Friday, January 1, 2010

नए साल की सुबह...

आज भी अख़बार आया देर से,
ख़बरें वहीँ बस तारीख बदली सी,
एक रस्म निभाते जैसे,
वही चेहरे, वही वादे, वही नारे।

हमेशा कि तरह वसूली करती पुलिस,
ट्रक वालों से,
कि समय हों चुका है "प्रवेश नहीं" का,
...नशे कि खुमारी उतारता एक थानेदार,
याद करता...
उस गोस्त कि लज्ज़त,
जिसकी साँस चलती थी, प्रतिरोध था,
चीखे थी और अंतत, बची रह गयी,
आँखों में बस एक मूक याचना
"अब तो जाने दो"।

रोती नौकरानी
याद करती मां को, और सुबकती है,
उम्र बस सोलह है और बचपना भी है।
उसमे यही तो "वह" है,
जो मालिक को पसंद है।
सिसकती है गावं की भोली बच्ची,
अपने ही मुह से ये सब कहे किससे।

जन्मे है आज, फिर ढेर सारे बच्चे
जिनकी किस्मत में बचपना नहीं है।
नुक्कड़ पर चीख रहा है एक बाप,
अपने मासूम बेटे पर,
"कम्बखत" मर क्यों नहीं जाता,
बस तू ही नहीं है,
और भी बच्चे है मेरे,
मुझे आसरा देने को।
सोचता है बेचारा बच्चा
वो आसरे के लिए,
किस "और" बाप के पास जाये।

याद करती है एक सैनिक कि विधवा,
अपने पति कि शहादत और,
दौड़ती है दफ्तर दर दफ्तर,
पेंसन मुल्तवी है...
थक हार थूकती है,
उस भावना पर...
जिसके लिए उसका पति शहीद हुआ।

रो रहा है एक रिक्सा वाला,
शिकायत जाये करे किससे,
एक सामान कि तरह उठा ले गाए,
उसकी बीबी,
माननीय मंत्री जी के कुछ गुंडे।

फुटपाथ पर एक लाश पड़ी है,
ठण्ड से मर गए
एक भिखारी की...

एक बच्ची निकलती है, घर से,
बाटने को गुलाब,
कहने सभी को "मंगलमय नव वर्ष"

पर...
लाश देखती है, रुक जाती है।
घुटने के बल झुक कर,
न जाने क्या बुदबुदाती है,
और डाल देती है उस निर्जीव पर,
सारे के सारे गुलाब,
लौट जाती है घर,
बिना किसी को कहे,
मंगलमय नववर्ष, चुपचाप।

दम तोडती मनुष्यता
जी उठी...
खीची उसने एक जीवनी साँस,
उस भावना के नाम,
जो लाश पर अर्पित हुए,
बच्ची के गुलाबों के साथ।

कश्यप किशोर मिश्र,
नव वर्ष पर प्रातः ००:१० पर,

3 comments:

  1. आपको और आपके परिवार को नव वर्ष मंगलमय हो!

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  2. you are superb.
    gupta sir was right,you are our Rancho

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  3. हमेशा ही आप से स्तंभित होती रहती हू, ये कविता भी इसका अपवाद नहीं है. आपके मानवीय सरोकार दिल को स्पर्श करते है.

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