एक ढपली थी,
मेरे घर में,
बुआ की|
अल्हड़, जिंदादिल बुआ
जिन्दा रहना जानती थी|
अपनी असमय मौत के पहले की रात
वो देर रात तक ख़ूब नाचती रही|
कभी अम्मा को बाहों
में भर लेती,
कभी मुझे दुलारती,
खूब सारे गीत गाती
रही
ढपली बजाती रही !
अपने बाबूजी का गीत
थीं, बुआ!
शकुंतला थीं सुन्दर,
शेषा सुकोमल,
चेहरा मनोरम|
घर में, सबको पता था,
बुआ के गीत- संगीत
जल्द ही थम जायेगे,
थम जायेगी बुआ भी |
यह बात बुआ को भी
पता थी|
यह पते की बात,
बहुत पीड़ा देती थी, बुआ को|
सहा नहीं जाता
उनसे
तो बजाने लगती थी,
अपनी ढपली|
बहुत खूब बजती है,यह ढपली|
है न बाबूजी ?
बुआ पूछती थी, बाबा से|
बाबा कहते,
"मेरी ढपली तो तू है, बेटी"|
सन अठत्तर की होली की सुबह,
बाबा की ढपली थम गई,
अपने बाबूजी की सारी होलियाँ
बेरंग
कर गई|
घर की एक खूंटी पर
अम्मा के शब्दों
में,
"बीबीजी की ढपली"
टंगी रहती थी|
हवाओं से रुनझुन
करती|
सन अठत्तर से आज तक
उस ढपली में छुप के
बैठी रहीं,
बुआ की पदचाप,
गुंजन आवाज,
फागुन का फाग|
कल यूँ ही, अनायास
ढपली फूट गयी|
उस वक़्त मै बच्चा
था, बुआ
नहीं पता था,
टूटना क्या होता है?
कल लगा,क्या होता है,
शाख से टूटना, एक कोपल का|
सन अठत्तर की उस फागुनी सुबह,
मै मुरब्बा खाते,
तुम्हे ले जाया
जाते देखता रहा
हमेशा
ही ले जाई जाती थी
तुम, बुआ डाक्टर
के घर|
उस
वक़्त मुझे
कुछ नहीं पता था
आज वह
बच्चा रोने लगा
मै आज
खूब रोया, बुआ
बाकी
आंसुओ के व्याज सहित, रोया!
उठ के
आई बिटिया मेरी,
बोली
यह कैसी ललक,
ढपली
की?
क्यों
रोते हो?
तुम्हारी
ढपली तो मै हूँ|
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कश्यप किशोर मिश्र
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