इस देश के, एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर, यकीनन ये कल्पना कठिन है , कि इस राष्ट्र के एक स्वतंत्र नागरिक होने के बाद भी मेरी अभिव्यक्ति की मुझे गंभीर कीमत चुकानी पड़ेगी । एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र के नागरिक होने के नाते , और खासकर ऐसे देश के नागरिक होने के नाते जो मानव के बुनियादी अधिकार का हिमायती होने का दम भरता हो, यकीं करे आज के वातावरण से मुझे गहन निराशा है ।
यहाँ मेरा आशय जसवंत सिंह की न तो हिमायत करना है न ही किसी व्यक्ति विशेष पर दोषारोपण करना और न ही किसी को दूध का धुला साबित करना । पर मैं सचमुच ही सहमा हुआ हू । मैं सहमा हू अपने मुल्क के चरित्र को बदलते देख कर, मैं सहमा हू अपने देश के नुमाइन्दों के आचरण को देख कर और साथ ही निहायत ही निराश हू अपने पत्रकारिता जगत के साथियों की मक्कारी पूर्ण खामोशी से भी।
क्या हममें इतना धैर्य नही की हम किसी तत्थ्य का विवेक पूर्ण तरीके से विवेचन करे । आख़िर एक कांग्रेसी होते हुए हम ये क्यो नही स्वीकार पाते, की इस देश में परिवारवाद और तरफदारी को सावर्जनिक जीवन में जगह दिलाने का महान कार्य "नेहरू-गाँधी" परिवार की देन है और यह परिवार परिवारवाद में न सिर्फ़ आजादी के बाद बल्कि आजादी के पूर्व से ही लगा रहा , स्वर्गीय मोतीलाल नेहरू वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गाँधी को पत्र लिख कर जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस पार्टी का अद्धय्क्ष बनानेकी सिफारिश की । एक काग्रेसी होते हुए हम ये कभी नही स्वीकार पाते की यह नेहरू-गाँधी परिवार ही है जिसने महात्मा गाँधी की विरासत को सबसे जादा नुकसान पहुचाया । और सबसे बड़ी बात "पाकिस्तान का बनना कायद-ऐ-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की विजय नही, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल की सबसे बड़ी पराजय थी" दो व्यक्तियों की ऐसी पराजय, जिसकी कीमत दोनों तरफ़ (अब तीन तरफ़) के करोरो लोगो के विस्थापन, लाखो लोगों की मौत, न जाने कितनी हजारों हजार औरतों और बच्चियों की आबरू और खरबों की संपत्ति के नुकसान के साथ ही अलगाव के कभी न मिटने वाले दंश के रूप में चुकानी पड़ी ।
एक जिम्मेदार देश के जिम्मेदार नागरिक के तौर पर ये हमारा दायित्वा है की एक देश के तौर पर हम आत्मविश्लेषण करे और सच को, बेशक वो कितना भी करवा क्यो न हो स्वीकार करे , ये जरुरी है की हम तत्थ्यो से आँखे न मूंदे रख कर अपने आने वाली पीढी को दिग्भ्रमित न होने दे और अपने कर्तव्यो का समुचित तरीके से निर्वहन करे ।
हम ये स्वीकारे की जब देश बटवारे की आग में झुलश रहा था, तो नेहरू एडविना माउन्टबेटेन की सोहबत में आत्मा की शान्ति तलाश रहे थे। हम बेहद ईमानदारी से स्वीकारे की हमारे राजनेता अपनी छुद्र कमजोरियों की वजह से एक ऐसे व्यक्ति से पराजित हुए जिसका मुख्य झुकाव धर्म में न होकर राजनीती में था। (क्रमशः...)
यहाँ मेरा आशय जसवंत सिंह की न तो हिमायत करना है न ही किसी व्यक्ति विशेष पर दोषारोपण करना और न ही किसी को दूध का धुला साबित करना । पर मैं सचमुच ही सहमा हुआ हू । मैं सहमा हू अपने मुल्क के चरित्र को बदलते देख कर, मैं सहमा हू अपने देश के नुमाइन्दों के आचरण को देख कर और साथ ही निहायत ही निराश हू अपने पत्रकारिता जगत के साथियों की मक्कारी पूर्ण खामोशी से भी।
क्या हममें इतना धैर्य नही की हम किसी तत्थ्य का विवेक पूर्ण तरीके से विवेचन करे । आख़िर एक कांग्रेसी होते हुए हम ये क्यो नही स्वीकार पाते, की इस देश में परिवारवाद और तरफदारी को सावर्जनिक जीवन में जगह दिलाने का महान कार्य "नेहरू-गाँधी" परिवार की देन है और यह परिवार परिवारवाद में न सिर्फ़ आजादी के बाद बल्कि आजादी के पूर्व से ही लगा रहा , स्वर्गीय मोतीलाल नेहरू वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गाँधी को पत्र लिख कर जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस पार्टी का अद्धय्क्ष बनानेकी सिफारिश की । एक काग्रेसी होते हुए हम ये कभी नही स्वीकार पाते की यह नेहरू-गाँधी परिवार ही है जिसने महात्मा गाँधी की विरासत को सबसे जादा नुकसान पहुचाया । और सबसे बड़ी बात "पाकिस्तान का बनना कायद-ऐ-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की विजय नही, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल की सबसे बड़ी पराजय थी" दो व्यक्तियों की ऐसी पराजय, जिसकी कीमत दोनों तरफ़ (अब तीन तरफ़) के करोरो लोगो के विस्थापन, लाखो लोगों की मौत, न जाने कितनी हजारों हजार औरतों और बच्चियों की आबरू और खरबों की संपत्ति के नुकसान के साथ ही अलगाव के कभी न मिटने वाले दंश के रूप में चुकानी पड़ी ।
एक जिम्मेदार देश के जिम्मेदार नागरिक के तौर पर ये हमारा दायित्वा है की एक देश के तौर पर हम आत्मविश्लेषण करे और सच को, बेशक वो कितना भी करवा क्यो न हो स्वीकार करे , ये जरुरी है की हम तत्थ्यो से आँखे न मूंदे रख कर अपने आने वाली पीढी को दिग्भ्रमित न होने दे और अपने कर्तव्यो का समुचित तरीके से निर्वहन करे ।
हम ये स्वीकारे की जब देश बटवारे की आग में झुलश रहा था, तो नेहरू एडविना माउन्टबेटेन की सोहबत में आत्मा की शान्ति तलाश रहे थे। हम बेहद ईमानदारी से स्वीकारे की हमारे राजनेता अपनी छुद्र कमजोरियों की वजह से एक ऐसे व्यक्ति से पराजित हुए जिसका मुख्य झुकाव धर्म में न होकर राजनीती में था। (क्रमशः...)
Its not a suitable time time to discuss the matter.It can not be avoided that a person for taking
ReplyDeleteundue advantage may make media a
medium. We all know that our so called political leaders serve their vested interests rather than
people, we should not make such a
big hue and cry on this matter.I have never felt freedom itself
so where is the question of freedom
of speech.Sir in this country if you have money to great extant you can enjoy freedom.Whether its Congress or BJP or any other party
they are business houses meant for grabbing power by any means. They suitably advertise themself to grab the power.Once they get it they start making money.So lets talk on present difficulties and the matters which need attention like poverty, disease, unemployment, security etc.Please don't get allured in this type of fiducery discussions. Take oath of social service.And pls do it
thank you dp dubey
if this is not the right time than what shud be the right time?
ReplyDeleteOur present is result of of our past activities and without introspection, how we can move forward without error.