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दुनियाँ के मेले में,
कुछ पिता,
बेटियों के पापा होते है|
अपनी नन्ही बेटियों को
काँधे टिकाये
बिता देते है, सारी रात,
बिटिया को सुलाते
ख़ुद जागे -जागे|
दुनियां के बाकी पापाओ से
एकदम अलग,
ये बेटियों के पापा
तो बस, बेटियों के पापा होते है |
ये अपनी बेटियों को सिखाते है,
साहस और बहादुरी की बाते|
ये थमा देते है, अपनी बेटियों को साइकिल
थाम लेते है, उसका कैरियर, मजबूती से
और कहते है बेटियों को, बहादुर बनो
मारो पैडल|
और कुछ देर बाद, छोड़ देते है, साईकिल का कैरियर भी|
बेटियां गिर पड़ती है, साइकिल से
और पूछती है
"कैरियर क्यूँ छोड़ा, पापा"
तो ये बेटियों के पापा कहते है,
आज कैरियर छोड़ा
अब कल, इसपर बिठा कर मुझे चलाएगी तू|
और सर सहलाते कह उठते है "बन बहादुर"
बेटियों के पापा, अपनी ताकत पहचानते है|
वह खड़े रहते है,
बेटियों की राह में
उनके रखवार बनकर |समय के साथ, बेटिया बड़ी और पापा बूढ़े हो जाते है|
अब पापा जर्जर दिवार हो जाते है|
वो रोक नहीं सकते और जादा
अपनी बेटियों की किसी मुश्किल को,
अब वो ख़ुद बूढ़े हो चुके होते है, कमजोर |
इधर बेटिया बड़ी और बहादुर है|
पिता डरता है, समाज से
जो उसकी बेटियों की बहादुरी पसंद नहीं करता
पिता जानता है,
इस समाज के लिए बस एक शिकार है, उसकी बेटियाँ|
पर अब वह बूढा और कमजोर हो चला है|
वह रोकना चाहता है, अब भी
अपनी बेटियों की राह की हर मुश्किल
पर लाचार है|
पर वह रोक सकता है, अपनी बेटियों को |
तो वह रोकने लगता है, अपनी बेटियों को|
बेटियाँ इसे समझ नहीं पाती,
उन्हें यह बड़ा विचित्र लगता है|
पिता का टोका-टोकी करना हर बात पर,
उन्हें परेशान करता है|
वे विद्रोह करती है, पिता से|
एक दिन वो पिता के डर के पार उतर जाती है |
इधर पिता सहलाते है, बेटियों की तस्वीरे,
अकेले में|
वे याद करते है, बेटी की डगमगाती साइकिल,
और फिर सर्र से चलाती साइकिल|
पर वो यह सब बताते नहीं|
अब उन्हें डरपोक होना सुहाता है|
देर रात, कुर्सी की पुस्त पर सर टिकाये पिता,
गर्व कर रहे होते है, अपनी बेटियों पर
कि तभी एक हल्की चट् आवाज होती है|
पिता पहचानते है, अपनी बेटियों की
दबी-छुपी, छुपा-छुपी पदचाप|
तौलिये से वह चेहरा पोछ कठोर हो जाते है|
आमने-सामने अब बेटी-पापा,
पापा कड़कते है
"यह कोई वक्त है, आने का"
बेटी सर झुकाए आगे बढ़ जाती है,
सोचती "कितना बदल गए है, पापा"
इधर पापा बडबडा रहे है|
"हाथ से निकलती जा रही हो, तुम"
अपने अपने बिस्तर में सोये, पापा-बेटी|
पापा चाहते है कहना, बेटी तुम सही हो,
पर मै डरपोक हूँ|
कहना चाहती है, बेटी, वैसी ही तो बनी, पापा
जैसा बनाना चाहते थे, तुम
फिर, यह सब क्या ?
दोनों सही है|
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कश्यप किशोर मिश्र


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