Monday, December 14, 2009

चांद सिफारीश जो करता हमारी, देता वह तुम को बता.

कही पार्श्व में फ़ना का गीत बज रहा है...
चांद सिफारीश जो करता हमारी, देता वह तुम को बता!
शर्म-ओ-हया पे परदे गीरा के, करनी हैं हम को खता।
जिद हैं अब तो हैं खुद को मिटाना, होना हैं तुझ में फना...

इस मधुर संगीत के साथ मैं अतीत के गलियारे में भटकने लगता हू, और नथुने उस खुशबू के अभिज्ञान को मचल उठते है, जिन्हें मैं बंद आँखों से महसूस लेता था। वो पूछती "कैसे जान लेते हो तुम, की मैं ही हू?" और मैं उसे अपनी बाँहों में भरते बताता "हर शरीर की अपनी एक अलग महक होती है, कोशिश करो तो तुम भी शूंघ लोगी " और वो मुह बिसूरते जबाब देती "नही मैं नही सूंघ सकती, और फ़िर साल भर लगी रहने वाली अपनी सर्दी जुकाम की तरफ़ इशारा कर देती। हम आपस में हंस पड़ते , मुझे पता था उसे ये सुनना अच्छा लगता है, की मैं उसकी खुशबू पहचानता हू।
जब वो मुझसे अलग रहा करती, यानी मुझसे दूर चली गई, तो मुझे बताती "बहुत मिस करती हू, कैशू। रात में यू ही तुम्हारा नाम लेती रहती हू, की लगे की तुम बगल में सो रहे हो।" मैं मुस्कुरा देता और उसे चिढ़ाता "एक दम ढक्कन हो तुम" पर वास्तव में मेरा अंतस भीग जाता, मैं उसे बताना चाहता की वाकई उसके बिना एक एक पल बिताना मेरे लिए कितना मुश्किल है, कितना मुस्किल है, उस घर में अकेले रहना जिसके हर एक कोने में हमारे साथ की खुशबू रची बसी है। पर मैं जनता था की मेरा जरुरत से जादा अपनापन दिखाना, या अपनी कमजोरी दिखाना उसे पढने नही देगा। मैं यह सोच के ही डर जाता की अगर वो चार्टर्ड नही बनी तो...उफ़ इसके आगे मैं सोच ही नही पाता और मेरी धड़कन यकायक बड़ी तेज़ हो जाती।
उसे पता था, उसके बिना मैं कितना अकेला हो जाता हू, और कितना नीरीह भी। जबसे वो मेरे जीवन में आई उसने एक केन्द्र बना दिया। ऐसा नही था, की उसके पहले मेरी कोई पहचान न रही हो, पर इस सर्वथा नवीन पहचान में एक पुलक थी। एक बड़ा ही अलग सा अहसास...
हवाए मानो सरगोशिया सी करती कहती की अब जीवन कुछ अलग है...काश यह अहसास बना रहता हमेशा के लिए. पर ऐसा नहीं हुआ उसकी यादें एक झोके की तरह मेरे मन मस्तिस्क को छू कर गुजर जाती है. जी करता है काश पूरी शिद्दत से मैं फ़ना के इस गीत के अंतरे को उसे सुना सकता, अपने उसी अहसास के साथ, जो की मेरी भावनाओ में रचा बसा है...
तेरी अदा भी हैं झोंके वाली, छू के गुजर जाने दे ।
तेरी लचक हैं, के जैसे डाली, दिल में उतर जाने दे।
आजा बाहों में करके बहाना, होना हैं तुझ में फना.
