माननीय प्रधानमंत्री
नरेंद्र भाई मोदी जी,
इस देश
के एक नागरिक के तौर पर मै अपने प्रधानमंत्री को, उनके निर्वाचन पर बधाई देता हूँ
और आशा करता हूँ, वह यकीनी तौर पर, किसी व्यक्ति, जाति, राज्य या सम्प्रदाय के
प्रधानमंत्री न होकर, पूरे मुल्क के प्रधानमंत्री होंगे और एक भारतवासी के तौर पर
हमें अपना सर गर्व से ऊँचा रखने का मौका प्रदान करेगे, कि हमने जिस व्यक्ति को
अपने प्रधानमंत्री के रूप में निर्वाचित किया है, वह लोकतंत्र की हमारी अधूरी समझ
का नतीजा नहीं है, बल्कि भारत का मतदाता और लोकतंत्र समय के साथ-साथ परिक्व हो
चुका है और उसके चयन में, समय के साथ-साथ खामियां कम से कमतर होती जा रही है|
प्रधानमंत्री
जी, आपने अपने संसदीय क्षेत्र के रूप में दुनिया के सर्वाधिक प्राचीन शहर बनारस का
चयन कर, हमारे भीतर एक उम्मीद की लौ जगाई कि आपके बनारस का चयन करने के पीछे की
वजह, इसका महज एक संसदीय क्षेत्र न होकर, मानवता की सतत जिजीविषा के प्रतीक रहे
शहर के साथ जुड़ने की चाह भी रही होगी| एक ऐसा शहर जो सतत-निरंतर अनादी काल से
मानव-सभ्यता के उत्थान-पतन के साथ साथ अविचल रूप से जुड़ा रहा| बनारस सिर्फ एक शहर,
संस्कृति या समाज नहीं है, बल्कि उससे जादा एक भाव है| हमें उम्मीद है मनुष्य जाति
के सतत-निरंतर अविचल शंघर्ष के भाव, बनारस को चुनने के पीछे, आपकी वजह यही रही
होगी|
आपने यह कह कर हमें उद्धेलित कर दिया कि आपको “माँ गंगा ने बुलाया है” एक माँ का ह्रदय अपने बच्चो को सदैव ही बुलाता रहता है, आपने माँ गंगा की पुकार सुनी, उनका ख्याल किया हम इसके आभारी है|
प्रधानमंत्री महोदय, संसद में प्रवेश करने के पूर्व जब आपने संसद की सीढ़ियों पर अपना माथा टिकाया, तो आपने इस देश की सवा अरब आबादी के लोकतान्त्रिक अधिकारों की उम्मीद पर भी एक टेक लगाईं| आपके लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों पर सादर माथा टिकाने ने, हमें आश्वस्त किया कि हमारा प्रधानमंत्री, इस देश के किसी भी नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार को अपनी टेक देगा, भले ही इसके लिए एक व्यक्ति के तौर पर नरेंद्र भाई मोदी को झुकना भी क्यों न पड़े, लोकतंत्र को दी गई इस प्रतीकात्मक टेक पर हमने बड़े गर्व से अपने भारत के प्रधानमंत्री को देखा, सराहा|
शपथ के पूर्व आपका गाँधी समाधि पर जाना और महात्मा गाँधी को श्रध्दा-सुमन अर्पित करना, उन गांधीवादी मूल्यों को पुनः वैद्यता प्रदान करना था, जिसका आधार समरसता, सहिष्णुता, समानता, बंधुत्व और समदृष्टि जैसे भाव होते है| हम यह यकीन करते है, कि सत्य के इन आधारभूत मूल्यों का सम्मान करने को आप सतत सजग रहेगें|
प्रधानमंत्री
जी, निश्चय ही देश की जनता, जनतांत्रिक प्रतीकों से प्रभावित होती है और अपने
नायकों के समान आचरण की कोशिश भी करती है, लिहाजा यह जरूरी हो जाता है कि अपने
