Saturday, March 15, 2014

गांधीवाद को गडमड करते केजरीवाल


महात्मा गाँधी का असहयोग आन्दोलन अहिंसक था| अत्यंत अनुशासित कांग्रेस सेवादल के कार्यकर्त्ता विनम्रता पूर्वक अंग्रेजी-राज के खिलाफ़ असहयोगरत थे, अंग्रेजी राज की चूले हिल रही थी और समूचे भारत में उल्लास का माहौल था, हिंदुस्तान को क्षितिज पे अपनी स्वतंत्रता दीख रही थी|


अनुशासनहीनता उल्लास को भी उन्माद में बदल देती है। एक अनुशासित तंत्र की पहली इकाई व्यक्ति होता है और दुर्भाग्य से गोरखपुर के चौरी-चौरा में सविनय-अवज्ञा से जुड़े एक प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे नेता और कार्यकर्त्ता, एक अहिंसक आन्दोलन के लिए जरुरी अनुशासन और धैर्य से पूर्ण नहीं थे। पुलिस की अराजकता के खिलाफ़ चौरीचौरा में प्रदर्शन कर रहे किसान भी अराजक हो उठे और उन्होंने पुलिसकर्मीयों सहित थाने को फूंक डाला। एक शांतिपूर्ण, अहिंसक और बेहद सफल आन्दोलन में अराजकता की यह पहली घटना थी।
इस अकेली घटना ने गाँधी के मन में लोक-हित से जुड़े मुद्दों को उठाने के तरीकों की बनियाद तैयार करने का काम किया था, पर यह सन्दर्भ मार्च-22 का है। आज के सन्दर्भ में सामाजिक विमर्श के मुद्दे और उनसे जुडी विचारधाराओं की सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि इन मुद्दों को उठाने वाले कौन हैं? लोक जीवन से जुड़े मुद्दे अगर लोक द्वारा अथवा लोक के सामाजिक प्रतिनिधियों द्वारा उठाए जायें, तो यह प्रायः सही दिशा में होते हैं पर सत्ता की होड़ में शामिल राजनीतिक दल अक्सर लोक-जीवन से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण कर देते हैं और वो अपने उठाए जाने की सही दिशा से विचलन का शिकार हो जाते हैं।  इसकी वजह है कि प्रायः राजनीतिक दल लोक-जीवन के मुद्दों का इस्तेमाल अपने साध्य को हासिल करने के लिए साधन के रूप में करते रहे हैं और यहाँ किसी भी राजनीतिक दल के लिए उठाये गए मुद्दे को हल करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि किस तरह इस मुद्दे पर वो अपने विरोधियों को गलत साबित कर कटघरे में खड़ा कर दें और इसका राजनीतिक लाभ ले सकें।
राजनीतिक दुविधा की इस दशा और दिशा को गाँधी ने बहुत ठीक-ठीक समझा था, यही वजह थी कि कांग्रेस के सेवादल के कलेवर को बरक़रार रखने के लिए उन्होंने अपनी मौत के ठीक पहले कांग्रेस को भंग करने की सिफारिश भी की थी, क्योंकि गाँधी “ब्रिटिश-राज सिंड्रोम” से प्रभावित एक राजनीतिक दल के शासन के अधीन स्वशासन की जगह प्रत्येक व्यक्ति के स्व-शासन स्व-नियंत्रण से संचालित होने वाले सेवादलों का शासन चाहते थे।
गाँधी को यह भली-भांति मालूम था कि चाहे राजतंत्र या तानाशाही हो या लोकतंत्र, एक शासक अपने बुनियादी चरित्र में पीडक बन ही जाता है, अगर उसका अपने कृत्यों और विचारधारा पर नियंत्रण न हो। यही वजह थी कि गाँधी के लिए स्वशासन का अर्थ असल में ब्रिटिश-राज से मुक्ति न होकर भारतवासियों का अपने ऊपर, अपने कृत्यों पर नियंत्रण करना, अर्थात स्व-नियंत्रण होना था। गाँधी इस मुल्क को एक भीड़ के तंत्र में तब्दील कर एक “अराजक व्यवस्था” के हवाले नहीं करना चाहते थे। यहाँ यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जब ठीक उनके विपरीत राह अपनाने वाले सुभाषचन्द्र बोस भी गाँधी के इस विचार से पूर्णतः सहमत नजर आते है, पर सुभाष के लिए भारतीयों के भीतर इस स्व-नियंत्रण या अनुशासन पूर्ण जीवन की राह “कम से कम पच्चीस वर्ष के सैनिक शासन” से होकर निकलती थी।
