Thursday, January 30, 2014

सावरकर, जिन्ना, ब्रिटेन और गाँधी



Thursday, 30 January 2014 23:18कश्यप किशोर मिश्र


महात्मा गांधी की हत्या की हुई सात बार कोशिश 
 पुण्यतिथि 30 जनवरी पर विशेष लेख

महात्मा गाँधी की हत्या के साथ जेहन में आने वाला पहला नाम नाथूराम गोडसे का होता है और गाँधी की हत्या को धार्मिक अतिवाद से जुड़ी एक घटना मान लिया जाता है, जबकि निष्कर्ष कुछ और हैं. महात्मा गाँधी की हत्या किसी एक व्यक्ति या किसी एक संगठन का किया कार्य कतई नहीं लगती, बल्कि यह एक बड़ी और साम्राज्यवादी साजिश का अंग नज़र आती है...

 सा नहीं है कि महात्मा गाँधी की हत्या एक छोटे से व्यक्ति समूह के छोटे से काल-खंड में किये प्रयत्न का नतीजा थी, बल्कि महात्मा गाँधी के हत्या के प्रयत्न 1934 से शुरू हो गए थे. गाँधी की हत्या का प्रयास पहला प्रयास 25 जून, 1934 को, पूना में किया गया. गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, रास्ते में उनकी मोटर को लक्ष्य करके मोटर पर बम फेंका गया, पर गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे। गाँधीजी की हत्या का यह पहला प्रयास था, जो पूना के एक कट्टरपंथी हिन्दू गुट ने किया था. पुलिस रिपोर्ट में दर्ज प्राथमिकी के विवरण के अनुसार गांधीजी की मोटर पर बम फेंककर उनकी हत्या का प्रयास करने वाले आरोपी के जूते में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरु के चित्र मिले थे. 1934 की गर्मियों में ही गाँधी जी की हत्या की दो और कोशिश के सूत्र भी मिलते है, जो विफल रहे.

र्ष 1934 की गर्मियों में गाँधी जी की हत्या के तीन विफल प्रयासों के बाद जुलाई1944 में पंचगनी में उनकी हत्या की चौथी कोशिश हुई, जो असफल रही. महात्मा गाँधी अपनी बीमारी से उठकर स्वास्थ्य लाभ के लिए पंचगनी गए हुए थे. जब यह खबर आसपास के इलाकों में फैली, तो पूना से 20 युवकों का एक दल बस से पंचगनी पहुंचा। इस गुट ने समूचे दिन गांधीजी के विरोध में नारेबाजी की. गुट के नेता को गांधीजी ने बातचीत करने का न्यौता दिया, पर उसने उनसे किसी भी तरह की बातचीत करने से इंकार कर दिया। 

शाम को प्रार्थना सभा में यह नवयुवक हाथ में छुरा लिए गांधीजी की तरह लपका। सभा में मौजूद पूना के ही सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने हमलावर को पकड लिया और पुलिस को सौप दिया। पुलिस-रिकार्ड में हमलावर का नाम नहीं दर्ज किया गया, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जाच करने के उद्देश्य से 1965 में बिठाये गए कपूर-कमीशन के समक्ष उक्त हमलावर की पहचान नाथूराम गोडसे के रूप में की थी, जिसने अन्ततः गाँधी जी की हत्या की थी।

सितम्बर-1944 में वर्धा में गांधीजी की हत्या की पांचवी कोशिश की गई. गांधीजी, मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे। उनके बम्बई जाकर जिन्ना से बात करने का कुछ लोग विरोध कर रहे थे. इन्हीं विरोधियों का एक समूह पूना से वर्धा पहुंचा। पुलिस रिपोर्ट में दर्ज विवरण के अनुसार उस गुट के ग.ल. थने नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ। अपने बयान में उसने बताया की यह छुरा वह गांधीजी की मोटर पंचर करने के उद्देश्य से लेकर आया था. 

गाँधी के निजी सचिव प्यारेलाल ने उस घटना का विवरण देते हुए लिखा है 'आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी। बापू ने कहा कि मैं उनके बीच अकेला जाऊँगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूँगा। स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें, तो दूसरी बात है। किन्तु बापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। धरना देने वालों का नेता बहुत ही उत्तेजित स्वभाव वाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला।' (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)

29 जून, 1946 को फिर से गांधीजी की हत्या की छठी कोशिश हुई| गांधीजी एक विशेष ट्रेन से बम्बई से पूना जा रहे थे. नेरल और कर्जत स्टेशनों के मध्य रेल की पटरी पर एक बहुत बड़ी चट्टान कुछ अराजक तत्वों ने रख दी,. ट्रेन के ड्राइवर की सूझ-बूझ और सावधानी से एक भयानक हादसा टल गया और गांधीजी सकुशल पूना पहुँच गए| अगले दिन, 30 जून को प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने बीते दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा 'परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मुंह से सकुशल वापस आया हूँ। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुंचाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया.' (गाँधी जी का वक्तव्य, उनके एक और हत्या के प्रयास के रूप में, द. अफ्रीका में गोरों की एक उन्मादित भीड़ द्वारा उनकी हत्या की कोशिश, जिसमे गाँधी जी बुरी तरह घायल हो गए थे, को भी शामिल करता है.)

