एक सच...
जो वक़्त के धुंधलके में,
गुम सा गया!
की जिस जगह खड़ी हों तुम,
वहा मैं होता था,
और
वो खाली बेंच,
तुमसे भरी होती थी,
वो दोपहर का टिफिन,
और
अचार, सब्जी,रायता,चटनी की
मिली जुली महक
कही यादों की गहराइयों में
आज भी बाकी है,
याद है अब भी,
जिस रोशनी में नहाई सी
दिख रही हों इस वक़्त,
वो मेरे कंधो पे पड़ती थी,
और
तुम्हारी हँसी खिलखिलाहट की गुनगुनाहट।
शाम ढलने तक,
दिन को ताज़ा रखती थी
कश्यप किशोर मिश्र,
एक तुरत फुरत लिखी कविता
जो वक़्त के धुंधलके में,
गुम सा गया!
की जिस जगह खड़ी हों तुम,
वहा मैं होता था,
और
वो खाली बेंच,
तुमसे भरी होती थी,
वो दोपहर का टिफिन,
और
अचार, सब्जी,रायता,चटनी की
मिली जुली महक
कही यादों की गहराइयों में
आज भी बाकी है,
याद है अब भी,
जिस रोशनी में नहाई सी
दिख रही हों इस वक़्त,
वो मेरे कंधो पे पड़ती थी,
और
तुम्हारी हँसी खिलखिलाहट की गुनगुनाहट।
शाम ढलने तक,
दिन को ताज़ा रखती थी
कश्यप किशोर मिश्र,
एक तुरत फुरत लिखी कविता
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