दिदिया रे ...
मोम मोम सी हुई,
तेरी पिघलन समेटू
चाँद की तस्तरी पे ,
तुझको सजा दू ,
एक मोम का बचपन गढ़ूं -तेरा,
एक मोम का बचपन गढ़ु -मेरा,
और कुछ किलकारिया, बचपन से ,
मांग लाये |
टांकेंगे हर देहरी से, एक एक किलकारी,
जो बची, तो फैला देंगे बगीचे में |
एक मोमजामे में,
रखके तेरी पलक का एक बाल,
और मांगा करेगे, सुबह -सुबह,
भगवान् से बचपन वापस,
फिर फूंक देगें मोमजामे पर,
हारिल हूँ मै हारिल!
हाँ, दिदिया रे,
संजोयी है, पंजो में,
तेरी चूड़ी का वो टुकड़ा,
जो मेले से खरीदी थी, तूने
लौटते, गिर पड़ी थी, तुम
तो चूर- चूर हो गयी थी |
कितना रोई थी,
याद है, न
दिदिया,
तुम भी- साथ ही रोता रहा देर तक, मै भी !
उस सुबकन में झिलमिल थे
टूट कर फैले चूड़ी के टुकड़े,
सजोया जो एक टुकड़ा,
उसे भी सजा देगें |
अम्मा से मिन्नत करके ,
दो लोई लेगे, आंटे की,
तुम रोटी बनाना |
एक में खायेगे आधी -आधी
और एक रोटी ...
झक्क सफ़ेद सी!
उछाल देंगे बचपन के आसमान पर|
बताऊ -बताऊ क्यू दिदिया री ?
दाग दाग है चाँद भी ...!
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