निर्वाचन के पूर्व, दौरान और ठीक बाद एक निर्वाचित शासक जिन जनतांत्रिक प्रतीकों
और मूल्यों का प्रतीक रूप में इस्तेमाल करता हो, उन्हें अपने शासन के दौरान अपने
व्यवहार में भी अमल करता हो| ऐसा होने पर न सिर्फ उस शासक पर जनता की निष्ठा बलवती
होती है, बल्कि एक नागरिक के तौर पर ऐसे राष्ट्र के नागरिकों के आचरण में भी
जनतांत्रिक मूल्यों के सम्मान की भावना बलवती होती है|
लिहाजा जनतांत्रिक प्रतीकों के सांकेतिक सम्मान के पश्चात आचरण से भी तदनुरूप ही जनतांत्रिक मूल्यों का संवर्धन करना, किसी देश के नागरिको के आचरण में भी गुणात्मक वृद्धि करता है|
प्रधानमंत्री जी, दुनियां के सबसे बड़े जनतांत्रिक मुल्क का नागरिक होने के बाद भी, बीते चौदह बरस से एक महिला ख़ामोशी से, बड़े ही लोकतान्त्रिक तरीके से अपने लोकतान्त्रिक हक़ के लिए सत्याग्रह रत है| यह आश्चर्य की बात है कि एक महान लोकतंत्र होने का दावा करने वाले हमारे मुल्क में, बीते चौदह बरस से, एक औरत जो बेहद विनम्रता से अपनी बात कहना चाहती है और सत्याग्रह कर रही है, उसकी बात कोई सुन ही नहीं रहा| इस देश की एक नागरिक बड़ी ही विनम्रता से अपनी बात कहना चाहती है और इसके लिए उसके सत्याग्रह की, इस मुल्क के शासक वर्ग में, कही भी कुछ भी कोई पूछ ही नहीं है|
आमरण अनशन पर बैठी एक महिला के इरादों का दमन करने को बड़े ही पाशविक जतन किये गए| कोशिशे होती रही वह थक-हार कर टूट जाए पर बजाय टूट जाने के वह महिला मानवता की सतत जिजीविषा की प्रतीक-बनारस बन गई| इस महिला ने टूटने से इन्कार कर दिया, इसे जबरजस्ती नाक में नली के जरिये तरल पदार्थ देकर, इसका अनशन तोड़ने की कोशिश हुई, पर यह महिला, इस महान मुल्क की महान मातृशक्ति का प्रतीक बन अड़ गई| इसका अनशन सिर्फ अपने लिए थोड़े था, यह तो मणिपुर, जो इसका गृहराज्य है, के बच्चे-बच्चे के लिए था, यह मणिपुर की आवाज बनारस बन गई, इसने टूटने से इन्कार कर दिया, अविचल हो गई| यह एक शरीर से एक भाव बन गई, सम्पूर्ण मणिपुर के जनतांत्रिक अधिकार की मांग का भाव, यह मणिपुर में बनारस बन गई|
प्रधानमंत्री
जी, यह महिला कविताएँ लिखती थी, जिसमे भावों की लहर बनती बिगड़ती दिखती, गंगा की
लहरों की ही तरह| इसका मन एक माँ का मन था, कोमल और सबको प्यार करने वाला, यह
जीवनदायनी भावों से अभिप्रेरित थी, गंगा की तरह ही| इसका ह्रदय भी अपने बच्चो को
पुकारता था, जैसे माँ गंगा ने आपको पुकारा था, पर दुर्भाग्य से इस माँ के बच्चो
में से तमाम बच्चे, निरपराध ही, बस शक के आधार पर, सेना द्वारा मार दिए गए| इस माँ
के तमाम बच्चे, अपनी माँ की पुकार सुनने को बचे ही नहीं थे|
इस माँ की तमाम
बेटियों ने बलत्कृत हो आत्महत्या कर ली| प्रधानमंत्री जी, जिस माँ की बेटियाँ
बलत्कृत हो जाये उसके लिए कुछ बचा नहीं रह जाता, वो नंगी हो जाती है, शरेआम|
15-जुलाई-2004 की दोपहर जो घरेलू औरते “भारतीय
