SATURDAY, 19 APRIL 2014 16:11
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आँखों के बरक्स, तमामो तमाम तस्वीरों का एक कोलाज तारी है| यूँ तो माहौल में नुमायाँ नारे है बड़े फितरती, जो अपने साथ आदमी की फितरत बदल देने में माहिर है| इन नारों का असर बड़ा मादक और मारक है, आदमी की फितरत बदल देता है, वह सब कुछ भूल थाम लेता है एक नारा, एक झंडा और लगाने लगता है नारे “गली गली में शोर है” यह सारा का सारा शोर उसकी अपनी आवाज का हो रहा होता है | ठीक वैसा ही, जैसा कान मूँद कर “भ्रामरी” करते जब हम हल्की भँवरे सी गुंजन करते है, तो उस हल्की सी गुंजन की कम्पन अपने बंद कान के भीतर हमारे पोर-पोर को हिलाती लगती है| अपने नारे “गली गली में शोर है” का शोर मचाने वाले और उसे सुन सुन कर शोर मान लेते दोनों एक ही आदमी है| आदमी के कान बस एक विचारधारा को सुन रहे है|
इस माहौल में ज़रूरी है, इस सारे हुल्लड़ से अलग उन तस्वीरों की बात की जाए, जिनका जिकर आज के माहौल में बहुत ज़रूरी है| वे तस्वीरे जिनसे रूबरू मतलब आज के दौर के नारों की न सिर्फ मादकता खत्म करने वाले है, बल्कि इन झंडो और नारों के मारक असर को भी बेअसर करते है | ये तस्वीरे सपाट बयानी है एक औरत की जो सारी रात पर्दानशीन रही हो और उसके आशिक बस उसकी एक झलक देखने को बेताब हो, पर अल्ल-सुबह घर लौटने ही अपने बच्चे का रोना सुन, अपना चेहरा देख लेने को आतुर आशिक के सामने अपना वक्ष अनावृत कर अपने बच्चे को दूध पिलाने लगी हो|
आँखों के बरक्स, तमामो तमाम तस्वीरों का एक कोलाज तारी है| यूँ तो माहौल में नुमायाँ नारे है बड़े फितरती, जो अपने साथ आदमी की फितरत बदल देने में माहिर है| इन नारों का असर बड़ा मादक और मारक है, आदमी की फितरत बदल देता है, वह सब कुछ भूल थाम लेता है एक नारा, एक झंडा और लगाने लगता है नारे “गली गली में शोर है” यह सारा का सारा शोर उसकी अपनी आवाज का हो रहा होता है | ठीक वैसा ही, जैसा कान मूँद कर “भ्रामरी” करते जब हम हल्की भँवरे सी गुंजन करते है, तो उस हल्की सी गुंजन की कम्पन अपने बंद कान के भीतर हमारे पोर-पोर को हिलाती लगती है| अपने नारे “गली गली में शोर है” का शोर मचाने वाले और उसे सुन सुन कर शोर मान लेते दोनों एक ही आदमी है| आदमी के कान बस एक विचारधारा को सुन रहे है|
इस माहौल में ज़रूरी है, इस सारे हुल्लड़ से अलग उन तस्वीरों की बात की जाए, जिनका जिकर आज के माहौल में बहुत ज़रूरी है| वे तस्वीरे जिनसे रूबरू मतलब आज के दौर के नारों की न सिर्फ मादकता खत्म करने वाले है, बल्कि इन झंडो और नारों के मारक असर को भी बेअसर करते है | ये तस्वीरे सपाट बयानी है एक औरत की जो सारी रात पर्दानशीन रही हो और उसके आशिक बस उसकी एक झलक देखने को बेताब हो, पर अल्ल-सुबह घर लौटने ही अपने बच्चे का रोना सुन, अपना चेहरा देख लेने को आतुर आशिक के सामने अपना वक्ष अनावृत कर अपने बच्चे को दूध पिलाने लगी हो|
सच