मुझे नहीं पता वो किस विचार प्रक्रिया से गुजरी, पर हठात उसका एक दम मेरे बारे में अपना विचार बदल लेना, मेरे लिए अबूझ ही रहा. शायद उसके हिसाब से यही सबसे बेहतर विकल्प था! बेशक मैंने बड़ी ख़ामोशी से अपने आप को एक किनारे कर लिया. सिवाय पागलपन के उस छः आठ महीने के दौर के, के जब मैं बच्चो की तरह रोते हुए उसे मनाने की कोशिश करता था, मैं स्तंभित होता था, आखिर वो मेरी बात समझती क्यों नहीं? पर मुझे क्या पता की जिस रात वो फ़ोन पर रात के दो बजे तक मुझसे मेरे बिना एकदम नहीं रह पाने की बात कर रही है उसके बस अरतालिश घंटे के भीतर, वो एकदम अलग निर्णय पे पहुची रहेगी। उन आरोपों से, उन अनर्गल बातों से मैं काफी आगे आ चुका हू, और पहले के बनिस्पत अब बहुत मजबूत भी हो गया हू, पर आज भी उसके प्यार के उन पलों पर मैं शक नहीं कर पाता की वो झूठे थे. मैं आज भी उसके समर्पण के पलो में वही खुशबू महसूस करता हू, जो की तब मैं महसूस करता था, वो मुझे आज भी बनावटी नहीं लगती, न ही उसका प्यार बनावटी लगता है।फिर उसने कैसे मेरे बारे में इतनी निम्न स्तर की बातों को समर्थन दिया? कैसे वो सभी को फ़ोन कर कर के, मेरे बारे में तथाकथित "सुनी हुई बातों को" प्रमाणिकता का रंग देने की कोशिस करती रही!...आखिर उसने यकीं कैसे कर लिया...? ये सवाल मैं अपने आप से इन बीते दो तीन बरसो में न जाने कितने बार पूछ चुका हू.
कितनी विचित्र बात है, उसके जिस सीए के रिजल्ट के पहले की रात समूची रात मैं सो नहीं पाता था, पेपर उसका हो रहा था और तनाव मुझे इतना ज्यादा हुआ की मैं मोटर साईकिल से गोरखपुर से लखनऊ पहुच गया, और वो भी सिर्फ चार घंटे में। वो लड़की सीए का अंतिम ग्रुप का परिणाम निकलने के दिन मुझसे कह रही थी की वो मुझे क़ानूनी तौर पर भी मुक्त कर देगी.
"मुझे तुम कैसे मुक्त कर सकती हो, दम दूर जा सकती हो, पर तुम्हारी यादे मेरी है, तुम मेरी हो और मैं तुमसे बाधा हुआ हू इसका अहसास मेरा है और मेरे इस अहसास से तुम मुझे नहीं मुक्त कर सकती...कभी नहीं।" उससे मैंने कहा था, और उसके बाद रुधे गले से मैंने कहा "विक्कू, तुम जबतक नहीं लौटोगी मैं तुम्हारा इंतजार करुगा, मैं तुम्हारा पति था, पति हू और हमेशा तुम्हारा ही रहूँगा." निश्चित ही मैंने नहीं सोचा था की जब वो ऐसा कह रही थी, उसके लगभग पचास दिन पहले ही वो तलाक़ के कागज पर हस्ताक्क्षर कर चुकी थी, न ही एक बार भी उसने मुझसे बताया, पर खैर।यकीनी तौर पर उन लोगों ने यही सोचा होगा की मैं अदालत में उसका प्रतिवाद करूँगा, पर मैं उस लड़की की प्रतिष्ठा पर खुद हमला नहीं बोल सकता था, जो मेरी पत्नी रही हो, लिहाजा मैंने तलाक़ को एक्स पार्टी हो जाने दिया. मैंने कभी भी, कही भी उसके खिलाफ कुछ नहीं कहा, और कहुगा भी नहीं. समय सबसे अच्छा मलहम है और समय के साथ एक दिन मैं अधिकांश बातों को भूल जाउगा और मैं उसी दिन का इंतजार कर रहा हू.
जहाँ तक बज रहे गीत का सवाल है, तो उसके बोल किसी अलग दुनिया की बात कर रहे है, शायद

हैं जो ईरादे बता दूँ तुम को, शरमा ही जाओगी तुम.
धडकने जो सुना दूँ तुमको, घबरा ही जाओगी तुम.
हम को आता नही हैं छुपाना, होना हैं तुझ में फना |

सर्दिया या पतझड़ हमेशा नहीं रहेगे, बहारे फिर आएगी, जीवन अन्ततः बहुत खूबसूरत है !