सेना आओ हमारा बलात्कार करो” का
नारा लगाते और यही नारे लिखे परचम लहराते असम राइफल्स के मुख्यालय पर एकदम नगी खड़ी
हुई, वो इस आमरण-अनशन पर बैठी महिला के भाव की सामूहिक अभिव्यक्ति मात्र न होकर,
नग्न खड़ी हमारी भारत माँ भी थी| आजाद भारत के लिए यह सबसे शर्मशार करने वाली बात
थी, जब इस मुल्क की जननी अपने जनों के सामने नग्न खड़ी थी, “आओं हमारा बलात्कार करो” कहते
पर न उन औरतो की आवाज सुनी गई न गंगा बन सत्याग्रह कर रही इस महिला की आवाज सुनी
गई|
प्रधानमंत्री जी, इस महिला के सवाल बड़े सरल है, उदार मन से, ईमानदारी पूर्वक इन्हें सुना जाए तो इनका जबाब इस मुल्क के एक बच्चे के पास भी है, बस नियत में खोट न हो| यह औरत जानना चाहती है, भला वह कौन सा जनतंत्र है, जो बस शक के आधार पर अपने नागरिको के एक तबके को गोलियों से भून देने वाली सेना पर कोई सवाल न उठाने का विशेषाधिकार देता है| प्रधानमंत्री जी, यक़ीनन किसी मुल्क में, उसके शासको का जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान होता है, पर उससे महत्वपूर्ण वह नागरिक चेतना होती है जो जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरक्षण को अपनी टेक देती है| लिहाजा जब आप संसद भवन की सीढ़ियों पर अपना शीश टिका, इस देश के किसी भी नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार को अपनी टेक दे रहे थे, तो आपकी टेक के साथ एक टेक इस सत्याग्रही मणिपुरी महिला की भी थी|
प्रधानमंत्री जी, यह महिला आंदोलनरत है, आमरण अनशन पर है, पर अपनी बात कड़े लहजे में कहने से इन्कार करती है, अपने सत्याग्रह के जरिये यह कोई भी अराजकता नहीं पहुचाना चाहती, अपने आन्दोलन से यह किसी को कष्ट या ठेस भी नहीं पहुचाना चाहती, किसी को सजा दिलवाना भी, इस महिला के अनशन का उद्देश्य नहीं है, बल्कि किसी को उसकी वजह से कोई कष्ट या नुकसान ना हो, इसका ध्यान रखना, इस दशा में भी, वह अपना दायित्व समझती है| प्रधानमंत्री जी, गाँधी जी की आत्मा का वास उनकी समाधि पर हो न हो, पर हमारे देश की इस महान माँ में बापू की आत्मा का वास अवश्य है |
प्रधानमंत्री जी, जरा सोचिये! आपके निर्वाचन के दौरान चुने गए समूचे जनतांत्रिक
प्रतीकों को यह एक अकेली महिला जिसे हम “शर्मिला
ईरोम” के नाम से जानते है, अपनी करनी में धारण करती
है, प्रतीकात्मक संकेतो के बाद अब वक्त इन संकेतो को अपने आचरण में उतारने का आ
गया है, हम भारत के लोग बड़ी उम्मीद से आपसे आस लगाये बैठे है, आप इस महिला की बात
जरूर सुनेगे और बीते चौदह बरस से, एक महान जनतंत्र के नागरिक के तौर पर, हम जिस
शर्मनाक सवाल से अहर्निश रु-ब-रु है, उससे हमें मुक्ति दिलायेगे |
एक नागरिक के तौर पर हम सम्मान महसूस करें, इसके लिए हमें आपसे बड़ी आशा है |
इस देश का एक आम नागरिक
कश्यप
किशोर मिश्र


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