की हुमक ऐसी ही होती है| सारी चमकदार रोशनी और धूम-धड़ाके के लंद्फंद धरे के धरे रह
जाते है| ऐसा ही एक सच है, मेरी आँखों में उभरी पहली तस्वीर| यह तस्वीर है “अविनाश भाई” की| जयप्रकाश
नारायण के अनन्य सहयोगी रहे अविनाश चन्द्र सक्सेना, उन चन्द लोगो में एक थे, जिनकी
पहुच जेपी तक बिना किसी रोक-टोक की थी| मुसहरी आन्दोलन से लेकर अपनी अस्वस्थता के
दौरान बस दो चार लोगो से मिलने तक सिमित व्यक्तियों में से एक व्यक्ति में शुमार “अविनाश भाई” जेपी के समग्र
क्रांति के बस गिनती के बचे पहरुओ में एक है और बनारस में एकाकी जीवन बिता रहे है|
राजघाट के सर्व सेवा संघ में आत्मलीन, समग्र क्रांति का यह तेजस्वी पहरुआ खामोशी
से, अपने हिस्से का दायित्व निभाये जा रहा है| चाहे केजरीवाल हो या मोदी या अजय
राय किसी को इतना वक़्त नहीं की इस “बस
एक मत” के लिए अपना
थोडा सा समय बर्बाद कर ले|
आँखों
में करक पैदा कर रही दूसरी तश्वीर मेरी अम्मा की है| हमारे बचपन के शुरूआती सालों
में, अम्मा हम बच्चो से बेफिक्र घर का चौका-चूल्हा सम्हालती थी| हम बच्चे नहाने
नदी पर जाते, गावं का कोई भी आदमी, यह कोई भी आदमी कोई भी हो सकता था” यह निगरानी करता
जरूर था कि वह घाट छोड़ कर तभी हटे, जब बच्चे नहा चुके हो| हम बच्चे बगीचे में
ओल्हा-पाती खेलते रहते और इस दौरान जैसे ही कोई भी बच्चा पेड़ पर चढ़ता, किसी न किसी
तरफ से, किसी न किसी की मनाही करती खंखार सुनाई पड़ जाती| नाव से नदी पार करते, कोई
भी हो बच्चो को कगार से हटकर बैठने को कह देता| ऐसा लगता था, बच्चे समाज की साझी
ज़िम्मेदारी हों| लिहाजा अम्मा निश्चिन्त थी| पर देखते ही देखते अम्मा की आँखों ने
चौरासी के दंगो का कत्ले-आम देखा, बानबे का रक्तपात देखा, गोधरा-गुजरात की हौलनाक
तश्वीरे देखी, मुजफ्फरनगर के दंगे देखे और अम्मा की आँखों में डर बस गया | पटना में
हमारे घर के अहाते के भीतर हमारे कुत्ते को गोली लगी थी, गोली किसी को नहीं
पहचानती, वहां मेरी अम्मा की औलादों में से कोई एक भी हो सकता था| अम्मा राय साहब
के बेटे की मौत नहीं भूल पाती | काँटा टोली, रांची में गोली लगने से मारा गया था
वो, इकलौता लड़का था, इक्कीस बरस बस लगे थे| सड़क पर रिक्शे से जा रहा था| बलवाइयो
के दो गुट आपस में लड़ रहे थे| किसी ने गोली चला दी| खबर बनी राहगीर मारा गया| राय
साहब का पूरा परिवार ही मर सा गया उस दिन| अम्मा का कलेजा जोर-जोर धड़कता रहता है,
इस धड़कने में तमाम आशंकाओं का भी हाथ रहता है, आँखों में डर बस सा गया है, मनाती
रहती है सम्मे माई को, अपने बच्चो के सलामती के लिए |
तीसरी
तस्वीर, घर के छत से मील भर दूर दीख रहे, खेतो में निकल आये हिरण की है| हिरण
बेफिक्र है, दूर दूर तक उसे कोई ख़तरा नहीं दीख रहा, पर उसे नहीं पता, मील भर दूर
बैठा एक शिकारी, बिना किसी टीम टाम के अपने घर की छत पर बैठे बैठे बस एक निशाने
में हिरण का काम तमाम कर देगा| बेचारा हिरण, उसे नहीं पता आज के शिकारी “दिल्ली शिकारी” है, उनके पास
