Tuesday, February 19, 2013

अथ ससुरी अरुंधती कथा !


अभी-अभी खबर आई है कि मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थल पचमढ़ी के बारीआम में हत्यारे, कुकर्मी और नराधम नक्सलियों की समर्थक अरुंधती रॉय के पति प्रवीर किशन का बंगला अवैध बना हैं, अरुंधती जी अब इसे भारत की पूजीवादी शोषक सरकार की उन जैसे गरीब महिला के विरुद्ध दमन का एक और उदहारण बताती फिरेगी...

वैसे भी अरुंधती साहिबा कभी कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा मानने से इंकार कर बैठती है तो कभी मासूम और निर्दोष इंसानों के हत्यारे नक्सलियों को देशभक्त ठहरा देती है, अन्ना के आन्दोलन को “खाली लिफाफा” का आन्दोलन बता डालती है तो कभी आंकड़े जमा करने को लेकर नीलकेणी का जुनून उन्हें पूंजी वाद से प्रेरित लगता है तो उन्हें इस बात से भी खासी परेशानी होती है की योरोप, अमेरिका और इजऱाइल अपने हथियार उद्योग को चीन को आउटसोर्स क्यों नहीं करते । उनकी सनक यही नहीं ख़त्म होती उन्हें अम्बानी बंधुओ के बंगले से और यहाँ तक कि उसके नाम “एंटिला” तक से खासी परेशानी है ...

...और मजेदार बात यह है की यह कोई भी बात भांग के नशे का नतीजा नहीं !!!

अब पता नहीं उन्हें बुकर पुरस्कार क्यों मिला, पर उनके अलावा और किसी को मिला कोई भी पुरस्कार सिर्फ और सिर्फ पूजीवादी शाजिश का नतीजा और पुरस्कार पाने वाला पुजीपतियो की कठपुतली नज़र आता हैं, हमारी अरुंधती जी के ज्ञान की सीमा तिब्बत की सीमा के पहले ही ख़तम हो जाती है और आँखे चीन के तिब्बत में और सिक्यांग में दमन को देखते ही अंधी हो जाती है, उनका यही हाल पाकिस्तान से जुड़े मसलो पर भी होता है...

अरुंधती को भारत के लोकतंत्र से बड़ी शिकायत है, भारत की आधारभूत ढाचे का विस्तार उन्हें गरीब और मजलूम लोंगो को उनकी जमीन से वंचित करने की शाजिश नज़र आता है पर यही काम चीन करता है तो वह अपने देश की गरीबी दूर कर रहा होता है, उन्हें भारत के राष्ट्र गीत और झंडे से साम्प्रदायिकता की बू आती हैं, हरेक बात पर चीन की दम सहलाती अरुंधती रॉय यह भूल जाती है, कि यह भारत का लोकतंत्र ही है, जो उन्हें इतनी बकवास की देता है, वरना यही काम अगर वो अपने प्राण प्रिय पीपल्स रेपुब्लिक ऑफ चायना में कर रही होती, तो अबतक चीन उन्हें अपने किसी चौराहे पर उल्टा लटका के उनका मुरब्बा अपने देश के मुर्दा खोरो को खिला चूका होता, या फिर उनको भी थियानआनमन चौक के प्रदर्शनकारियों की तरह टैंक से पीस कर  पापड़ बना चुका होता ...

...पर अपने सनक में अरुंधती को यह सब कुछ नज़र नहीं आता| उन्हें भारत नामक राष्ट्र की सुरक्षा के लिए हथियारों की खरीद से बड़ी आपत्ति है, पर कुकर्मी नक्सलियों की ऐके-47 और रॉकेट लांचर जन प्रतिरोध के हथियार नज़र आते है, और बड़ी बेशर्मी से वो अपने सोच के दोगलेपन से आँखे मूंद लेती हैं|

बहुत जादा विस्तार में न जाते हुए मै अब अपने पाठको से बस एक जबाब चाहूँगा कि , क्या अरुंधती राय अपने कर्मो से इस भारत नामक राष्ट्र में जुतियाये जाने की पात्र है या नहीं ?

आख़िरकार उनकी तरह मुझे भी इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है हि लिहाज़ा मै इस सवाल को पूछ रहा हूँ, अब ये अलग बात है की उनकी बेशर्मी इसे अभिव्यक्ति की सीमा का अतिक्रमण माने, ठीक वैसे ही जैसे नक्सलियों और अफजल गुरु के मानवाधिकार की उन्हें बहुत फ़िक्र होती पर नक्सलवादियों द्वारा क़त्ल किए लोंगो के मानवाधिकार के मुद्दे पर वो बेशर्म होकर न सिर्फ इस जनसंहार पर खेद व्यक्त करने से भी इनकार कर देती है बल्कि इन  हत्याकांड
को दुरुस्त ठहराने के लिए प्रतिरोध से परिभाषित कर देती है और दंतेवाड़ा के हत्यारों के पक्ष में एक लम्बा लेख लिख, उन्हें देशभक्त ठहराने की बदमिजाज बेवकूफी भरी, बेशर्म और मुर्खता पूर्ण कोशिश भी करती हैं|
चीन के एक संग्रहालय में माओ के जूते रखे हैं, हम इंतजार में है उन्हें चाटती अरुंधती रॉय की तस्वीर कब हमारे सामने आएगी ???