Sunday, February 9, 2014

समय निर्मम था, न ...!


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दिदिया रे,
चिंता मत करो,
हम जीने लगे है |

मेथी का चूरन,
अम्मा ले लेती है |
बाबूजी, अपनी धोती
खुद तहा लेते है |

अपनी
किताब, कापी, कलम और बस्ता,
मै भी, खुद सहेज लेता हूँ,
बस बाल बिगड़ जाते है |
...और हाँ !
जूते और कपड़ो की चमक
थोड़ी घट गयी है, शायद |
आजकल पालिश और साबुन,
नकली पहचाने भी नहीं जाते !

आज के खानें में स्वाद कम था,
नहीं थी, तुम्हारी बेली रोटियाँ
और छौक लगायी दाल |
जबकि मै सहला रहा था,
क्रोशिया से बुना तुम्हारा मेजपोश !
(पर ये बात बतानी नहीं है )

तुम्हारे कमरे की चादर,
ठीक से बिछी है !
मै खुद ठीक करता रहता हूँ, उसे
दिन में कई बार |

...और हाँ !
दिदिया रे ,
इस होली तुम आओगी, ना ?
आ जाना ...
चेहरे पे रंग नहीं डालूँगा ,


सच्ची !

इधर अब मै बहादुर हो गया हूँ,
अँधेरे से भी नहीं डरता ,
अकेले सोता हूँ !
बस अभी थोड़ा सा रो पड़ा,
तुम्हारी विदाई याद करके ,
समय निर्मम था, न ...!
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कश्यप किशोर मिश्र 

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