ताकतवर दूरबीने है, दूर तक निशानची बंदूके है, बड़ी ही सुरक्षित और पोशीदा उनकी
पनाह्गाहे है|
चौथी
तस्वीर मेरे बच्चे की है, उसने कानो से मोबाईल लगा रखा है जो उसके एक हाथ में है
और दूसरे हाथ में खिलौना हेलीकाप्टर को उड़ाने का रिमोट| इस मोबाईल से वह अपनी नानी
से बात कर रहा है, उसके लिए एक तरफ, यह मोबाईल, हजारो मील दूर बैठी अपनी नानी से
जुड़ने का, उनकी दुलराहट महसूस करने का माध्यम है तो दूसरी तरफ हेलीकाप्टर का रिमोट
अपने खिलौने को हवा में उड़ा कर अपनी ख़ुशी अपने उल्लास को साथ के बच्चो के साथ बाटने
का जरिया है| उसने अपने घर में अभी यही सीखा है | उसकी तरह ही दुनिया का हर बच्चा
भी यही सीखता होगा अपने-अपने घरो में| पर कुछ लोग इन बच्चो को इनका इस्तेमाल बदल
देना सिखाते है, वे मोबाईल से निशाना बताते है, खिलौनों का इस्तेमाल बम बनाने में
करना सिखाते है| जो बच्चे ये तरीके सीखते है, वो अपने बचपन में एकदम उतने ही मासूम
थे, उतने ही सरल जैसा फिलहाल मेरा बच्चा है |
पांचवी
तस्वीर है किसुन यादव की, होली के दोपहर की| जब लोग होली मनाने की तैयारियों में
लगे थे, किसुन अपने घर के चूल्हे पर पकने के लिए राशन के जुगाड़ में लगे थे | आज भी
सात हाथ की लाठी लेकर चलने वाले किसुन को होली की उस चढ़ती दुपहरी, सुनसान सड़क पर
गावं लौटते देख मेरी आँखों की कोर गीली हो गई “देस चोरी परदेस भिक्षा” सोच मै भीतर तक
कातर हो उठा| मुल्क आज़ाद हुआ तो महज आठ बरस के थे
किसुन, अल्ल-सुबह उनके बाबा चिल्ला रहे थे, “सुराज आ गया- सुराज आ गया” एक दम झार नगें, मटियालोट
किसुन दौड़ पड़े पोखरे की तरफ, गावं में आनेवालों की राह उधर से ही थी, कोई आता नहीं
दिखा था, किसुन को | आज शरीर पर कपडे है, उमर अब पचहत्तर हो रही है, किसुन यादव की|
पर आत्मा झार-झार नंगी हो चुकी है | सुराज उनको आज भी नहीं दिखता|
छठी
तस्वीर उभरती है, गयासुद्दीन की| तांगा चलाना उसका पुश्तैनी है, मेरी निगाह में वह
चौथी पीढ़ी है, जिसे तांगा चलाते मै देख रहा हूँ| जब सब त्यौहार की मस्ती में डूबे
थे, गयासुद्दीन गावं से कस्बे के बाज़ार की सूनी सड़क पर चला जा रहा है, अपने तांगे
के साथ| कोई मिलता है, रँगना चाहे तो रंग लगवाने से कोई गुरेज नहीं है| उसकी पोटली
उसके साथ है, घोड़े का चना-चबेना साथ है| रोज जैसे ही| गयासुद्दीन शाम तक बाज़ार
पहुचेगा और भिन्सहरे-भिन्सहरे सामान लाद कर लौट पड़ेगा| इस तरह कल एक फेरी और हो
जायेगी| होली के दिन जो मजूरी नहीं हो पाई, उसकी कुछ भरपाई हो जायेगी| गयासुद्दीन
पीढ़ी डर पीढ़ी तांगा चला रहा है, और उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी, अपनी मजूरी की भरपाई करती
जा रही है | भरपाई हो जाए तो अल्लाह की नेमत, कुछ जोड़ सके यह बस ख्वाब है | वह जिस
सड़क पर तांगा चला रहा है, वह बड़ी टूटी हुई है, जो पल भर के सुकून और खवाब की इजाजत
कतई नहीं देती|
सातवी
तस्वीर नदी के उस घाट की है, जिसपर पुल बनाने की बात नेहरु के समय से उठती-बैठती