गाँधी जी की हत्या के ठीक पहले 20-जनवरी-1948 को उनकी प्रार्थना सभा से 75 फीट की दूरी पर एक बम धमाका किया गया. गाँधी उस वक़्त माइक पर प्रार्थना सभा को संबोधित कर रहे थे और धमाके से एक दीवार का एक हिस्सा उड़ गया| बम देशी तरीके से गन काटन के इस्तेमाल से बना था. धमाका करने वालों में से एक मदनलाल पाहवा को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि छह अन्य अपराधी एक टैक्सी से फरार होने में सफल रहे. धमाका जोरदार था, पर पुलिस ने उसे पटाखे की आवाज बताया, जिसके बारे में गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल ने बम्बई नगर निगम को सम्बोधित करते हुए बताया था कि हमने इसलिए पटाखे कि अफवाह उड़ाई क्योंकि बम धमाका बोलने से भगदड़ मच जाती और सैकड़ों बेक़सूर लोग घायल हो जाते या मारे जाते।'

गाँधी की हत्या की यह सातवीं कोशिश थी, जो हिन्दू अतिवादियो द्वारा की गई थी. गुप्तचर सूत्रों की तरफ से गाँधी की हत्या के प्रयास की चेतावनी बार-बार दी जा रही थी. यही नहीं प्रो. जगदीश चन्द्र जैन, जो गाँधी की हत्या के पश्चात सरकार के मुख्य गवाह के तौर पर हत्या के मुक़दमे में लालकिले, दिल्ली में शामिल भी हुए थे, ने बम्बई सरकार को गाँधी के हत्या की योजना की पूर्व सूचना दी थी. बम्बई के मुख्यमंत्री बीजी खेर और गृहमंत्री मोरारजी देसाई को उन्होंने सूचित किया था कि महात्मा गाँधी की हत्या का षडयंत्र रचा जा रहा है.

थ्य यह था कि मदनलाल पाहवा, एक पंजाबी शरणार्थी था और गाँधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल था. वह स्व. जैन का परिचित था. पाहवा स्व. जैन का अहसानमंद था, क्योंकि उन्होंने उसकी नौकरी पाने में मदद की थी. एक कमजोर मनोदशा में पाहवा ने जैन को बता दिया कि वे गाँधी की हत्या की योजना बना रहे है. प्रो. जैन ने तत्काल बम्बई राज्य के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को इसकी सूचना दी और सलाह दी कि पर्याप्त सुरक्षा
  
इंतजाम होने चाहिए। सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने बड़े ही कडवे अंदाज में उनपर चिल्लाते हुए कहा 'इस दशा में, तुम षड्यंत्रकर्ता हुए और मैं तुम्हें गिरफ्तार करूँगा।' 

20 जनवरी 1948 को मदनलाल ने जब बिरला भवन, दिल्ली में गाँधी प्रार्थना सभा के दौरान उनकी हत्या की विफल कोशिश की और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तो प्रो. जैन सरकार से निरंतर इस बात का आग्रह करते रहे कि उन्हें पाहवा से जिरह करने दिया जाये। उन्हें भरोसा था कि पाहवा अन्य षड्यंत्रकारियों का नाम उन्हें बता देगा और षड्यंत्र की प्रकृति भी वह उगलवा लेंगे, पर सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| दस दिन बाद गाँधी जी की हत्या कर दी गई. बाद में अपने संस्मरणों की डायरी के आधार पर उनकी किताब 'आई कुड नॉट सेव सेव महात्मा गांधी' प्रकाशित हुई. 

30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी। गांधीजी की हत्या के आरोप में विनायक दामोदर सावरकर, नाथूराम, नारायण आप्टे सहित आठ लोगों पर हत्या का अभियोग चला, फ़रवरी 1949 में नाथूराम और नारायण आप्टे को मृत्युदंड, अन्य पांच को आजीवन कारावास और सावरकर को सबूतों के अभाव का लाभ देकर बरी कर दिया गया. नाथूराम और आप्टे को नवम्बर 49 में फांसी पर लटका दिया गया.

सावरकर ने जिरह के दौरान नाथूराम अथवा किसी भी अभियुक्त के साथ अपने सीधे सम्बंधों की बात या कभी मुलाकात की बात नकारी, जो बाद में प्रकाश में आये तथ्यों के लिहाज से झूठी साबित हुई. सावरकर ने नाथूराम का इस्तेमाल किया था. नाथूराम उनका अंधभक्त था. 1940 में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष सावरकर के आदेश पर हैदराबाद के निजाम की नीतियों का विरोध करने वाले पहले जत्थे का नेतृत्व नाथूराम ने किया था और गिरफ्तार होकर निजाम की जेल की सजा भी भुगती थी. नाथूराम ने जिरह के दौरान दिए अपने बयान में सावरकर के हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की. 

गांधीजी की हत्या के 20 जनवरी के प्रयास, 30 जनवरी की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों और गांधी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता का पता लगाने के लिए भारत सरकार ने 1965 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाया, जिसने उन तथ्यों की भी पड़ताल की, जिन्हें गांधी की हत्या के लिए चले मुक़दमे की जिरह के दौरान नहीं प्रस्तुत किया गया था, कमीशन ने सावरकर के अंगरक्षक रहे अप्पा रामचंद्र कसर और उनके सचिव गंजन विष्णु दामले के बयान भी लिए. यदि उक्त दोनों के बयान गाँधी हत्याकांड के दौरान लिए गए होते, तो सावरकर का झूठ सामने आ जाता और वो भी गाँधी हत्या के दोषी करार दिए गए होते.