किसी भी तंत्र की पहली इकाई व्यक्ति होता है, किसी भी विचार से प्रेरित होने वाला और उसका प्रेरक दोनों ही एक व्यक्ति होते है। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी तंत्र से, किसी विचार या विचारधारा से अगर अराजकता समाप्त करनी हो, तो उसकी पहली इकाई मनुष्य की अराजक सोच पर लगाम लगाने की जरुरत है। शायद यही वजह है कि दुनियाभर के विचारक, वो चाहे गाँधी हों या सुकरात, किसी भी तंत्र से अराजकता समाप्त करने के लिए तंत्र नहीं अराजक विचारो पर नियंत्रण की बात करते रहे हैं। शायद यही वजह है कि गाँधी के आंदोलनों का केंद्र-बिंदु व्यक्ति होता था, अगर विदेशी वस्त्रों का विरोध करना है, तो हरेक व्यक्ति चरखा ख़ुद काते। विरोध करने के लिए गाँधी भीड़ नहीं जुटाते थे, वे कहीं इकठ्ठा होने का आहवान नहीं करते थे, बल्कि गाँधी का आन्दोलन हमेशा ही विकेन्द्रित होता था, व्यक्तिनिष्ठ होता था। वह आदमी को आदमी बने रहने देना चाहते थे, उसे भीड़ में तब्दील नहीं करते थे।
इसकी बड़ी ही सीधी वजह है कि किसी भी विचार को भीड़ के दबाव से बचाए रखना एक कठिन काम है। यह कठिनाई तब और बढ़ जाती है, जब व्यक्ति के तौर पर भीड़ में शामिल लोग किसी वैचारिक अनुशासन से रहित हों। वस्तुतः विचार कैसे भी हो, अगर उसमें अराजकता के तत्व मौजूद हैं तो वो अन्ततः मनुष्य विरोधी विचार हैं और ऐसे अराजक विचार से उपजे कृत्य, व्यक्ति और उनके समूह अन्ततः विनाशकारी होते हैं।  तो जब अरविन्द केजरीवाल कह रहे होते हैं कि उनकी अराजकता आम-आदमी के भीतर की अराजकता का प्रतिनिधित्व है, तो वास्तव में वह आम-लोक का या उनकी समस्याओं का प्रतिनिधित्व न कर आम-लोक के एक अराजक तबके के व्यवहार का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो जनता के अराजक तबके का नेतृत्व कर रहे होते हैं।
किसी भी तंत्र की अराजकता समाप्त करने के लिए अराजकता पैदा करना और उसे समर्थन देना अन्ततः एक मूर्खतापूर्ण विचार है और जहर को जहर काटता है, जैसे लोकोक्ति के जरिये इसे समर्थन देने के पहले यह ध्यान रखना जरुरी है, कि ज़हर से ज़हर को काटने की प्रक्रिया एक विशेषज्ञ प्रक्रिया होती है, जो प्रयोगशालाओं के भीतर अत्यंत नियंत्रित तरीके के साथ की जाती है, न की आम जनता की “मुंडे-मुंडे मतिभिन्ना” वाले अनियंत्रित माहौल में। आज जब केजरीवाल सत्याग्रह और गाँधी की बात करते लोगों को दिल्ली आकर दिल्ली जाम कर देने का आहवान करते हैं, तो वह एक व्यक्ति की व्यक्तिनिष्ठ ताकत का उपहास उड़ाते हैं। यही नहीं वह व्यक्ति को ख़ुद में एक सम्पूर्ण विचार से छोटा करके भीड़ की मनोदशा से संचालित एक “उपकरण” में बदल देते हैं, जो एक मनुष्य का वैचारिक पतन है।
तो जब केजरीवाल गाँधी के रास्ते की बात कर रहे होते हैं  तो वह अपना ही उपहास कर रहे होते हैं। गाँधी भीड़ से व्यक्ति को अलग करके उसे अपने दायित्व का बोध कराते थे, जबकि केजरीवाल व्यक्ति को उसकी अपनी सोच से इतर भीड़ की सोच में तब्दील कर दे रहे हैं। कहाँ तो केजरीवाल से हमारी अपेक्षा यह होनी चाहिए थी कि वह एक व्यक्ति के भीतर निहित अराजकता को नियंत्रित कर उसे एक अनुशासित नागरिक बनने का पाठ पढ़ाते और कहाँ केजरीवाल साहब घरों के भीतर की अराजकता को भीड़ के सामूहिक अराजक उदघोष में तब्दील कर दे रहे हैं।
तो जब केजरीवाल गांधी और सत्याग्रह की बात करते हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जिस अराजकता की एक घटना की वजह से गाँधी ने सम्पूर्ण भारत में सफल अपने आन्दोलन को वापस ले लिया था, उसी अराजकता का दामन थाम केजरीवाल अपना आन्दोलन सफल बनाने चले हैं। केजरीवाल गाँधी के साथ नहीं, गाँधी के विरोधी विचारों के साथ हैं और उन्हें वास्तव में अभी गाँधी के सत्याग्रह का पहला पाठ भी सीखना बाकी है।
 दिल्ली के अखबार "नया इण्डिया" में छपे लेख का लिंक  ;-  गांधीवाद को गडमड करते केजरीवाल



