अज्ञान
के अंधकार सी सघन, अमावस की गहन काली रात, कार्तिक माह में रूपवती नारी सी दिखती
है, ढलती शाम के साथ-साथ एक एक दीप जलते हैं और अमावस दीपावली में बदल जाती है |
साल की सबसे काली रात, साल की सबसे सुन्दर प्रकाशपूर्ण-पर्व बन जाती है, दुनिया भर
के मिथकों और परम्पराओं से इतर यह मनुष्य के सामूहिक प्रयास से गहन से गहन अन्धकार
पर विजय प्राप्त कर उसे “प्रकाशोत्सव” में तब्दील करने के
विजयघोष की रात होती है |
एक
प्रतीक के तौर पर दीपावली एक पर्व उत्सव या त्यौहार की बजाय मनुष्य की सामुदायिकता
और निरंतरता के जरिये असंभव को संभव बना देने का प्रतीक है, एक ऐसा प्रतीक जिसमे
समाज के हर एक प्रत्येक इकाई का योगदान होना है, यह योगदान एक दीपक का भी हो सकता
है और जगमग दीपों की तमाम श्रृखला का भी, पर जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि
मनुष्य का सामूहिक प्रयत्न प्रकृति के अत्यंत निष्ठुर स्वरुप को भी कोमल सुन्दर
भाव में बदल देने में सक्षम है |
दीपावली
का दीप गहन काले अन्धकार में “तमसो माऽ
ज्योतिर्गमय” का
प्रतीक है, यह प्रतीक है ज्ञान के आलोक की | जिस आलोक से प्रदीप्त राम काले होते
हुए भी काले न दीख, भक्ति और ज्ञान की गहन नील गहराई की आभा से युक्त नीलाभ दिखते
है | राम प्रतीक है, आदमीयत के | राम प्रतीक है, मनुष्यता के उन भावों के जिनके न
रहने से “गौरवर्णा” तमामो तमाम विधाओ
का ज्ञाता महान पराक्रमी और महान ज्ञानी ऋषि विश्वेश्रवा का पुत्र दशानन, रुक्ष
राक्षस रावण बन जाता है |
राम
प्रेम करना जानते हैं, विरह-व्याकुल हो सकते है, भाई के घायल होने पर आर्तनाद कर
सकते है, पिता की मृत्यु सुन अशांत हो सकते है | राम कोमल है, कोमलता से अपनी
पत्नी का श्रृगार कर सकते है, पर्ण कुटीर बना सकते है, सबरी के जूठे बेर खा सकते
है, केवट के प्रेम को समझ उसका आलिंगन कर सकते है | राम सतत चिरंतन चलते रहने वाले,
ज्ञान-पथ के पथिक हैं, सीखते जाते हैं | राम को पता हैं, रणभूमि में आसन्न मृत्यु
के करीब पड़ा रावण, महान पंडित है लिहाजा “क्षत्रिय-राम” “क्षात्र-राम” बन लक्ष्मण को रावण
के पास भेज सकते है | दीपावली राम के उस सहज मनुष्य रूप की स्मृति का पर्व है |
मनुष्य के निरंतर सीखते-सुधार करते, ज्ञान के पथ पे चलते जाने का पर्व है | एक
मनुष्य के मनुष्यता की मर्यादानुकूल आचरण करते हुए “उत्तमोत्तम” होते जाने की प्रक्रिया की सामाजिक
वैद्यता का पर्व है |
रावण
महान पंडित है, पर सत्य सुनने का उसे साहस नहीं, वह गर्वोन्मत्त है, मनुष्य को
अत्यंत तुच्छ समझता है, विरोध की सिमित संभावना पर भी किसी को बंदी बना सकता है,
सहज ही वध करना उसका स्वभाव है, नारी उसके लिए वस्तु है, रिश्ते-नाते युद्ध के
पांसे| रावण परम प्रतापी है, महान पंडित है पर वह “क्षात्र-रावण” से पूर्णत: “क्षत्रिय-रावण” में बदल गया है| रावण रुक गया है, वह
ज्ञान की राह का पथिक नहीं रहा, उसे ख़ुद पर अभिमान हो चुका है | दीपावली “उत्तमोत्तम-पुरुष” रावण के “क्षात्र-भाव” को त्याग “क्षत्र-गर्व” में उन्मत्त राक्षस
हो जाने का चेत-पर्व है | “जन्मना
श्रेष्ठ रावण”
पर “कर्मणा
श्रेष्ठ राम के”
अभ्युदय की प्रक्रिया के सामाजिक वैद्यता का पर्व है |
दीपावली
एक व्यक्ति के लिए सामाजिक सरोकारों के प्रति व्यक्तिगत जबाबदेही और जुडाव का भी
पर्व है | यह पर्व है, चिरंतन भाव का | राम आ रहे हैं, सभी राम के आने की राह
देखते साफ़-सफाई में लगे दीप जलाने की तैयारियों में हैं |
राम
के आने की दिशा के एकदम विपरीत, सूदूर सरयू-तट पर एक बूढे मल्लाह ने घाट की सफाई
की, बाती बनाई, मृदु-मिट्टी के दीप बनाये और उन्हें जला दिया |
कोई
पथिक पूछ बैठा “यह
तो राम के आने का रास्ता नहीं”
मल्लाह ने कहा “ मेरे
राम के आने का रास्ता मेरे ह्रदय से होकर गुजरता है |”
दीपावली अपने अपने राम-अपने अपने दीप के
भाव का पर्व है |
प्रकाशित लेख का PDF लिंक ;- अपने अपने राम अपने अपने दीप
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