Thursday, January 30, 2014

सावरकर, जिन्ना, ब्रिटेन और गाँधी



Thursday, 30 January 2014 23:18कश्यप किशोर मिश्र


महात्मा गांधी की हत्या की हुई सात बार कोशिश 
 पुण्यतिथि 30 जनवरी पर विशेष लेख

महात्मा गाँधी की हत्या के साथ जेहन में आने वाला पहला नाम नाथूराम गोडसे का होता है और गाँधी की हत्या को धार्मिक अतिवाद से जुड़ी एक घटना मान लिया जाता है, जबकि निष्कर्ष कुछ और हैं. महात्मा गाँधी की हत्या किसी एक व्यक्ति या किसी एक संगठन का किया कार्य कतई नहीं लगती, बल्कि यह एक बड़ी और साम्राज्यवादी साजिश का अंग नज़र आती है...

 सा नहीं है कि महात्मा गाँधी की हत्या एक छोटे से व्यक्ति समूह के छोटे से काल-खंड में किये प्रयत्न का नतीजा थी, बल्कि महात्मा गाँधी के हत्या के प्रयत्न 1934 से शुरू हो गए थे. गाँधी की हत्या का प्रयास पहला प्रयास 25 जून, 1934 को, पूना में किया गया. गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, रास्ते में उनकी मोटर को लक्ष्य करके मोटर पर बम फेंका गया, पर गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे। गाँधीजी की हत्या का यह पहला प्रयास था, जो पूना के एक कट्टरपंथी हिन्दू गुट ने किया था. पुलिस रिपोर्ट में दर्ज प्राथमिकी के विवरण के अनुसार गांधीजी की मोटर पर बम फेंककर उनकी हत्या का प्रयास करने वाले आरोपी के जूते में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरु के चित्र मिले थे. 1934 की गर्मियों में ही गाँधी जी की हत्या की दो और कोशिश के सूत्र भी मिलते है, जो विफल रहे.

र्ष 1934 की गर्मियों में गाँधी जी की हत्या के तीन विफल प्रयासों के बाद जुलाई1944 में पंचगनी में उनकी हत्या की चौथी कोशिश हुई, जो असफल रही. महात्मा गाँधी अपनी बीमारी से उठकर स्वास्थ्य लाभ के लिए पंचगनी गए हुए थे. जब यह खबर आसपास के इलाकों में फैली, तो पूना से 20 युवकों का एक दल बस से पंचगनी पहुंचा। इस गुट ने समूचे दिन गांधीजी के विरोध में नारेबाजी की. गुट के नेता को गांधीजी ने बातचीत करने का न्यौता दिया, पर उसने उनसे किसी भी तरह की बातचीत करने से इंकार कर दिया। 

शाम को प्रार्थना सभा में यह नवयुवक हाथ में छुरा लिए गांधीजी की तरह लपका। सभा में मौजूद पूना के ही सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने हमलावर को पकड लिया और पुलिस को सौप दिया। पुलिस-रिकार्ड में हमलावर का नाम नहीं दर्ज किया गया, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जाच करने के उद्देश्य से 1965 में बिठाये गए कपूर-कमीशन के समक्ष उक्त हमलावर की पहचान नाथूराम गोडसे के रूप में की थी, जिसने अन्ततः गाँधी जी की हत्या की थी।

सितम्बर-1944 में वर्धा में गांधीजी की हत्या की पांचवी कोशिश की गई. गांधीजी, मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे। उनके बम्बई जाकर जिन्ना से बात करने का कुछ लोग विरोध कर रहे थे. इन्हीं विरोधियों का एक समूह पूना से वर्धा पहुंचा। पुलिस रिपोर्ट में दर्ज विवरण के अनुसार उस गुट के ग.ल. थने नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ। अपने बयान में उसने बताया की यह छुरा वह गांधीजी की मोटर पंचर करने के उद्देश्य से लेकर आया था. 

गाँधी के निजी सचिव प्यारेलाल ने उस घटना का विवरण देते हुए लिखा है 'आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी। बापू ने कहा कि मैं उनके बीच अकेला जाऊँगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूँगा। स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें, तो दूसरी बात है। किन्तु बापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। धरना देने वालों का नेता बहुत ही उत्तेजित स्वभाव वाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला।' (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)

29 जून, 1946 को फिर से गांधीजी की हत्या की छठी कोशिश हुई| गांधीजी एक विशेष ट्रेन से बम्बई से पूना जा रहे थे. नेरल और कर्जत स्टेशनों के मध्य रेल की पटरी पर एक बहुत बड़ी चट्टान कुछ अराजक तत्वों ने रख दी,. ट्रेन के ड्राइवर की सूझ-बूझ और सावधानी से एक भयानक हादसा टल गया और गांधीजी सकुशल पूना पहुँच गए| अगले दिन, 30 जून को प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने बीते दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा 'परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मुंह से सकुशल वापस आया हूँ। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुंचाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया.' (गाँधी जी का वक्तव्य, उनके एक और हत्या के प्रयास के रूप में, द. अफ्रीका में गोरों की एक उन्मादित भीड़ द्वारा उनकी हत्या की कोशिश, जिसमे गाँधी जी बुरी तरह घायल हो गए थे, को भी शामिल करता है.)