मीशन के तथ्यों से यह प्रमाणित हुआ कि 1948 की जनवरी 14 और 17 को नाथूराम और आप्टे ने सावरकर से मुलाकात की थी. कसर ने कमीशन को बताया की नाथूराम और आप्टे ने फिर से जनवरी 23 को बम धमाके के बाद दिल्ली से लौटने के बाद सावरकर से मुलाकात की थी, जबकि दामले ने कमीशन को बताया कि 'आप्टे और गोडसे ने जनवरी के मध्य में सावरकर को देखा और वो साथ ही बगीचे में बैठे।'

पूर कमीशन के तथ्य एकदम स्पष्ट थे, उन्होंने पुलिस की भयानक लापरवाही को उजागर किया, जो अगर नहीं की गई होती तो गांधी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता साबित हो जाती. बहरहाल, सावरकर सबूतों के अभाव में खुद को बचा ले गए और नाथूराम और नारायण आप्टे नवम्बर-1949 की एक सुबह 'अखण्ड भारत अमर रहे' का नारा लगाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए. उन्हें सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस व्यक्ति की उन्होंने हत्या की 'अखण्ड भारत' उसका सबसे बड़ा सपना था.

समें कोई शक नहीं कि सावरकर एक स्वतंत्रता सेनानी थे. इण्डिया हॉउस को क्रांतिकारियों का गढ़ बनाने में उनका बड़ा योगदान था. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर लिखी उनकी पुस्तक ने न जाने कितने क्रांतिकारियों को प्रेरणा दी. समुन्द्र तैर कर पानी के जहाज से निकल भागने का उनका साहस भी बिरला ही था. वो अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें एक साथ दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली थी, पर क्या अपने जीवन के उत्तरार्ध खासकर 1921 के बाद के उनके जीवन का अध्ययन करना जरुरी नहीं होना चाहिए? आखिर वो कौन से कारण थे, जिसने सावरकर जैसे महान वीर को माफीनामे का ख़त लिखने को मजबूर किया। कपूर कमीशन की रिपोर्ट सावरकर के गाँधी की हत्या में शामिल होने की पुष्टि करती है| यह निश्चित ही अध्ययन का विषय है कि 1911 से 1925 तक चले कारावास ने उनके मनोबल को कितना प्रभावित किया? 

प्रैल 1911 में सावरकर को काला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया. ख़ुद सावरकर के अनुसार यहाँ स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। कैदियों को यहां नारियल छीलकर उसमें से तेल निकालना पड़ता था। साथ ही इन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुतकर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था। उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमि व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थीं। इतने पर भी उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था। सावरकर सेलुलर जेल में मई, 1921 तक बंद रहे और वहां से मुक्त होकर लौटने पर फिर 3 साल तक जेल में रहे.

गौरतलब है कि अंदमान की सेलुलर जेल से रिहाई के लिए सावरकर ने अंग्रेज सरकार को माफीनामा लिखा था और रिहाई के लिए उन्होंने अंग्रेज सरकार की शर्त की एक निश्चित मुद्दत तक वो रत्नगिरि जिले से बाहर नहीं जाएंगे, स्वीकार की थी| 1925 के बाद सावरकर ने अंग्रेजी राज का विरोध छोड़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार से मिलकर हिन्दू समाज के लिए काम करना शुरू किया और 1937 में वे अखिल भारत हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए|

1937 के अखिल भारत हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में विनायक दामोदर सावरकर ने द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन किया. यह वही समय था, जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का प्रस्ताव सामने रखा था और मुहम्मद अली ज़िन्ना जोर शोर से पाकिस्तान की आवाज को मुसलमानों की आवाज बता रहे थे. मुस्लिम लीग के सबसे नुमाया चेहरे मुहम्मद अली जिन्ना थे, जो 1929 में अपनी पारसी पत्नी रत्ती, जिनसे 1927 में उनका अलगाव हो गया था, की मौत के बाद लन्दन में रह रहे थे. लन्दन में रहने के दौरान वह भारतीय राजनीति से लगभग अलग हो गए थे और अपनी वकालत में मसरूफ थे| ज़िन्ना को भारत में गाँधी का बढ़ता कद स्वीकार नहीं था|

क अंतराल के बाद ज़िन्ना 1934 में अपनी दुरभसंधियों के साथ वापिस आये और मुस्लिम लीग का उन्होंने पुनर्गठन किया। ज़िन्ना का पाकिस्तान बहुत सोच-विचार का नतीज़ा नहीं था. ज़िन्ना की कल्पनाओं में पाकिस्तानी सदर होने के साथ-साथ अपनी सप्ताहांत की छुट्टियाँ बम्बई के अपने बंगले में बिताने जैसा एकदम विरोधी ख्याल भी शामिल थे. पाकिस्तान की तामीर के पहले उदबोधन की बिना पर ज़िन्ना का पाकिस्तान नेहरू के हिंदुस्तान के मुकाबले कई गुना ज्यादा सेकुलर होना चाहिए था|
जिस समय पाकिस्तान बना, जिन्ना के फेफड़े बुरी तरह क्षतिग्रस्त थे. उनका इलाज कर रहा चिकित्सक एक सेना का चिकित्सक था और उसने जिन्ना को यह नहीं बताया कि उनके फेफड़े अब उनका ज्यादा दिन तक साथ नहीं दे सकते| शायद जिन्ना को यह बात पता चल जाने पर इस उपमहाद्वीप की राजनीति ने अलग ही करवट ली होती|
बहरहाल यह अध्ययन का विषय है कि जिन्ना के भारत वापस लौटने के पीछे साम्राज्यवादी ताकतों के षड्यंत्र तो नहीं थे. क्या ब्रिटिश सरकार के निर्देश पर सेना के चिकित्सक ने जिन्ना से उनकी हद दर्जे तक बढ़ी बीमारी की बात छिपाई और सावरकर की उन्मुक्ति के पीछे अंग्रेजी साम्राज्यवादी मंसूबे काम कर रहे थे. क्योंकि यह तय है कि ज़िन्ना और सावरकर दोनों 1935 के बाद के सालों में किसी न किसी तरह से एक ही उद्देश्य से काम कर रहे थे| दोनों के इसके पूर्व के समय से जुड़े दस्तावेज ब्रिटेन के अभिलेखागार सार्वजनिक नहीं करते और सबसे बड़ी बात व्यक्तिगत तौर पर दोनों गाँधी को बहुत नापसंद करते थे और तमाम कूटनीतिक मुस्कानों के बाद भी यह स्पष्ट ह कि ब्रिटिश सरकार भी गाँधी से बुरी तरह खार खाती थी|

