Thursday, August 27, 2009

जिन्ना, वाक स्वतंत्रता और मेरा देश ! (२)

...गतांक से आगे;-
हम बेहद ईमानदारी से स्वीकार करे की हमारे राजनेता अपनी छुद्र कमजोरियों की वजह से एक ऐसे व्यक्ति से पराजित हुए जिसका मुख्य झुकाव धर्म में न होकर राजनीति में था, वास्तव में यह एक अत्यन्त ही जिद्दी व्यक्ति की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के आगे हमारे राजनेताओ का घुटना टेकना था। ये वास्तव अद्ध्ययन की विषय वस्तु है की आख़िर वो कौन सी मजबूरिया थी, जिनकी वजह से कांग्रेस के राजनेताओ ने जिन्नाह के अलग पाकिस्तान की मांग मन ली।

वरना महात्मा गाँधी देश के बटवारे के खिलाफ अडिग थे, और उनका वक्तव्य की "देश का बटवारा मेरी लाश पर ही हो सकता है" उनकी बटवारे पर पूरी तरह सार्वजनिक हो चुकी उक्ति थी, जिसपर न सिर्फ़ सिक्खों, मुस्लिम बहुल इलाको में रहने वाले हिन्दुओ, सिंधियों(जिसमे हिंदू मुस्लमान दोनों शामिल थे) और बलूचो का पुरा भरोसा था, शायद यही भरोसा उनकी बर्बादी का सबब भी बना, इस भरोसे में नार्थ वेस्ट फ्रंटियर की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल था । गाँधी तो बटवारे के इतने खिलाफ थे की उन्होंने जिन्ना को फटकारते हुए १५-सितम्बर-१९४४ को लिखा की; मेरी समझ में द्विरास्त्रवाद का सिद्धांत "पूरी तरह काल्पनिक है। मुझे इतिहास मे ऐसी कोई मिसाल नही मिलती की धर्म बदलने वालों और उनके वंशजों के किसी समूह ने अपने मूल स्रोत से अलग रास्ट्र होने का दवा किया हो। अगर इस्लाम के आने से पहले भारत एक रास्ट्र था तो अपनी बहुत सी संतानों के धर्म परिवर्तित कर लेने के बाद भी एक रास्ट्र ही रहना चाहिए"

और इसमे कोई शक नही की जिन्ना जिस शिखर को कभी नही पराजित कर पाते, और वक्ती राजनीती में अगर उनको हराने वाला कोई विरोधी था, तो वो सिर्फ़, सिर्फ़ और सिर्फ़ उनसे छः वर्ष बड़े और उन्ही की तरह काठीयावारी तथा उनकी मातृभाषा बोलने वाले बैरिस्टर "मोहनदास करमचंद गाँधी" थे। पर गाँधी से न जाने नियति ने, उनके करीबी राजनेताओ की छुद्र लिप्सा ने अथवा न जाने किसने ऐसा घटिया खेल खेला की व्यक्तिगत अहम् को संतुस्ट करने वाली राजनीती करने वाले और बेहद अधार्मिक नेता ने, जिसके ख़ुद उसके समुदाय के सिर्फ़ ५% लोगों ने उसे मत दिया और जिसने मुस्लिम लीग में एकदम अलग धलग पड़ जाने के बाद १९३० से १९३३ के दरमियाँ राजनीती से करीब करीब सन्यास लेकर लन्दन में पुनः वकालत शुरू कर दी थी , वह १९४७ के उतरार्ध में कायद-ऐ-आज़म की जय के नारे सुन रहा था और आजीवन सामाजिक उद्देश्यों के लिए समर्पित, सत्य और अहिंसा के पक्षधर, दुनिया भर के निर्बल असहाय की करुना से द्रवित हो उठने वाले, अपने प्रति वैर भाव रखने वालों से भी समभाव रखने वाले गाँधी आजाद हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में "गाँधी को मर जाने दो" के नारे सुन रहे थे।
और नियति का मजाक देखिये की बटवारे को स्वीकार करने वाले नेहरू "स्वप्नदर्शी प्रधानमंत्री " और वल्लभ भाई पटेल "लौह गृहमंत्री " की उपधियो से नवाजे गए, जबकि बटवारे का दारुण आरोप उसे कभी भी न स्वीकार करने और अंततः एक भारत के रूप में देश को आजाद करवाने का दम रखने वाले "महात्मा" गाँधी के हिस्से में गया।
(क्रमशः...)

1 comment:

  1. इसमें कोई शक नहीं की आप यु ही कुछ नहीं लिखते/कहते, मुझे न केवल इसकी आगामी कडियों का इंतजार रहेगा, बल्कि यह अपेक्षा भी रहेगी की वाक स्वतंत्रता पे भी आप कुछ जोर अवश्य देगे.
    हलाकि मैं दोनों भाग पढ़ जाने के बाद कह सकती हू की मैं एकाध जगहों पर आपसे सहमत नहीं हो पा रही, पर जानती हू आप सही है .
    कृपया लिखते रहे

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