अब सो चुकी है| बरसात में नदी का पाट फ़ैल जाता है, लिहाजा उस पार दिखता गावँ और
लोग उस दौरान बेगाने हो जाते है| इस घाट पर पहले नाव चलती थी | गर्मी की सख्त
दोपहर हो या जाड़े की सर्द कोहरे भरी रात, घाट पर पहुचे राहगीर एक जोर की हांक
लगाते थे “ए माझी” और माझी अगर दूसरे
पार भी हो, नाव लेकर राहगीर को पार उतार देता था| इस इलाके के लोग आज़ादी के बाद से
इस घाट पर पुल की हांक लगाते लगाते थक गए| अब तो कोई पुल की बात करता ही नहीं|
हजारो हजार लोगो की हांक अनसुनी रह गई| इस तस्वीर के घाट पर “जन गण मन” के “अधिनायक जय हो” की चिता जल रही है|
आठवी
तस्वीर लखनऊ के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और बनारस के एक पत्रकार की है, जिनकी
मुलाकात का जरिया आज के दौर का “आभासी
जगत” था| महज एक
मुलाकात के लिए लखनऊ से यह युवक शाम को चलता है, करीब पूरी रात अपनी गाड़ी चलाकर
बनारस पहुचता है, एक दिन बनारस में, बस मिलने–बात करने के लिए बिता कर शाम को पुनः
अपनी गाड़ी से लौट आता है, करीब-करीब पूरी रात गाड़ी चलाते हुए| यह तस्वीर
जोड़ने-जुड़ने की है, मिलने-मिलाने की है|
इन
सारी तस्वीरों का कोलाज आ कर ठहर जाता है, नवी तस्वीर पर| असल में यह नवी तस्वीर
आखरी नहीं है, बल्कि इन सारी तस्वीरों के पार्श्व में बड़ी ख़ामोशी से दुबकी हुई है
| यह तस्वीर उस घर की है, जिसमे अब कोई नहीं रहता| ज्यादातर लोगों को ठीक-ठीक नहीं
पता इस घर के लोग कहाँ गए| ख़ुद घर छोड़ कर चले गए या बेदखल कर दिए गए| कारण जो भी
हो, कसूरवार सभी है| इस घर की तरह ही हम अपने दिलों के भी कसूरवार है, जिनसे हम एक
एक कर अपने समाज के लोगों को, उनकी खुशियों को, उनकी अभिलाषाओ को बेदखल करते जा
रहे है| इसे यूँ भी कह सकते है कि हमारे दिलो के घर अब हमारे पडोसी की ख़ुशी से
आबाद नहीं होते, न ही पडोसी के गम से इनमे मायूसी होती है |
हमारे
दिल सूने होते जा रहे है, इस उजाड़ सूनेपन के जिम्मेदार हम है| इस सूने घर की
खिलखिलाहते लौट सकती है, अगर बस मिलने और बात करने जैसी तस्वीरों की भरमार हो, पर
ऐसा नहीं है| ऐसा हो भी नहीं रहा| पगड़िया सबकी लुट रही है, पर सब बस दूसरों के सर
से लूटी जा रही पगड़ी देखने में व्यस्त है| काश कोई तो आईना ऐसा मिले जिसमे हम ख़ुद
को देखे तो ख़ुद से ही कहें “अपनी
पगड़ी सम्हाल” | यह
पगड़ी हमारा अपना मत है| यह मेरी तस्वीरे है, मेरी तस्वीरों का कोलाज है| आपके पास
अपनी तस्वीरे होगी, उनके अपने कोलाज होगें| पार्श्व में सूने आँगन होंगे| ज़रूरी है
उनसे रहगुजर हो ले| पांच साल पर “अपनी
पगड़ी सम्हालने का”
मौका एक बार आता है|
पगड़ी हमारी है, सर भी हमारे है|
पगड़ी हमारी है, सर भी हमारे है|
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कश्यप किशोर मिश्र राजनीतिक विश्लेषक हैं.
कश्यप किशोर मिश्र राजनीतिक विश्लेषक हैं.
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