लिहाजा यह संभावना भी हो सकती है कि गाँधी की हत्या के मोहरे ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा चले गए थे, पर वो अंजाम तक जरा देर से पहुंचे। तब तक भारत आजाद हो चुका था, पर दुर्भाग्य से सावरकर और ज़िन्ना के चेहरे 'एक ही अलगाववादी विचारधारा' के दो पक्ष बनकर दो अलग-अलग राष्ट्र बन चुके थे और बंटवारे के बाद भी एक विचार बनकर दोनों मुल्कों के भीतर भी धार्मिक कट्टरता का प्रसार कर रहे हैं.

न सबसे अलग राजघाट पर चिरनिद्रा में सोये गाँधी एक विचार के तौर पर अपने मुल्क में टुकड़ों-टुकड़ों में मर रहे हैं.


कश्यप किशोर मिश्र राजनीतिक विश्लेषक हैं.
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Saturday, January 11, 2014

जनभावनाओं का मजाक मत उड़ाइए केजरीवाल साहब

हिन्दू-मुस्लिम एका के प्रतीक पुरुष माने जाने वाले जिन्ना को जब कांग्रेस में गाँधी के सामने अपना छोटा होता कद स्वीकार नहीं हुआ, तो उन्होंने राजनीती से सन्यास ले लिया | राजनीती से ज़िन्ना का यह सन्यास अपने आप में स्पष्ट करता था कि ज़िन्ना की राजनीती व्यक्तिवादी थी और ज़िन्ना को अपनी समाजसेवा की मिहनत का ईनाम चाहिए था |
एक अंतराल के बाद ज़िन्ना अपनी दुरभसंधियो के साथ वापिस आये और मुसलमान एक अलग कौम की अलग तान छेड़ बैठे | पता भी न चला और बस एक दशक के भीतर ज़िन्ना के पीछे-पीछे चला समूह एक अलग कौम पाकिस्तान बन गया| इस धुन के फ़रेब से जबतक पाकिस्तानी भाइयो की आँख खुलती तबतक दो कौमियत के उसूल को तमाचा लगाते पाकिस्तान से एक अलग मुल्क बांग्लादेश बन चुका था |
ऐसा नहीं है, कि ज़िन्ना का पाकिस्तान किसी बहुत सोच-विचार का नतीज़ा था | ज़िन्ना की कल्पनाओ में, जहाँ एक तरफ सदर ऐ मुल्क होने का ख़्वाब था तो दूसरी तरफ अपने सप्ताहांत की छुट्टियाँ बम्बई के अपने बंगले में बिताने जैसा, एकदम विरोधी ख्याल भी शामिल था| अपने ख़्वाब की तामीर के पहले उदबोधन की बिना पर तो ज़िन्ना का पाकिस्तान, नेहरु के हिंदुस्तान के मुकाबले कई गुना जादा सेकुलर होने वाला था पर विमान से जब उन्होंने शरणार्थियो के हूजूम देखे तो सिर पकड़ बैठ गए और बस उनके मुह से यही निकाला हे भगवान् ! मैंने ये क्या कर दिया| अपनी बिमारी के दौरान ज़िन्ना ने, अपने चिकित्सक से, पाकिस्तान को अपनी ज़िन्दगी की हिमालयी भूल कहा था | कम से कम ज़िन्ना, ईमानदार थे कि उन्होंने ख़ुद को गलत माना|
इधर आज़ादी के साथ ही नेहरु ने 'ट्राईस्ट विथ डेस्टिनी' के राग में आम अवाम को झूमाना शुरू किया और निर्गुट आन्दोलन के जरिये अपने लिए एक विश्व-नागरिक की पहचान का ईनाम ढूढने चल दिए| नेहरु के सपनो का अंतिम अंग्रेज बस भारतीयों के ही नहीं बल्कि दुनिया के दिलो पर राज करना चाहता था, पर भारत पर चीन के हुए हमले ने, नेहरु के फ़रेबी-राग को भंग कर दिया और सामान्य भारतीय जनता मानो सोते से जाग गयी | जनता की प्रतिक्रिया आये इसके पहले नेहरु की मौत हो गई |
लालबहादुर शास्त्री ने अपने छोटे से कार्यकाल में पाकिस्तान को युद्ध में मात दी और युद्ध में जीती जमीन समझौते की मेज पर हार आये, समझौते के तुरंत बाद ताशकंद में ही शास्त्री जी की मौत हो गई और इंदिरा गाँधी परिदृश्य पर उभर आई, गूंगी गुड़िया इंदिरा के लिए जोड़-तोड़ का काम के. कामराज ने किया था |
पर इन सबका कोई भी फ़ायदा, भारत की जनता को नहीं मिल रहा था, उल्टे युद्ध की भारी लागत, तेल की बढती कीमतों और घटते औद्योगिक उत्पादन ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था| पर इंदिरा अब जनता को बहलाना सीख चुकी थी| उनकी भंगिमाए और कार्य भावनात्मक तौर पर जनता पर असर करते थे | उन्होंने भारतीय जनता को आत्म-मुग्ध करने की कसरत शुरू कर दी| वो एक तरफ भारतीय जनता को, कभी परमाणु-विष्फोट से तो कभी प्रिवी-पर्स की समाप्ति और बैंको के निजीकरण से बहला लिए जा रही थी तो दूसरी तरफ एक एक कर के अपने विरोध में उठने वाली हरेक आवाज को दबाती भी जा रही थी | अब इंदिरा किसी भी विरोध से बेपरवाह एक निर्विघ्न शासक बन गयी थी, जहा प्रतिरोध के स्वर नगण्य थे |
