अंतस की प्रशांत गहराइयो की करक कही गहरे और बड़ी मारक कसक पैदा करती है। अब इसे हूक कहे या खामोशी, पर एक बहुत ही सर्द अहसास है, ये। वास्तव में इसकी सर्द और गहनता इतनी जादा होती है, की ठंड कही से भी , कभी भी, गुलाबी न नज़र आती है, न ही महसूस होती है। इन सर्दियों के साथ, जो की अब आने वाले माह के उत्तरार्ध के दौरान अपनी आहट का आभास कराने लगेगी , मेरे जीवन में तमामो तमाम दस्तके जुड़ी है, जो एक सम ताल पर उत्ताल होकर गूंज और अनुगूँज का अदभुद संगीत पैदा करती है। संगीत जो जीवन है, संगीत जो शांत चिरनिद्रा (मौत ) की सुखद लोरी भी है। इन दस्तको से पैदा हुआ जीवन-संगीत सभी के लिए बड़ा ही सुखद होता है। मधुर-मधुर आम की बौरों की खुशबु मिली मंद मंद बहती पुरवाई के सुखद अहसास की तरह। विगत तीन-चार वर्षो का एक अन्तराल यकीनन मुझे ऐसे किसी भी अहसास की अनुभूति से दो -चार होने से वंचित करता रहा, ठीक वैसे ही जैसे परिस्थितिया प्रतिकूल होने पर बर्फ से चमड़ी झुलस जाती है। पर निश्चित ही वही बर्फ, लू के मारे को जीवन का संचार भी करती है। पूर्व स्मृतिया प्रतिकूल परिस्थितियों में अक्सर एक अनंत कूप से पैदा हुई ध्वनियों की तरह हो जाती है, जिसकी सुर लय ताल करीब-करीब अनजानी सी प्रतीत होतीं है, एकदम अबूझ भी। इस अबूझ पहेली का अपना एक अलग संत्रास, एक अलग ही कस्ट है। हमे पता भी नही चलता और हमारे अन्तर की पीड़ा सघन और सघनतम होती जाती है। ऐसे ही पलों में अनजाने ही हमारा मस्तिस्क इस निष्कर्ष पर पहुच जाता है और अजाने ही स्वीकार भी लेता है की इन तमाम अन-अनुभूत परिस्थितियों और तमामो तमाम अबूझ पहेलियों का सर्जक वो स्वयम है । इस तरह की निष्कर्ष जनित खामोशी और अंतस में चलने वाला द्वंद आदमी को इतना तोड़ देता है की उन्हें दुश्मनों की जरुरत नही रह जाती।
पर अंधेरे की गहनता कितनी भी क्यो न हो, वो सुबह को नही रोक सकता। अवसाद और अंतर्द्वंद के इस लंबे चले अन्तराल ने मुझे ये समझाया की "अँधेरा कितना भी गहन क्यो न हो, रास्ता तो अपनी जगह मौजूद होता है, फर्क सिर्फ़ यही है, की सहज उजाले में वो सहज द्रिस्ट होता है, जबकि अंधेरे में वो हमें दिखाई नही देता" और दिखाई नही देने का आशय यह नही होता की रास्ता है ही नही, बल्कि धैर्य और ज्ञान (विवेक) का प्रकाश हमें गहन से गहन अंधियारे में भी पथ प्रर्दशित करता है।
...और उजाले में नो अपनी रह सभी पहचान लेते है, असली मजा तो अंधेरे में अपनी रह की पहचान से है। है न...!
पर अंधेरे की गहनता कितनी भी क्यो न हो, वो सुबह को नही रोक सकता। अवसाद और अंतर्द्वंद के इस लंबे चले अन्तराल ने मुझे ये समझाया की "अँधेरा कितना भी गहन क्यो न हो, रास्ता तो अपनी जगह मौजूद होता है, फर्क सिर्फ़ यही है, की सहज उजाले में वो सहज द्रिस्ट होता है, जबकि अंधेरे में वो हमें दिखाई नही देता" और दिखाई नही देने का आशय यह नही होता की रास्ता है ही नही, बल्कि धैर्य और ज्ञान (विवेक) का प्रकाश हमें गहन से गहन अंधियारे में भी पथ प्रर्दशित करता है।
...और उजाले में नो अपनी रह सभी पहचान लेते है, असली मजा तो अंधेरे में अपनी रह की पहचान से है। है न...!
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