उदाहरण हैं, जो बताते है, कि मनुष्य की इक्छा-शक्ति किसी भी अवरोध को नकारती है| यह अवरोध अज्ञान का हो, भय का हो, दुर्जेयता का हो, या अगम्य, अलघ्य होने का हो|
मनुष्य अपनी इक्षा-शक्ति के बूते असंभव से दीखते वाले कार्य कर जाता है, वरना थोर हैरदोल के पहले किसने सोचा भी होगा, कि सरकंडे से बनी नाव से, समूचा अंध-महासागर पार किया जा सकता है|
अंधो के लिए इस्तेमाल होने वाली ब्रेल लिपि का आविष्कार करने वाले, लुई ब्रेल ख़ुद भी जन्मजात नेत्र-हीन थे| कृष्ण की बाल लीलाओं का भावप्रण वर्णन करने वाले सूरदास भी नेत्रहीन ही थे| लुई ब्रेल की लिपि का बड़ा माखौल उड़ाया गया, पर दुनिया भर के नेत्रहीन आज ब्रेल लिपि की बदौलत पढने में सक्षम है तो दूसरी तरफ सूरदास के अंधी आँखों से किये वात्सल्य वर्णन का मुकाबला शायद ही कोई कर सके| ऐसे कई उदाहरण हैं, जो बताते है, कि मनुष्य की इक्छा-शक्ति किसी भी अवरोध को नकारती है| यह अवरोध अज्ञान का हो, भय का हो, दुर्जेयता का हो, या अगम्य, अलघ्य होने का हो|
मनुष्य अपनी इक्षा-शक्ति के बूते असंभव से दीखते वाले कार्य कर जाता है, वरना थोर हैरदोल के पहले किसने सोचा भी होगा, कि सरकंडे से बनी नाव से, समूचा अंध-महासागर पार किया जा सकता है|
धीरूभाई
अम्बानी महज चौथी तक पढ़े थे, पर अपनी मौत के पहले वो दुनिया के शीर्ष उद्योगपतियों
में शुमार थे|
अब्राहम लिंकन, अमरीका के राष्ट्रपति बनने के पहले, न सिर्फ अपनी वकालत में असफल साबित हुए, बल्कि राष्ट्रपति चुनाव के पहले, लिंकन ने जीवन भर, जितने भी चुनाव लडे, सबमे उन्होंने पराजय ही झेली| पर जीवन भर अच्छा करने के जुनून से अभिप्रेरित रहे|
अब्राहम लिंकन, अमरीका के राष्ट्रपति बनने के पहले, न सिर्फ अपनी वकालत में असफल साबित हुए, बल्कि राष्ट्रपति चुनाव के पहले, लिंकन ने जीवन भर, जितने भी चुनाव लडे, सबमे उन्होंने पराजय ही झेली| पर जीवन भर अच्छा करने के जुनून से अभिप्रेरित रहे|
जीवन
लगातार कोशिश करते रहने का और अच्छा करते रहने का नाम है| जरूरी नहीं नतीजा तुरत
ही निकल आये, जरुरी नहीं नतीजा हमारी मेहनत के सापेक्ष परिणाम लेकर आये पर यह
ज़रूरी है, हम हार न माने, हमारी कोशिश जारी रहे |
कोई
भी सुगंध, जो किसी फूल से पैदा होती है, वह किसी सूखे फूल या फल के बीज से शुरू
होकर, मिट्टी में एक अरसे दबे रहने के बाद, उगने, बढ़ने, फलने, फूलने के बाद अपनी
खुशबू के साथ बाहर आती है| पहले फूल और फिर ढेर सारे फूलों के बीच का अंतराल बड़ा
थोड़ा होता है, खुशबू और बाहर से भरपूर लहलहाते फूलों की सुरभि के बीच, बीज से पहली
कली के लम्बे अंतराल का शंघर्ष सहज ही दिखाई नहीं देता, नहीं दीखता है वह जतन भी,
जो बीज से होता हुआ कली तक पहुचने के बीच किया जाता है|
सहज
और सच्चे अर्थो में जीवन इसी जतन से करते रहने का नाम है, जीवन करते रहने और
अनुभूत करने का नाम है, जब हम अच्छा करते है, हमें भला महसूस होता है| जब हम बुरा
करते है, हमें बुरा महसूस होता है| लिहाजा अच्छा करते रहे, अच्छा महसूस करते रहे|
जीवन से सहज अपेक्षा बस इतनी ही होनी चाहिए| यह सहज अपेक्षा ही जतन से करते रहना
है, और एक दिन नतीजे की कोई कली चट्केगी | बस,
उसी के बाद सफलता की खुशबू अपने बहार के साथ जीवन में उतर आती है, पर यह बहार एक
दिन की ही क्यों न हो, पर एक दिन में कभी नहीं आती |
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लेख का लिंक बहार...एक दिन में नहीं आती
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ई पेपर का लिंक ;- http://epaper.bhaskar.com/magazine/rasrang/211/20042014/mpcg/2/


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