पर इन सबसे अलग, इलाहाबाद उच्च-न्यायालय के एक अकेले फ़ैसले ने इंदिरा के आधिपत्य को चुनौती देदी | 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इंदिरा के 1971 के चुनाव को अवैध ठहरा दिया| इंदिरा अबतक बेलगाम हो चुकी थी| उनकी मनःस्थिति एक लोकतंत्र के प्रधान की बजाय एक राजतंत्र वाले राजा की हो चुकी थी जिसकी ख़ुद की सनक की कीमत भी उसके प्रजा को चुकानी पड़ती थी| इंदिरा ने मध्यकाल के राजाओ वाली सनक का परिचय देते हुए, बजाय इस्तीफ़ा देने के 26 जून को आपातकाल की घोषणा कर दी और पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया, यह सब कुछ इतना त्वरित और अकल्पनीय था कि इसकी खबर जनता को सुबह के समाचार से मिली|
आपातकाल के इक्कीस महीने, देश की जनता को अपने मताधिकार के सूझ-बूझ से इस्तेमाल करने के सबसे बड़े सबक थे| सारे नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए| यह भारत के लोकतंत्र के सबसे अँधेरे दिन थे जब एक तरफ इंदिरा का अमर्यादित व्यवहार किसी तानाशाह की तरह का था तो दूसरी तरफ उनके पुत्र संजय गाँधी, वस्तुतः, दूसरे सत्ता ध्रुव बन गए थे, इन सबसे इतर संजय का एक चारण-भाट दल अत्यंत प्रभावी हो चुका था|
संजय
का चापलूस और चारण यह दल एक से एक अमर्यादित कृत्य करता रहता| उस वक़्त सत्ता में प्रभावी रहा दल-बल लूट के हर मौके और तरीके को बड़ी ही निर्लज्जता से अमल में ला रहा था| भारतीय लोक ने अपनी बेबसी की जो वीभत्सतम कल्पना की थी, यह काल उससे भी वीभत्स था| 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी।
देश की जनता ने इंदिरा और उनके दल बल को करार जबाब दिया और इंदिरा के विरोध में बने जनता पार्टी को अपना विश्वास सौपते हुए, सत्ता सौप दी| मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने|
जनता पार्टी को भारत की जनता ने सिर्फ सत्ता ही नहीं अपने विश्वास की थाती भी सौपी थी| उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से कांग्रेस का एक भी उम्मेदवार विजयी नहीं हुआ, ख़ुद इंदिरा गांधी    रायबरेली से चुनाव हार गई और कांग्रेस के मात्र 153 सांसद लोकसभा में पहुचे| यह एक भयानक पराजय थी और विरोधी दलों की प्रचंड विजय भी| भारतीय जनता, जिसका अहम् आपातकाल में बुरी तरह रौदा गया था, ने कांग्रेस के सिर्फ उन्ही चेहरों को लोकसभा की राह दिखाई थी, जिसे उसने इंदिरा की व्यक्तिवादी और उन्मक्त राजनीती से इतर समझा था| जनता इंदिरा से इतनी बिफरी हुई थी, कि जिसने भी इंदिरा का विरोध किया या इंदिरा द्वारा आपातकाल में प्रताड़ित हुआ उसे विजयी बना दिया| देश की जनता ने बड़े हुमक के साथ, इंदिरा को बेदखल कर के, यह प्रमाणित करने की कोशिश की, कि लोकतंत्र का राजा लोक होता है, तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोग नहीं और शीर्ष पर बैठे लोग लोकजीवन से जुड़े हितो के प्रहरी मात्र होते है|
जून 75 की शुरुआत में जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया था, जयप्रकाश नारायण जिन्हें जेपी भी कहा जाता था, के साथ पूरा बिहार हुंकार भर के खड़ा हो गया | जून के अंत में इंदिरा ने आपातकाल लगा दिया और जेपी को गिरफ्तार कर लिया, पर सम्पूर्ण क्रांति के स्वर दबाने में वह असफल रही| जनता पार्टी के सूत्रधार जेपी थे, पर अधिक उम्र और अस्वस्थता की वजह से उनका सक्रीय रहना कठिन था, लिहाजा खूब सारी रार, मान मनौअल के बाद मुरारजी देसाई ने जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के तौर पर मार्च-77 के अंत में शपथ ग्रहण किया, प्रधानमंत्री पद के दुसरे दावेदार और प्रधानमंत्री की कुर्सी न मिलने से खफा चौधरी चारण सिंह उप-प्रधानमंत्री बने|
जनता पार्टी की सरकार तो बन गयी पर स्थिति मुंडे-मुंडे मतिभिन्ना की थी| सरकार बन जाने के बाद जनता पार्टी से जुड़े लोग अपना हित देख रहे थे, जबकि मोरारजी देसाई कायदे के बड़े सख्त थे, उनके भीतर प्रशाशनिक सख्ती भी बहुत थी, साथ ही वो एक बेलाग-लपेट बात करने वाले आदमी थे| लिहाजा सरकार बनने के साथ ही गुटबाजी और आपसी खीचतान नज़र आने लगी| देश की जनता ने बड़े भरोसे से जनता पार्टी के हाथ में शासन की बागडोर सौपी थी, पर सरकार एक तमाशा बन गई थी|