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गांधीवाद को गडमड करते केजरीवाल

Sunday, March 9, 2014

बेटियों के पापा


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दुनियाँ के मेले में,
कुछ पिता,
बेटियों के पापा होते है|
अपनी नन्ही बेटियों को
काँधे टिकाये
बिता देते है, सारी रात,
बिटिया को सुलाते 
ख़ुद जागे -जागे|

दुनियां के बाकी पापाओ से
एकदम अलग,
ये बेटियों के पापा
तो बस, बेटियों के पापा होते है |

ये अपनी बेटियों को सिखाते है,
साहस और बहादुरी की बाते|
ये थमा देते है, अपनी बेटियों को साइकिल
थाम लेते है, उसका कैरियर, मजबूती से
और कहते है बेटियों को, बहादुर बनो
मारो पैडल|
और कुछ देर बाद, छोड़ देते है, साईकिल का कैरियर भी|
बेटियां गिर पड़ती है, साइकिल से
और पूछती है
"कैरियर क्यूँ छोड़ा, पापा"
तो ये बेटियों के पापा कहते है,
आज कैरियर छोड़ा
अब कल, इसपर बिठा कर मुझे चलाएगी तू|
और सर सहलाते कह उठते है "बन बहादुर"

बेटियों के पापा, अपनी ताकत पहचानते है|
वह खड़े रहते है,
बेटियों की राह में 

उनके रखवार बनकर |

समय के साथ, बेटिया बड़ी और पापा बूढ़े हो जाते है|
अब पापा जर्जर दिवार हो जाते है|
वो रोक नहीं सकते और जादा
अपनी बेटियों की किसी मुश्किल को,
अब वो ख़ुद बूढ़े हो चुके होते है, कमजोर |
इधर बेटिया बड़ी और बहादुर है|
पिता डरता है, समाज से
जो उसकी बेटियों की बहादुरी पसंद नहीं करता
पिता जानता है,
इस समाज के लिए बस एक शिकार है, उसकी बेटियाँ|
पर अब वह बूढा और कमजोर हो चला है|

वह रोकना चाहता है, अब भी
अपनी बेटियों की राह की हर मुश्किल
पर लाचार है|
पर वह रोक सकता है, अपनी बेटियों को |
तो वह रोकने लगता है, अपनी बेटियों को|
बेटियाँ इसे समझ नहीं पाती,
उन्हें यह बड़ा विचित्र लगता है|
पिता का टोका-टोकी करना हर बात पर,
उन्हें परेशान करता है|
वे विद्रोह करती है, पिता से|

एक दिन वो पिता के डर के पार उतर जाती है |
इधर पिता सहलाते है, बेटियों की तस्वीरे,
अकेले में|
वे याद करते है, बेटी की डगमगाती साइकिल,
और फिर सर्र से चलाती साइकिल|

पर वो यह सब बताते नहीं|
अब उन्हें डरपोक होना सुहाता है|

देर रात, कुर्सी की पुस्त पर सर टिकाये पिता,
गर्व कर रहे होते है, अपनी बेटियों पर
कि तभी एक हल्की चट् आवाज होती है|
पिता पहचानते है, अपनी बेटियों की
दबी-छुपी, छुपा-छुपी पदचाप|

तौलिये से वह चेहरा पोछ कठोर हो जाते है|
आमने-सामने अब बेटी-पापा,
पापा कड़कते है
"यह कोई वक्त है, आने का"
बेटी सर झुकाए आगे बढ़ जाती है,
सोचती "कितना बदल गए है, पापा"
इधर पापा बडबडा रहे है|
"हाथ से निकलती जा रही हो, तुम"

अपने अपने बिस्तर में सोये, पापा-बेटी|
पापा चाहते है कहना, बेटी तुम सही हो,
पर मै डरपोक हूँ|
कहना चाहती है, बेटी, वैसी ही तो बनी, पापा
जैसा बनाना चाहते थे, तुम
फिर, यह सब क्या ?

दोनों सही है|
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कश्यप किशोर मिश्र