Wednesday, May 14, 2014

मान लेना ...

तो अगर मैं कहू,
के दिन के पहले,
आसमानी फ़रिश्तों नें
रागिनी छेड़ी थी, रात की,
तो तुम मान लोगी ना!

मान लेना,
कि अल्ल-सुबह
सूरज
अजान के पहले,
आया था समंदर से वजू करके,

बस यहीं वजह थी,
कि, सारे दिन की गुलाबी ठंढक,
सूरज की रौशनी से नमकीन बनी रही...

वो जो,
एक मंदिर में पीपल है,
और एक मस्जिद के अहाते में पीपल हैं,
गहरे बहुत गहरे,
ज़मीन के भीतर
दूर दूर तक छतनार, उनकीं जड़े
जाती हैं, मेरे घर तक
तुम्हारे घर तक,
बड़े भेदी है, ये पीपल भी!

हमारे घर का सच बताते है,
सारे दिन थरथराते है|

पर एक सच यह भी है,
तुम जब खूब बोलती हो,
मेरी ख़ामोशी भी बोलती है |
तुम्हारी ख़ामोशी में गुम
मेरे शब्द अर्थ ढूंढते है |

बरसों पहले एक झूठ
पोटली में बांधकर,
किसी ताखे में रख छोड़ा,
हमारे पुरखो ने|

ऐसी कोई पोटली नहीं है,
मान लेना !

तुम्हारे गेसूं,
मेरे बिस्तर की सलवट है,
मान लेना ...




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