
दुनियां डरपोकों से भरी
है, जिनमे डर के पार जाने का साहस नहीं होता, वे अपनी लीक पर जीते जाते है| पर कुछ
अपने डर से पार उतरना, सपने देखना, और कोशिश करना जानते है| दुनियाँ के लिए यह हजम
करनी कठिन है, कठिन है, अपने डरपोक होने को स्वीकार करना| तो लोग कोशिश करने वालों
का मज़ाक उड़ाते है| लिहाजा अपने भय के साथ-साथ दुनियां की हँसी के पार उतर जाना,
सफलता पाने कि पहली शर्त है |
तैमूर, एक गड़ेरिया, राजा बनने की बात करता ! लोग ठहाके लगाते उसका मजाक उड़ाते, कभी हुई एक झड़प में तैमूर के पैरों पर लगे तीर ने उसे लंगड़ा कर दिया, लोग मजाक में उसे “लंग” कहते, दुबले, सामान्य काठी के तैमूरलंग के शरीर का दायाँ हिस्सा विकलांग था, पर तब भी तैमूरलंग हिन्दुस्तान के साथ-साथ पश्चिम और मध्य एशिया के एक विशाल साम्राज्य का मालिक बना |
स्वामी विवेकानंद जिनकी वक्तृत्व शैली पर समूचा अमरीका मुग्ध था, यह हमेशा नहीं था, स्वामी विवेकानंद जब शुरू शुरू में अमरीका गए तो लोगों ने उनके पहनावे और जीवन शैली का खूब मजाक उड़ाया, कई जगह उनके वक्तव्य के दौरान उनपे असभ्य टिप्पड़िया भी कि गई, पर इन सारी बातों से स्वामीजी तनिक भी विचलित नहीं हुए, अपने धैर्य कि बदौलत स्वामी विवेकानंद ने अंततः समूचे अमरीका को अपना प्रशंसक बना लिया, जो लोग कभी स्वामी विवेकानंद का मजाक उड़ाते नहीं थकते थे, वे स्वामी विवेकानंद का गुणगान करते नहीं थकते थे |
तैमूर, एक गड़ेरिया, राजा बनने की बात करता ! लोग ठहाके लगाते उसका मजाक उड़ाते, कभी हुई एक झड़प में तैमूर के पैरों पर लगे तीर ने उसे लंगड़ा कर दिया, लोग मजाक में उसे “लंग” कहते, दुबले, सामान्य काठी के तैमूरलंग के शरीर का दायाँ हिस्सा विकलांग था, पर तब भी तैमूरलंग हिन्दुस्तान के साथ-साथ पश्चिम और मध्य एशिया के एक विशाल साम्राज्य का मालिक बना |
स्वामी विवेकानंद जिनकी वक्तृत्व शैली पर समूचा अमरीका मुग्ध था, यह हमेशा नहीं था, स्वामी विवेकानंद जब शुरू शुरू में अमरीका गए तो लोगों ने उनके पहनावे और जीवन शैली का खूब मजाक उड़ाया, कई जगह उनके वक्तव्य के दौरान उनपे असभ्य टिप्पड़िया भी कि गई, पर इन सारी बातों से स्वामीजी तनिक भी विचलित नहीं हुए, अपने धैर्य कि बदौलत स्वामी विवेकानंद ने अंततः समूचे अमरीका को अपना प्रशंसक बना लिया, जो लोग कभी स्वामी विवेकानंद का मजाक उड़ाते नहीं थकते थे, वे स्वामी विवेकानंद का गुणगान करते नहीं थकते थे |
जर्मनी के वान ने काठ की
साइकिल “रनिग मशीन” बनाई तो लोग उसपे खूब हसें थे, जेम्स वाट के भाप-इंजन पर लोग
उसे पागल कहने लगे, आइन्स्टीन को करीबी रिश्तेदार तक “भुलक्कड़ और मूर्ख” कहते थे,
पर ये सब आज एक सम्मानित नाम है| इनकी नज़र दुनियां कि हँसी पर नहीं, अपने लक्ष्य
पर थी |
बेहद निर्धन फ्रेंकलिन, सत्रह भाई-बहन थे, महज दस वर्ष की उम्र में काम कि तलाश में घर त्याग फिलाडेल्फिया चले आये, भूख से व्याकुल फ्रेंकलिन नें तीन रोटियाँ खरीदी, दो बगलों में दाबी और एक खाते, चिथड़े कपड़ों में सड़क पे चले जा रहे थे, एक अमीर की बेटी “देबोरा रीड” ने यह देखा, फटेहाल गवांर फूहड़ लड़के पर वह खिलखिला कर हँस पड़ी, खुद का मजाक देखना फ्रेंकलिन के लिए नई बात नहीं थी, ऐसी बातों से वह निराश नहीं हुए|
