Monday, October 18, 2010

सपने बुनता आदमी...

दिल्ली बदल गयी है, ऐसा कुछ भी नहीं लगा, हाँ कुछ साफ़ जरुर लगी, राष्ट्रकुल खेलों ने दिल्ली की जीवन शैली को कुछ बदला, कहना मुश्किल है, पर बीते दो सालों में इसी के बहाने आधारभूत काम कुछ तेज़ जरूर हो गए, और इस तेजी का सहरा ले कर कुछ लोगों ने अपनी गाठे भी भर ली।

इन खेलों ने, एक बात और साफ कर दी की हमारे किसी भी हिंदी अख़बार के संपादन विभाग के कार्मिको को कामनवेल्थ शब्द का हिंदी अर्थ नहीं मालूम!!!

दिल्ली में कृष्ण के साथ हूँ, अभी हालाँकि हिस्स... का प्रोमो चल रहा है पर ध्यान संजय लीला भंसाली की आने वाली फिल्म "गुजारिश" के प्रोमो में अटका हुआ है, एक सपने के उलझे ताने बाने के साथ...

अच्छा लगता है! भंसाली के बुने सपने से रहगुजर होना। चाहे वो "ब्लैक" रही हूँ या फिर "देवदास" या फिर "हम दिल दे चुके सनम" ... सपने बुनता आदमी..देखे "गुजारिश" कैसी होती है, वैसे कमबख्त "सावंरिया" का ख्याल भी आ ही जाता है।

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