भारत की जनता इस तमाशे से विचलित थी, पर जनता पार्टी से जुड़े लोग अड़ियल रुख से काम कर रहे थे, यहाँ तक कि जनता पार्टी ने शासन में आते ही, उन नौ राज्यों में जहाँ कांग्रस की सरकार थी, उन्हें भंग कर दिया और वहां चुनाव की घोषणा कर दी, यह अत्यंत असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और गलत निर्णय था, पर जनता पार्टी सारी आलोचनाओ को दरकिनार कर अपने रुख पर कायम रही| कांग्रेस भी चुप नहीं बैठी थी, उसने चौधरी चारण सिंह और हेम्वंती नंदन बहुगुणा जैसे लोगों को तोड़ना शुरू कर दिया   कांग्रेस की धुर विरोधी जनसंघ ने जनता पार्टी में अपना विलय कर लिया था पर उसकी एक इकाई आरएसएस जो राजनैतिक दल के रूप में पंजीकृत नहीं थी अपने अस्तित्व को कायम रखे हुए थी| पूर्ववर्ती जनसंघ के सदस्यों के आरएसएस से सम्बन्ध के मुद्दे को चरण सिंह ने हवा देना शुरू किया और इसी मुद्दे पर चरण सिंह ने जनता सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया|
 भारतीय जनता अवसरवादिता के इस निक्रिष्ट उदहारण की बेबस गवाह बनने को मजबूर थी| जिस कांग्रेस के विरोध में उसने जनता पार्टी को अपना मत दिया था, उसी का एक हिस्सा बड़ी ही बेशर्मी से, चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा कर रहा था| चौधरी चरण सिंह, अवसरवादिता के इस घटिया गठजोड़ के प्रधानमंत्री बने और यह सरकार पांच महीने तक चली, जिसमे चौधरी चरण सिंह कभी संसद नहीं गए|
भारत की जनता के साथ यह करारा विश्वासघात था| जनता ने समाजवाद और राष्ट्रवाद के जिस घालमेल को नजरअंदाज कर, लोकद्रोही इंदिरा को हरा कर जनता पार्टी को अपना विश्वास सौपा था, उस विश्वास की, जनता पार्टी के धड़े अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओ और अंतरविरोधो की खुलेआम अभिव्यक्ति से, खिल्ली उड़ा रहे थे| साथ ही दूसरी तरफ अपने खिलाफ़ चल रहे आक्रामक जाँच के तेवरों से इंदिरा एक बार पुनः अपने प्रति सहानुभूति का पात्र बन रही थी| इंदिरा जनता पार्टी के नेताओं के मुकाबले कई गुणा जादा चतुर थी, उन्होंने जनता पार्टी के नेताओं की फूहड़ता का पूरा फ़ायदा उठाया और पांच महीने बाद, चरण सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया|
भारतीय जनता के पास अब कोई विकल्प नहीं था, इंदिरा के रूप में एक अकेला चरित्र था, जो एक मजबूत सरकार दे सकता था और सातवे आम चुनाव में इंदिरा कांग्रेस ने 350 जबकि जनता पार्टी ने 32 सीट प्राप्त की| जनता पार्टी ने भारतीय जनता से तगड़ा विश्वासघात किया था और जनता अपने को मूर्ख बना महसूस कर रही थी|
इंदिरा
गाँधी की हत्या के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री बने मि. क्लीन राजीव गाँधी के नेतृत्व में, कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और 409 लोकसभा सीटों के प्रचंड बहुमत से वह सत्ता में आई, पर राजनीती में अनुभवहीन राजीव गाँधी पार्टी के भीतर चल रही भीतरघात और गुटबाजी से निबटने में इंदिरा की तरह सक्षम नहीं थे| राजीव को अभी भारतीय राजनीती के प्राम्भिक पाठ भी सीखने थे और उनका पाला बड़े ही घाघ राजनीतिज्ञों से था| कांग्रेस के भीतर का ही एक गुट, राजीव की कैम्ब्रीज की पढाई और आम आदमी से जुडाव होने की ख़बरे उड़ाया करता|
राजीव युवा थे और उस वक़्त भारतीय उपमहाद्वीप की भू-राजनैतिक परिस्थितिया जटिल थी| राजीव ने मालदीव में सत्ता-पलट की एक कोशिश नाकाम की और वाह-वाही लूटी पर तमिल समस्या उनके गले की फांस बन गयी| आपरेशन ब्रास ट्रैक्स के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बनाया तो बोफ़ोर्स का जिन्न उछल कर सामने गया| राजीव पर उसके ही मंत्रिमंडल के सहयोगी विश्वनाथ प्रताप सिंह आक्षेप करने लगे| एक तरफ सहयोगियों का आक्षेप तो दूसरी तरफ राष्ट्रपति जैल सिंह से मनमुटाव की खबरों के बीच राजीव ने अपने राजनैतिक जीवन की भयानक भूल की| राजीव ने प्रेस-अध्यादेश लाकर अखबारों की स्वतंत्रता सिमित करने की कोशिश की. जिसे चौतरफ़ा विरोध के बाद उन्होंने वापस ले लिया, पर प्रेस उनका विरोधी हो चुका था| अखबारी जगत ने राजीव को खलनायक बना दिया और मंत्रिमंडल से बर्खास्त किये जाने के बाद कांग्रेस और लोक सभा में अपनी सदस्यता से इस्तीफा देकर, अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान के साथ जन मोर्चा नाम से अपना दल बना कर राजीव विरोध की राजनीती कर रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह को जननायक बना कर पेश कर दिया|
