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मेरे दादू कहा करते थे,जिसने लाहौर नहीं देखा उसने दुनियां नहीं देखी,
नूरेजमीं है लाहौर|
बड़ी मुहब्बत थी मेरे दादू को लाहौर से,
वहां के तांगे, हो या तांगेवाले,
वहां की बंद गलियाँ, गलियों के मुहाने के फाटक,
कोट सा शहर, शहर के भीतर, सबके अपने कोट,
दादू कहते,
लाहौर परकोटों का शहर है, बबुआ
बाहर से भी, भीतर से भी|
बूढ़े हो चले थे, दादू
पर अनारकली की बात चलते ही
उनकी ज़र्द आखें टिमटिमा उठती थी|
बताते रहते मेयो कालिज के किस्से,
जो बाद में नेशनल कालिज आफ आर्ट हो गया था|
रीगल पर आकर ठहर जाते थे दादू
वक़्त में पीछे चले जाते थे |
लक्ष्मी चौक, सिंगार बाज़ार, गनपत रोड, धनीराम बाज़ार
न जाने कहाँ कहाँ घूमते रहते ख्यालों में
और घुमाते रहते हमें भी अपने साथ, ख्यालों में ही|
एक तस्वीर लेकर चले थे, दादू लाहौर की
सन अड़तालीस की सितम्बर में,
और बाकी जीवन भर,
वह तश्वीर ही रहा दादू का अपना शहर लाहौर
जहाँ सुबह-सुबह सड़के धोयी जाती थी|
दादू के साथ-साथ एक शहर लाहौर
मेरे ख्यालों का भी बसता चला गया|
अब मेरे लाहौर में भी है, मोरी गली
बादशाही मस्जिद, बादामी बाग़,
रावी का किनारा और सिविल लाइंस भी|
रावी का किनारा और सिविल लाइंस भी|
सिविल लाइंस की बात चली तो याद आया
वही कहीं डीएवी कालिज भी है, गुजरे वक़्त का,
उसके बगल से बड़ी साफ़ सड़क गुजरती है,
आगे जाकर रेलवे रोड से मिलती है|
उस सड़क पर पहुचते ही,
जरा आगे बाए मुड़कर एक गली जाती थी
जो खत्म होती थी, मोहल्ले के एक छोटे से मैदान में,
उस मैदान के, पूरब-उत्तर के कोने पर
एक पुराना शिवाला था,
एक पक्की मुंडेर का कुवाँ
और एक ईमली का पुराना पेड़ भी था,
पेड़ के चारो तरफ चबूतरा था,
जो लखौरी ईंटों से बंधा था|
आने के ठीक पहले,
सितम्बर अड़तालीस के एक दिन,
बड़े मायूस से मेरे दादू के पास
जब कोई चारा नहीं बचा,
सिवाय लाहौर छोड़ देने के,
तो रो पड़े थे, उस चबूतरे पर बैठे-बैठे|
एक घर भी था, कही वहीँ
पर उसकी बात उतनी जरूरी नहीं,
इस वक्त ज़रूरी वे आंसू है,
सुनो जायरीन,
मेरे लिए लाहौर जाने वाला
जायरीन ही है,
मेरे दादू के शहर जा रहे हो
उस चबूतरे तक ज़रूर जाना,
उसके बगल से बड़ी साफ़ सड़क गुजरती है,
आगे जाकर रेलवे रोड से मिलती है|
उस सड़क पर पहुचते ही,
जरा आगे बाए मुड़कर एक गली जाती थी
जो खत्म होती थी, मोहल्ले के एक छोटे से मैदान में,
उस मैदान के, पूरब-उत्तर के कोने पर
एक पुराना शिवाला था,
एक पक्की मुंडेर का कुवाँ
और एक ईमली का पुराना पेड़ भी था,
पेड़ के चारो तरफ चबूतरा था,
जो लखौरी ईंटों से बंधा था|
आने के ठीक पहले,
सितम्बर अड़तालीस के एक दिन,
बड़े मायूस से मेरे दादू के पास
जब कोई चारा नहीं बचा,
सिवाय लाहौर छोड़ देने के,
तो रो पड़े थे, उस चबूतरे पर बैठे-बैठे|
एक घर भी था, कही वहीँ
पर उसकी बात उतनी जरूरी नहीं,
इस वक्त ज़रूरी वे आंसू है,
सुनो जायरीन,
मेरे लिए लाहौर जाने वाला
जायरीन ही है,
मेरे दादू के शहर जा रहे हो
उस चबूतरे तक ज़रूर जाना,
चबूतरा मिले न मिले,


Wahida Kazi फ़ेसबुक पर
ReplyDeleteTruly incredible lines...
सुनो जायरीन,
मेरे लिए लाहौर जाने वाला
जायरीन ही है,
मेरे दादू के शहर जा रहे हो
उस चबूतरे तक ज़रूर जाना,
चबूतरा मिले न मिले,
शिवाला मिले न मिले,
ईमली का पेड़ मिले न मिले
पर मेरे दादू के आंसुओ की नमी ज़रूर मिलेगी|
उन आंसूओ की नमी को लेते आना,
मेरे मुल्क को उनकी सख्त ज़रूरत है|
बहुत ही खूबसूरत !!!
ReplyDeleteएक घर भी था, कही वहीँ
ReplyDeleteपर उसकी बात उतनी जरूरी नहीं,
इस वक्त ज़रूरी वे आंसू है,
सुनो जायरीन,
मेरे लिए लाहौर जाने वाला
जायरीन ही है,
"मेरे लिए लाहौर जाने वाला
जायरीन ही है" kya baat hai
लाहौर शहर में और कुछ चाहे न भी मिले, मेरे दादू के आंसुओ की नमी जरूर मिलेगी ... वाह कश्यप किशोर जी...खूब लिखा आपने...आँखों में नमी आ गई |
ReplyDeleteउन आंसूओ की नमी को लेते आना,
ReplyDeleteमेरे मुल्क को उनकी सख्त ज़रूरत है| बहुत खूब ...
आँखों के सामने एक तस्वीर सी खीच जाती है लाहौर की| बेहद उम्दा कविता..
ReplyDeleteउफ्फ ....क्या खूब लिखा है....बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पढने को मिली ....
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