गाँधी जी की हत्या के ठीक पहले 20-जनवरी-1948 को उनकी प्रार्थना सभा से 75 फीट की दूरी पर एक बम धमाका किया गया. गाँधी उस वक़्त माइक पर प्रार्थना सभा को संबोधित कर रहे थे और धमाके से एक दीवार का एक हिस्सा उड़ गया| बम देशी तरीके से गन काटन के इस्तेमाल से बना था. धमाका करने वालों में से एक मदनलाल पाहवा को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि छह अन्य अपराधी एक टैक्सी से फरार होने में सफल रहे. धमाका जोरदार था, पर पुलिस ने उसे पटाखे की आवाज बताया, जिसके बारे में गृहमंत्री वल्लभ भाई पटेल ने बम्बई नगर निगम को सम्बोधित करते हुए बताया था कि हमने इसलिए पटाखे कि अफवाह उड़ाई क्योंकि बम धमाका बोलने से भगदड़ मच जाती और सैकड़ों बेक़सूर लोग घायल हो जाते या मारे जाते।'

गाँधी की हत्या की यह सातवीं कोशिश थी, जो हिन्दू अतिवादियो द्वारा की गई थी. गुप्तचर सूत्रों की तरफ से गाँधी की हत्या के प्रयास की चेतावनी बार-बार दी जा रही थी. यही नहीं प्रो. जगदीश चन्द्र जैन, जो गाँधी की हत्या के पश्चात सरकार के मुख्य गवाह के तौर पर हत्या के मुक़दमे में लालकिले, दिल्ली में शामिल भी हुए थे, ने बम्बई सरकार को गाँधी के हत्या की योजना की पूर्व सूचना दी थी. बम्बई के मुख्यमंत्री बीजी खेर और गृहमंत्री मोरारजी देसाई को उन्होंने सूचित किया था कि महात्मा गाँधी की हत्या का षडयंत्र रचा जा रहा है.

थ्य यह था कि मदनलाल पाहवा, एक पंजाबी शरणार्थी था और गाँधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल था. वह स्व. जैन का परिचित था. पाहवा स्व. जैन का अहसानमंद था, क्योंकि उन्होंने उसकी नौकरी पाने में मदद की थी. एक कमजोर मनोदशा में पाहवा ने जैन को बता दिया कि वे गाँधी की हत्या की योजना बना रहे है. प्रो. जैन ने तत्काल बम्बई राज्य के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को इसकी सूचना दी और सलाह दी कि पर्याप्त सुरक्षा
  
इंतजाम होने चाहिए। सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और गृहमंत्री मोरारजी देसाई ने बड़े ही कडवे अंदाज में उनपर चिल्लाते हुए कहा 'इस दशा में, तुम षड्यंत्रकर्ता हुए और मैं तुम्हें गिरफ्तार करूँगा।' 

20 जनवरी 1948 को मदनलाल ने जब बिरला भवन, दिल्ली में गाँधी प्रार्थना सभा के दौरान उनकी हत्या की विफल कोशिश की और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तो प्रो. जैन सरकार से निरंतर इस बात का आग्रह करते रहे कि उन्हें पाहवा से जिरह करने दिया जाये। उन्हें भरोसा था कि पाहवा अन्य षड्यंत्रकारियों का नाम उन्हें बता देगा और षड्यंत्र की प्रकृति भी वह उगलवा लेंगे, पर सरकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| दस दिन बाद गाँधी जी की हत्या कर दी गई. बाद में अपने संस्मरणों की डायरी के आधार पर उनकी किताब 'आई कुड नॉट सेव सेव महात्मा गांधी' प्रकाशित हुई. 

30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी। गांधीजी की हत्या के आरोप में विनायक दामोदर सावरकर, नाथूराम, नारायण आप्टे सहित आठ लोगों पर हत्या का अभियोग चला, फ़रवरी 1949 में नाथूराम और नारायण आप्टे को मृत्युदंड, अन्य पांच को आजीवन कारावास और सावरकर को सबूतों के अभाव का लाभ देकर बरी कर दिया गया. नाथूराम और आप्टे को नवम्बर 49 में फांसी पर लटका दिया गया.

