मुझे माफ़ करना , प्रिया !
कि, कल की ठकुरसुहाती ठण्ड
और काम के बोझ के बीच,
जब भूल गया मै ...
तुम्हारा आज का जन्मदिन।
तो आधी रात के, बारह बज कर एक मिनट पर,
केक के बदले मैंने , कविता लिखने का वादा किया ...
मै वो वादा पूरा नहीं कर पा रहा ...!
तुम्हे पता है?
कि , जब हमारे बीच
मान-मनुहार चल रही थी,
ठीक उसी दौरान ,
सिंगापुर के एलिजाबेथ अस्पताल में,
दिल्ली के दरिंदों की रौंदी, एक लड़की,
अपनी आखरी सांसे गिन रही थी।
उस आखरी वक़्त में भी ...
वह जीना चाहती थी ...!
ऐसा उसने अपनी माँ को,
कागज पर, चंद सतरों में लिखा।
हाँ, प्रिया !
वह बस जीना चाहती थी,
जीने के लिए, उसकी कोई शर्त नहीं थी,
उसका कोई अपराध नहीं था,
वह किसी युद्ध क्षेत्र में नहीं थी,
ना ही , किसी आपराधिक गुट बाजी का शिकार थी,
वह बलिया के,
एक बड़े ही सामान्य परिवार की,
छोटी सी बच्ची थी,
डाक्टर बनने का सपना पाले-पाले
खुद एक सपना बन चली।
मुझे नहीं मालूम ...
उसका क्या नाम था?
कुछ भी हो,
क्या फर्क पड़ता है?
अब वो कोई,मनमोहन सिंह या
शीला दिक्षित की बेटी तो थी नहीं ...
क्या फर्क पड़ता है?
मुझे डर लग रहा है, प्रिया !
सुबह तुम्हे छोड़कर आते और
रात ढले वापस लौटने का अंतराल
डरावना लग रहा है!
तुम भी तो, मनमोहन सिंह की बेटी नहीं हो।
और मेरी बिटिया तो और भी असहाय है ...
अब इस हाल में ,
कोई भी,
जन्मदिन की कविता कैसे लिख सकता है?
मै कुछ कर भी नहीं सकता,
ऐसा नहीं है,
कि देश में आपातकाल लगा है,
पर दिल्ली में,धरा एक सौ चौवालिस लगी है
और, प्रदर्शनकारियों की, दिल्ली पुलिस
बड़ी गहरी, तुड़ाई कर रही है।
जिस गुंडई से बचते, शरीफ़ शहरी
मतदान करने नहीं जाता था।
वह गुंडई,
संसद और विधानसभा से निकल कर
आम आदमी के आगन में आ खड़ी है।
सरकार बड़ी चालाक है, प्रिया!
वो एक सिपाही के हार्ट् अटैक को
प्रदर्शनकारियों की हिंसा बता देती है,
और दिल्ली पुलिश
आठ-आठ लडको का
जुगाड़ भी कर देती है,
कि , ये क़त्ल के मुजरिम है !
आज तो उनतीस दिसंबर है,
नया साल, देहरी पर है,
और मै निराश हूँ,
बहुत ही निराश !
पर इस उतरते पुराने साल
और चढ़ते नए साल की बेला पर,
एक वादा है!
तुमसे भी और नए साल से भी,
कि, मै माफ़ नहीं करूँगा ...!
न,इस व्यवस्था को,
न, इस समाज को,
न, इस सरकार को।
मै बदल दूंगा ...!
जितना बदल सकता हूँ ,
कम से कम , उतना तो जरूर बदल दूंगा ,
...और यह, एक बेटी के पिता का वादा है!
...कश्यप किशोर मिश्रा
कि, कल की ठकुरसुहाती ठण्ड
और काम के बोझ के बीच,
जब भूल गया मै ...
तुम्हारा आज का जन्मदिन।
तो आधी रात के, बारह बज कर एक मिनट पर,
केक के बदले मैंने , कविता लिखने का वादा किया ...
मै वो वादा पूरा नहीं कर पा रहा ...!
तुम्हे पता है?
कि , जब हमारे बीच
मान-मनुहार चल रही थी,
ठीक उसी दौरान ,
सिंगापुर के एलिजाबेथ अस्पताल में,
दिल्ली के दरिंदों की रौंदी, एक लड़की,
अपनी आखरी सांसे गिन रही थी।
उस आखरी वक़्त में भी ...
वह जीना चाहती थी ...!
ऐसा उसने अपनी माँ को,
कागज पर, चंद सतरों में लिखा।
हाँ, प्रिया !
वह बस जीना चाहती थी,
जीने के लिए, उसकी कोई शर्त नहीं थी,
उसका कोई अपराध नहीं था,
वह किसी युद्ध क्षेत्र में नहीं थी,
ना ही , किसी आपराधिक गुट बाजी का शिकार थी,
वह बलिया के,
एक बड़े ही सामान्य परिवार की,
छोटी सी बच्ची थी,
डाक्टर बनने का सपना पाले-पाले
खुद एक सपना बन चली।
मुझे नहीं मालूम ...
उसका क्या नाम था?
कुछ भी हो,
क्या फर्क पड़ता है?
अब वो कोई,मनमोहन सिंह या
शीला दिक्षित की बेटी तो थी नहीं ...
क्या फर्क पड़ता है?
मुझे डर लग रहा है, प्रिया !
सुबह तुम्हे छोड़कर आते और
रात ढले वापस लौटने का अंतराल
डरावना लग रहा है!
तुम भी तो, मनमोहन सिंह की बेटी नहीं हो।
और मेरी बिटिया तो और भी असहाय है ...
अब इस हाल में ,
कोई भी,
जन्मदिन की कविता कैसे लिख सकता है?
मै कुछ कर भी नहीं सकता,
ऐसा नहीं है,
कि देश में आपातकाल लगा है,
पर दिल्ली में,धरा एक सौ चौवालिस लगी है
और, प्रदर्शनकारियों की, दिल्ली पुलिस
बड़ी गहरी, तुड़ाई कर रही है।
जिस गुंडई से बचते, शरीफ़ शहरी
मतदान करने नहीं जाता था।
वह गुंडई,
संसद और विधानसभा से निकल कर
आम आदमी के आगन में आ खड़ी है।
सरकार बड़ी चालाक है, प्रिया!
वो एक सिपाही के हार्ट् अटैक को
प्रदर्शनकारियों की हिंसा बता देती है,
और दिल्ली पुलिश
आठ-आठ लडको का
जुगाड़ भी कर देती है,
कि , ये क़त्ल के मुजरिम है !
आज तो उनतीस दिसंबर है,
नया साल, देहरी पर है,
और मै निराश हूँ,
बहुत ही निराश !
पर इस उतरते पुराने साल
और चढ़ते नए साल की बेला पर,
एक वादा है!
तुमसे भी और नए साल से भी,
कि, मै माफ़ नहीं करूँगा ...!
न,इस व्यवस्था को,
न, इस समाज को,
न, इस सरकार को।
मै बदल दूंगा ...!
जितना बदल सकता हूँ ,
कम से कम , उतना तो जरूर बदल दूंगा ,
...और यह, एक बेटी के पिता का वादा है!
...कश्यप किशोर मिश्रा
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