भारतीय जनता विश्वनाथ प्रताप सिंह और मिडिया की जुगलबंदी को समझ नहीं पाई और एक बार फिर फ़रेब का शिकार हुई| अखबारों ने वीपी सिंह की राजा नहीं फ़कीर की छवि गढ़ दी और राजीव की छवि बोफ़ोर्स के दलाल की गढ़ दी गई| वीपी एक मंझे हुए राजनितिज्ञ थे और उनके मुकाबले राजीव अनाड़ी थे| विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जान बुझकर इस अफवाह को हवा दी कि उनके पास बोफ़ोर्स मामले से जुडी एक ऐसी फाइल है, जिससे राजीव का राजनैतिक जीवन तबाह हो जायेगा| वीपी अपनी जनसभाओ में एक पाकिट डायरी निकलते और दावा करते इस डायरी में बोफ़ोर्स से जुड़े खातो और व्यक्तियों के नाम के विवरण मौजूद है और वह उन्हें बेनकाब कर के रहेगे| वीपी का यह दावा बाद में सफ़ेद झूठ निकला, उनके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं थी और वह भारतीय जनता को धोखा दे रहे थे| भारतीय जनता वीपी सिंह के फ़रेब का शिकार हुई और उसने एक झूठ बोल कर फ़रेब गढ़ रहे आदमी को भारत का प्रधानमंत्री बनने का मौका दे दिया|
वीपी सिंह बोफ़ोर्स से जुडा कोई दावा सामने नहीं ला सके और उनके कार्यकाल की दो प्रमुख स्मृतियाँ बीजेपी का उभार और मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करना रही| वीपी की मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की काट बीजेपी ने रथयात्रा से करने की कोशिश की जिसका अंत सरकार से बीजेपी के समर्थन वापसी के रूप में सामने आया| वीपी सिंह के पास विश्वासमत हारने के बाद कोई चारा नहीं बचा और उन्होंने नवम्बर-90 में इस्तीफ़ा दे दिया| कांग्रेस ने, 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी को बाहर से समर्थन देकर सरकार बनवाई जो मार्च-91 के शुरू तक चली| कांग्रेस विरोध के नाम पर आये चंद्रशेखर अपने दल के साथ कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे थे और देश की जनता इस विडंबना की मूक गवाह बने रहने को मजबूर थी|
दसवे  आम चुनाव के दौरान राजीव गाँधी की हत्या हुई और 232 सीटों के साथ कांग्रेस ने पीवी नरसिंहराव के नेतृत्व में अल्पमत सरकार बनायीं| यह सरकार लगातार घोटालो के आरोप में रही, विश्वास मत पाने के लिए, इस सरकार पर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख्त के आरोप लगे, जो कालांतर में सही साबित हुए और कुछ करने की बजाय, यह सरकार कुछ करने के लिए जादा जानी गई| इसी सरकार के दौरान अयोध्या में विवादित ढांचा ढ़हाया गया और यह आरोप लगे कि विवादित ढांचे को ढहाने में नरसिंह राव की मूक सहमति थी|
ग्यारहवे आम चुनाव के बाद संसद त्रिशंकु थी, सबसे पहले बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने मई में प्रधानमंत्री का पद सम्हाला और तेरह दिनों के भीतर उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा जिसके बाद जनता दल के नेता देवेगौड़ा ने जून में संयुक्त मोर्चा गठबंधन की सरकार बनाई, यह सरकार 18 महीने चली और अंत में एक बार पुनः देश की जनता ने देखा कि, बीस बरस भी पूरे नहीं हुए और इस छोटी सी समयावधि में ही, कांग्रेस विरोध के नाम पर चुने लोगो की सरकार को कांग्रेस तीसरी बार समर्थन दे रही थी| कांग्रेस  के के बाहरी समर्थन से, देवेगौड़ा के विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री के रूप में अप्रैल 1997 में पदभार संभाला जो नवम्बर-97 तक चली|
बाद के छः वर्ष तक बीजेपी का शासन रहा जिसमे बारहवें और तेरहवे लोकसभा चुनाव के साथ साथ वाजपेयी की पहले तेरह महीने और फिर पांच साल का शासन शामिल था| लोकसभा के चौदहवे आम चुनाव के साथ कांग्रस की सत्ता में वापसी हुई| तमाम नाटकीय घटनाक्रम के बाद मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने पर शुरूआती उम्मीद जगाने के बाद कुल मिला कर उन्होंने जनता को निराश जादा किया|