सावरकर ने जिरह के दौरान नाथूराम अथवा किसी भी अभियुक्त के साथ अपने सीधे सम्बंधों की बात या कभी मुलाकात की बात नकारी, जो बाद में प्रकाश में आये तथ्यों के लिहाज से झूठी साबित हुई. सावरकर ने नाथूराम का इस्तेमाल किया था. नाथूराम उनका अंधभक्त था. 1940 में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष सावरकर के आदेश पर हैदराबाद के निजाम की नीतियों का विरोध करने वाले पहले जत्थे का नेतृत्व नाथूराम ने किया था और गिरफ्तार होकर निजाम की जेल की सजा भी भुगती थी. नाथूराम ने जिरह के दौरान दिए अपने बयान में सावरकर के हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की. 

गांधीजी की हत्या के 20 जनवरी के प्रयास, 30 जनवरी की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों और गांधी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता का पता लगाने के लिए भारत सरकार ने 1965 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाया, जिसने उन तथ्यों की भी पड़ताल की, जिन्हें गांधी की हत्या के लिए चले मुक़दमे की जिरह के दौरान नहीं प्रस्तुत किया गया था, कमीशन ने सावरकर के अंगरक्षक रहे अप्पा रामचंद्र कसर और उनके सचिव गंजन विष्णु दामले के बयान भी लिए. यदि उक्त दोनों के बयान गाँधी हत्याकांड के दौरान लिए गए होते, तो सावरकर का झूठ सामने आ जाता और वो भी गाँधी हत्या के दोषी करार दिए गए होते.

मीशन के तथ्यों से यह प्रमाणित हुआ कि 1948 की जनवरी 14 और 17 को नाथूराम और आप्टे ने सावरकर से मुलाकात की थी. कसर ने कमीशन को बताया की नाथूराम और आप्टे ने फिर से जनवरी 23 को बम धमाके के बाद दिल्ली से लौटने के बाद सावरकर से मुलाकात की थी, जबकि दामले ने कमीशन को बताया कि 'आप्टे और गोडसे ने जनवरी के मध्य में सावरकर को देखा और वो साथ ही बगीचे में बैठे।'

पूर कमीशन के तथ्य एकदम स्पष्ट थे, उन्होंने पुलिस की भयानक लापरवाही को उजागर किया, जो अगर नहीं की गई होती तो गांधी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता साबित हो जाती. बहरहाल, सावरकर सबूतों के अभाव में खुद को बचा ले गए और नाथूराम और नारायण आप्टे नवम्बर-1949 की एक सुबह 'अखण्ड भारत अमर रहे' का नारा लगाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए. उन्हें सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस व्यक्ति की उन्होंने हत्या की 'अखण्ड भारत' उसका सबसे बड़ा सपना था.

समें कोई शक नहीं कि सावरकर एक स्वतंत्रता सेनानी थे. इण्डिया हॉउस को क्रांतिकारियों का गढ़ बनाने में उनका बड़ा योगदान था. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर लिखी उनकी पुस्तक ने न जाने कितने क्रांतिकारियों को प्रेरणा दी. समुन्द्र तैर कर पानी के जहाज से निकल भागने का उनका साहस भी बिरला ही था. वो अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें एक साथ दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली थी, पर क्या अपने जीवन के उत्तरार्ध खासकर 1921 के बाद के उनके जीवन का अध्ययन करना जरुरी नहीं होना चाहिए? आखिर वो कौन से कारण थे, जिसने सावरकर जैसे महान वीर को माफीनामे का ख़त लिखने को मजबूर किया। कपूर कमीशन की रिपोर्ट सावरकर के गाँधी की हत्या में शामिल होने की पुष्टि करती है| यह निश्चित ही अध्ययन का विषय है कि 1911 से 1925 तक चले कारावास ने उनके मनोबल को कितना प्रभावित किया? 

प्रैल 1911 में सावरकर को काला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया. ख़ुद सावरकर के अनुसार यहाँ स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। कैदियों को यहां नारियल छीलकर उसमें से तेल निकालना पड़ता था। साथ ही इन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुतकर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था। उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमि व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थीं। इतने पर भी उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था। सावरकर सेलुलर जेल में मई, 1921 तक बंद रहे और वहां से मुक्त होकर लौटने पर फिर 3 साल तक जेल में रहे.