उन्होंने कड़ी मेहनत की, लोहे पीटे, बर्तन बनाये, बेकरी पर काम किया, जूते गांठे, लोगों के कपडे धोये और अपना छापाखाना लगाया | अखबार निकाला, किताबे छापी, संगीत कि धुनें बनाई, शिक्षा संस्थान खोले, आविष्कार किये और अमरीका की स्वतंत्रता कि लड़ाई लड़ अमरीका को मुक्त किया, उन्हें “पहला अमरीकन” भी कहते हैं | जो अनिंध सुंदरी “देबोरा रीड” बेंजामिन पर हँसी थी, उसने इस घटना के सात वर्ष बाद बेंजामिन फ्रेंकलिन से स्वयं शादी का प्रस्ताव किया |
कस्बे से लगा, साधकों का आश्रम था, सब एक से लगते| एक दिन कस्बे के बच्चों में सहज जिज्ञासा उठी, कैसे पता चले इनमें सबसे ज्ञानी कौन है ? एक बूढ़े ने बच्चों से कहा यह जानने का सबसे आसान तरीका साधकों का मजाक उड़ाना है, अतः अगले दिन से बच्चे साधको को देखते ही उनपे हँसने लगते|
बच्चों की मजाकिया हँसी कुछ साधकों को नागवार लगती, कुछ साधक निरपेक्ष रहते, कुछ बच्चों को भगाते, एकाध मुस्कुरा भी देते पर एक साधक बच्चों के मजाक पर उनके साथ ठहाके लगाने लगा, अब बच्चे उसके साथ वाकई ठहाका लगा लगा कर हँसने लगे | कस्बे को सबसे ज्ञानी साधक का पता चल चुका था |
________________________
कश्यप किशोर मिश्र
दैनिक भास्कर- रसरंग में प्रकाशन का लिंक :- दुनियाँ तुम पे हँसे तो तुम भी हँसो
बेहद निर्धन फ्रेंकलिन, सत्रह भाई-बहन थे, महज दस वर्ष की उम्र में काम कि तलाश में घर त्याग फिलाडेल्फिया चले आये, भूख से व्याकुल फ्रेंकलिन नें तीन रोटियाँ खरीदी, दो बगलों में दाबी और एक खाते, चिथड़े कपड़ों में सड़क पे चले जा रहे थे, एक अमीर की बेटी “देबोरा रीड” ने यह देखा, फटेहाल गवांर फूहड़ लड़के पर वह खिलखिला कर हँस पड़ी, खुद का मजाक देखना फ्रेंकलिन के लिए नई बात नहीं थी, ऐसी बातों से वह निराश नहीं हुए|
उन्होंने कड़ी मेहनत की, लोहे पीटे, बर्तन बनाये, बेकरी पर काम किया, जूते गांठे, लोगों के कपडे धोये और अपना छापाखाना लगाया | अखबार निकाला, किताबे छापी, संगीत कि धुनें बनाई, शिक्षा संस्थान खोले, आविष्कार किये और अमरीका की स्वतंत्रता कि लड़ाई लड़ अमरीका को मुक्त किया, उन्हें “पहला अमरीकन” भी कहते हैं | जो अनिंध सुंदरी “देबोरा रीड” बेंजामिन पर हँसी थी, उसने इस घटना के सात वर्ष बाद बेंजामिन फ्रेंकलिन से स्वयं शादी का प्रस्ताव किया |
कस्बे से लगा, साधकों का आश्रम था, सब एक से लगते| एक दिन कस्बे के बच्चों में सहज जिज्ञासा उठी, कैसे पता चले इनमें सबसे ज्ञानी कौन है ? एक बूढ़े ने बच्चों से कहा यह जानने का सबसे आसान तरीका साधकों का मजाक उड़ाना है, अतः अगले दिन से बच्चे साधको को देखते ही उनपे हँसने लगते|
बच्चों की मजाकिया हँसी कुछ साधकों को नागवार लगती, कुछ साधक निरपेक्ष रहते, कुछ बच्चों को भगाते, एकाध मुस्कुरा भी देते पर एक साधक बच्चों के मजाक पर उनके साथ ठहाके लगाने लगा, अब बच्चे उसके साथ वाकई ठहाका लगा लगा कर हँसने लगे | कस्बे को सबसे ज्ञानी साधक का पता चल चुका था |
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कश्यप किशोर मिश्र
दैनिक भास्कर- रसरंग में प्रकाशन का लिंक :- दुनियाँ तुम पे हँसे तो तुम भी हँसो

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