इसी निराशा के माहौल में, अन्ना हजारे लोक जीवन के प्रतिनिधि बन के उभरे| अन्ना के सहयोगियों में से कुछ ने, अन्ना से अलग होकर एक राजनैतिक दल बनाया और 2014 में होने वाले सोलहवे आम चुनाव के पूर्व, एक पायलट प्रोजक्ट के तौर पर दिल्ली विधानसभा के चुनाव में शिरकत की| दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 32, केजरीवाल के दल को 28 जबकि कांग्रेस को 8 सीटें मिली| आज की तारीख में, देश की जनता कांग्रेस के बाहर से समर्थन से, दिल्ली विधानसभा में, चल रही केजरीवाल की सरकार की साक्षी है|
यह जनता, जिसका एक बड़ा हिस्सा बढती शीत के साथ-साथ कापता है, जिसकी राते, पूस हो तो, गहराते जाने के साथ-साथ, और गहरी नहीं, और उनींदी होती है, वो ठंढाते रहते है, रात भर ! फागुनी राते बस उनका मन ही नहीं भिगोती,उनके घर को भी, उनके शरीर को और उसकी जमा-पूँजी को भी गीला करती है | उनकी पूरी की पूरी जेठ की दुपहरी और रात, गर्मी से भीगते तन बदन के साथ बीतती है| इन बीते बरसो में हिन्दुस्तान का एक आम-मतदाता हो सकता है मूर्ख नहीं रहा हो, राजनैतिक रूप से चतुर हो गया हो, नेताओं को पहचाने भी लगा हो पर कुल मिला कर बीतते हर बरस के साथ, सत्ता-प्रतिष्ठानों के सामने बेचारा और, और जादा बेचारा ही हुआ है, यह बेचारगी, कम से कम वे लोग जो किसी भी तरह से,किसी भी सत्ता प्रतिष्ठान से नहीं जुड़े है, रोज अनुभव करते है|
"इन्टरप्रेटेशन ऑफ़ डीड्स, डाकुमेंट्स एंड ला" हमें यह सीखाता है, कि शब्दों के अर्थो से जादा अर्थवान शब्दों के गर्भित अर्थ होते है | जैसा की "देरिदा" भी कहा करते थे "शब्दों के मूलपाठ में नहीं, अर्थ उनके अंतरपाठ में होता है" और जिसे कुटनीतिक तबके में और तरीके से "बिट्वीन द लाइंस" कहते है |
इस देश का आम मतदाता, न तो अंतरपाठ समझता है, न वाक्य मध्य के आशय जानता बूझता है, वह अपनी बात सीधी-सीधी कहता है और दुसरो की बात सीधी-सीधी ही समझता भी है| अब अगर कोई आदमी यह कहता है कि वह उनके बीच का ही, उनके जैसा ही, एक आम-आदमी है| तो यह असल वाला आम-आदमी यही मान लेगा कि उसके कहे का वही मतलब है, जैसा कि उसने कहा है|
तो जब विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी पाकिट डायरी दिखाते हुए हरेक जन सभा में कहते फिरते थे, कि इस डायरी में बोफ़ोर्स से जुड़े खातो के नंबर उनके पास मौजूद है और वह उन्हें बेनकाब कर के रहेगे तो लोग उसपर बिना तीन पांच किये भरोसा करते थे, यह भरोसा टूटा तो "राजा नहीं फ़कीर देश की तकदीर" का नारा लगाने वाले इसी आम आदमी ने उनकी मौत की ख़बर तक को कितनी तवज्जो दी, यह बहुत पुरानी बात नहीं|
ठीक वैसे ही, जब केजरीवाल अक्तूबर-13 के दौरान कहते फिरते थे, कि उनके पास शीला दीक्षित के खिलाफ़ 370 पेजों के सबूत है तो एक आम-आदमी मान लेता था कि हां! इस आदमी के पास सबूत है और यह इसे साबित भी करेगा क्योकि केजरीवाल चाहे जो भी हो , पर थे तो "भारतीय राजस्व सेवा" के कमिश्नर रैंक के पूर्व अधिकारी ही, जिसे यह भली भांति पता था कि "विधि सम्मत सबूत" क्या होता है|जब वो अपने पास सबूत होने का दावा करते थे, तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी उनकी ही बन जाती थी|
और अब ! जब केजरीवाल कहते है "अगर कोई सबूत है तो लेकर आइये दो घंटे में जांच होगी" तो वह इस आम-आदमी के भरोसे का मखौल उड़ा रहे होते है, यहाँ सीधे-सीधे जिम्मेदारी दूसरो के पाले में डाल देने की बात भी है | अर्थात जो सबूत लायेगा, साबित करने की जिम्मेदारी भी उसकी ही होगी कि आरोप सही है| यहाँ केजरीवाल किसी भी तरह की जबाबदेही से परे रहेगे|
अभी जुम्‍मा जुम्‍मा चार दिन हुए हैं पर इस तरह की पलट-बयानी के बाद हम इत्‍मीनान से कैसे रहे ? कहाँ तो केजरीवाल ने दिन रात जनता के हित में काम करने का वायदा किया था और कहाँ वह "पोलिटिकली करेक्ट स्टैंड" के फिक्रमंद हुवे जा रहें है| इस मुल्क के मतदाता ने बहुत धोखे खाए है, लिहाजा हम इत्मीनान से नहीं बैठ सकते| जनाब केजरीवाल! हम पहले दिन से ही, पहले घंटे से ही आपके किये के मुन्तजिर है| 
हम आपको तगड़ा सपोर्ट भी करेगे, हम आपका तगड़ा विरोध भी करेगे |