गौरतलब है कि अंदमान की सेलुलर जेल से रिहाई के लिए सावरकर ने अंग्रेज सरकार को माफीनामा लिखा था और रिहाई के लिए उन्होंने अंग्रेज सरकार की शर्त की एक निश्चित मुद्दत तक वो रत्नगिरि जिले से बाहर नहीं जाएंगे, स्वीकार की थी| 1925 के बाद सावरकर ने अंग्रेजी राज का विरोध छोड़कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार से मिलकर हिन्दू समाज के लिए काम करना शुरू किया और 1937 में वे अखिल भारत हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए|

1937 के अखिल भारत हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में विनायक दामोदर सावरकर ने द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थन किया. यह वही समय था, जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का प्रस्ताव सामने रखा था और मुहम्मद अली ज़िन्ना जोर शोर से पाकिस्तान की आवाज को मुसलमानों की आवाज बता रहे थे. मुस्लिम लीग के सबसे नुमाया चेहरे मुहम्मद अली जिन्ना थे, जो 1929 में अपनी पारसी पत्नी रत्ती, जिनसे 1927 में उनका अलगाव हो गया था, की मौत के बाद लन्दन में रह रहे थे. लन्दन में रहने के दौरान वह भारतीय राजनीति से लगभग अलग हो गए थे और अपनी वकालत में मसरूफ थे| ज़िन्ना को भारत में गाँधी का बढ़ता कद स्वीकार नहीं था|

क अंतराल के बाद ज़िन्ना 1934 में अपनी दुरभसंधियों के साथ वापिस आये और मुस्लिम लीग का उन्होंने पुनर्गठन किया। ज़िन्ना का पाकिस्तान बहुत सोच-विचार का नतीज़ा नहीं था. ज़िन्ना की कल्पनाओं में पाकिस्तानी सदर होने के साथ-साथ अपनी सप्ताहांत की छुट्टियाँ बम्बई के अपने बंगले में बिताने जैसा एकदम विरोधी ख्याल भी शामिल थे. पाकिस्तान की तामीर के पहले उदबोधन की बिना पर ज़िन्ना का पाकिस्तान नेहरू के हिंदुस्तान के मुकाबले कई गुना ज्यादा सेकुलर होना चाहिए था|
जिस समय पाकिस्तान बना, जिन्ना के फेफड़े बुरी तरह क्षतिग्रस्त थे. उनका इलाज कर रहा चिकित्सक एक सेना का चिकित्सक था और उसने जिन्ना को यह नहीं बताया कि उनके फेफड़े अब उनका ज्यादा दिन तक साथ नहीं दे सकते| शायद जिन्ना को यह बात पता चल जाने पर इस उपमहाद्वीप की राजनीति ने अलग ही करवट ली होती|
बहरहाल यह अध्ययन का विषय है कि जिन्ना के भारत वापस लौटने के पीछे साम्राज्यवादी ताकतों के षड्यंत्र तो नहीं थे. क्या ब्रिटिश सरकार के निर्देश पर सेना के चिकित्सक ने जिन्ना से उनकी हद दर्जे तक बढ़ी बीमारी की बात छिपाई और सावरकर की उन्मुक्ति के पीछे अंग्रेजी साम्राज्यवादी मंसूबे काम कर रहे थे. क्योंकि यह तय है कि ज़िन्ना और सावरकर दोनों 1935 के बाद के सालों में किसी न किसी तरह से एक ही उद्देश्य से काम कर रहे थे| दोनों के इसके पूर्व के समय से जुड़े दस्तावेज ब्रिटेन के अभिलेखागार सार्वजनिक नहीं करते और सबसे बड़ी बात व्यक्तिगत तौर पर दोनों गाँधी को बहुत नापसंद करते थे और तमाम कूटनीतिक मुस्कानों के बाद भी यह स्पष्ट ह कि ब्रिटिश सरकार भी गाँधी से बुरी तरह खार खाती थी|

लिहाजा यह संभावना भी हो सकती है कि गाँधी की हत्या के मोहरे ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा चले गए थे, पर वो अंजाम तक जरा देर से पहुंचे। तब तक भारत आजाद हो चुका था, पर दुर्भाग्य से सावरकर और ज़िन्ना के चेहरे 'एक ही अलगाववादी विचारधारा' के दो पक्ष बनकर दो अलग-अलग राष्ट्र बन चुके थे और बंटवारे के बाद भी एक विचार बनकर दोनों मुल्कों के भीतर भी धार्मिक कट्टरता का प्रसार कर रहे हैं.

न सबसे अलग राजघाट पर चिरनिद्रा में सोये गाँधी एक विचार के तौर पर अपने मुल्क में टुकड़ों-टुकड़ों में मर रहे हैं.


कश्यप किशोर मिश्र राजनीतिक विश्लेषक हैं.
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