Saturday, July 20, 2013

तू मेरी जान ही ले ले, बड़ा बदमाश है तू ...!

दिदिया रे !
मैंने उस वक़्त को, बेडी में बाँध रखा है|
बचा रखी है,
छत पे सूखती, अमिया की खुशबू |
छिपा रखा है,
बारिश की निमौली का, तित-मीठा सा रस|

आज आँगन में उतरते, जब फिसला,
तेरी ताकीद, हवाओं संग उभरी फिर से,
तू देख कर, क्यू नहीं चलता ? भाई मेरे !
घुटना फिर आज, तो, ना छिला, तेरा ?

आज फिर गाव में हूँ, खड़ा दलाने में|
देखता वक़्त को, बरसो पीछे से|
की तभी, कोने वाले कमरे के, कोने से,
पटरे पे रखी, पुरानी, लोहे वाली पेटी
फुसफुसाती सी, मुझसे बोली,
आ खोल मुझको ! देखना यक़ीनन,
पीछे से आयेगी, दिदिया तेरी,
"तूने फिर खोली संदूकची मेरी " कहती|
और आँखों में, रूठी रूठी |
तू मनाना जबतक रूठी बहना,
समय रोक रखूगी, यहाँ कमरे में|

एक खुशबू सी आती है, गुजर जाती है|
सालों साल लम्बे, दालानों से रहगुजर मै, जब |
ये पांच सीढिया, दायरा बीस बरसों की,
चढ़ता हू, बारहा उतरता हूँ|
की तभी दौड़ता मै! “बच्चा बस आठ बरस”
सर्र से गुजरा बगल से मेरे, नीचे की तरफ
और अंतिम से ठीक पहले की चौथी सीढ़ी पर फिसला,
जा गिरा, धप्प ! नीचे जमीं पर,
गुल्मगर्दे पे तेरा साया उभरा, कहता ...
तू मेरी जान ही ले ले, बड़ा बदमाश है तू ...!

***(कश्यप किशोर मिश्रा )*** —