Friday, February 14, 2014

हत्यारे बदल लेतें हैं मुखौटे

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हत्यारे बदल लेते हैं मुखौटे


Friday, 14 February 2014 14:12
आस्तिकता और नास्तिकता पर पढ़िए  कश्यप किशोर मिश्र  का तल्ख़ विश्लेषण

आस्तिकता और नास्तिकता के इस द्वंद्व में कभी धर्म की आड़ लेकर मनुष्य ने बड़े ही क्रूर तरीके से अपने विरोधियों का सफाया किया, तो कभी धर्म का विरोध करने के नाम पर बेरहम हत्यायें कीं. लिहाजा चाहे आस्तिकता रही हो या नास्तिकता, अपने लाभ के लिए हत्यारे दोनों रहे. दूसरी तरफ आस्तिकता और नास्तिकता मानव इतिहास में सृजनात्मक ताकतों के भी प्रेरणास्रोत बनते रहे...
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फ्रेडरिक नीत्से को मानने वाले कम नहीं. नीत्से का मानना था कि ईश्वर मर चुका है, जबकि नास्तिकों के दो वर्ग हैं. एक का मानना है ईश्वर जैसी कोई चीज ही नहीं है, जबकि दूसरा वर्ग यह मानता है कि ईश्वर का कोई प्रमाण नहीं है. लुडविग विन्टेस्टाइन इस नकार या गैर मौजूदगी को अलग ही नजरिये से देखते थे. विन्टेस्टाइन का कहना था कोई नहीं है, तो यह उनके होने का सबसे बड़ा सबूत है. सरल शब्दों में कहें तो जब किसी का अस्तित्व है, तभी तो वह नहीं है. वरना जो है ही नहीं, उसके नहीं होने की चर्चा भी क्यों होगी. 

एक विचार के तौर पर ईश्वर का होना या न होना हमेशा ही विमर्श का विषय रहा है. प्राचीन ग्रीक विचारकों से लेकर भारतीय मनीषा तक ईश्वर के अस्तित्व और विचार पर सवाल खड़े करती रही है. साफ शब्दों में कहें तो धर्म या ईश्वर से जुड़े विचार अपने साथ-साथ नकार का विचार लिए ही पैदा हुए. ईश्वर का प्रारंभिक इस्तेमाल अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा या अर्थ लाभ के लिए न होकर एक मनुष्य का अपने भय से, अपनी आशंकाओं से उबर पाने के एक सहारे के रूप में था. यानी जितने भी सेमेटिक ईश्वर थे, वो भय के निवारण के तौर पर पैदा हुए विचार थे.
ईश्वर के पहले उसके विरोधी विचार अस्तित्व में आये. ईश्वर की उत्पत्ति हमेशा भय के पैदा होने पर उसके निवारण के रूप में ही हुई, लिहाजा दुनियाभर के धर्मों में ईश्वर के साथ-साथ उसके विरोधी शैतान भी मौजूद है. प्रारंभिक सेमेटिक परम्परायें प्रकृति से जुड़ी थीं, क्योंकि मनुष्य पूरी तरह प्रकृति के ही आसरे था. शिकार, जंगल की बाधाओं और आहार की सुलभता के लिए अलग अलग तरह के मानसिक सहारे ढूंढ़े गए जो बाद में, मानव जाति के विकास के साथ-साथ समाज के नायकों से प्रतिस्थापित होते गए.
समाज या कबीलों के नायक या लड़ाके अपने मरने के बाद भी याद किये जाते थे और विपत्ति या भय के निवारण के लिए उनसे मदद का आहवान होता था. शुरुआत में यह आहवान शायद सभी करते रहे होंगे, पर इसमें कोई शक नहीं कि पहला गुनी या ओझा वही रहा होगा जो किसी मनोविकार से ग्रस्त रहा होगा और उसे यह आभास होता होगा कि वह आत्माओं या ईश्वर को औरों की बनिस्पत ज्यादा महसूस कर सकता है अथवा ऐसी किसी पराशक्ति से संपर्क करने में सक्षम है.
सापेक्षिक रूप से यही ज्यादा मनोविकारी लोग शुरूआती पुजारी ओझा या गुनी रहे होंगे जो समय के साथ-साथ अपने जैसे ही विकार ग्रस्त लोगो की पहचान कर उन्हें ओझा, गुनी या पुरोहित के तौर पर मान्यता दे देने के एक तंत्र में बदल गई. ओझा गुनी या पुरोहित के अभिज्ञान के लिए बना यह तंत्र धर्म के संस्थानिक और कर्मकांडी रूप का प्रारंभिक चरण भी था.
पर सवाल यह है कि क्या ये अंध आस्थाए अपने बुनियादी स्वरूप में मनुष्य के लिए नुकसानदेह थीं ? आज जब धर्म के नाम पर पशु बलि दी जाती है, तो बलि का यह स्वरूप अपने उपासक को शिकार कर लाये हुए पशु का रक्त अर्पित करने के आदिम तरीके से एकदम अलग थी. बड़े-बड़े मंदिर और मठों के आराध्य के अस्तित्व का प्रकृति पूजकों के आराध्य नदी, पेड़ और पत्थर के अस्तित्व में बड़ा अंतर था.
यही नहीं, समय के साथ-साथ ईश्वर का अस्तित्व भी विराट होता गया. सेमेटिक देवताओं के इतर मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ ईश्वर के आयाम भी बढ़ते रहे और वह बहुरूप और बहुआयामी होता गया. मनुष्य की विचारशीलता में विस्तार के साथ साथ भय के आयाम का भी विस्तार हुआ. बुनियादी रूप से भय का सृजन अज्ञान से होता है. लिहाजा अपने बुनियादी स्वरूपमें आदिम-ईश्वर भी अज्ञान-जनित भय के सृजन थे. प्रकृति पूजकों के ईश्वर भी उनके भय की भयानकता के सापेक्ष ही दिखने में भयानक भी हुआ करते थे पर बदलते समय के साथ-साथ ईश्वर का स्वरूप भी कोमल होता गया.

ईश्वर के स्वरूपमें आई यह कोमलता की दो वजहें थीं. पहली वजह ईश्वर के अस्तित्व में भय से निवृति दिलाने वाले के साथ साथ मनुष्य का पाने और अस्तित्व का संधान भी था. ईश्वर सर्जना की भारतीय परंपरा के लिहाज से यह ईश्वर के 'मा भोरू' स्वरूपका बहुआयामी विस्तार था, जिसे अध्यात्म कहा जा सकता है.
सरल शब्दों में कहें तो सभ्यताओं और मनुष्य के विकास के साथ-साथ ईश्वर और मनुष्य के सापेक्षिक सम्बन्ध कर्मकांडी होने के साथ-साथ आध्यात्मिक भी हो गए, लिहाजा ईश्वर की मूर्त के साथ-साथ अमूर्त संकल्पनायें भी सम्भव हुयीं और ईश्वर जितना साकार था, उतना ही निराकार भी हो उठा.
ईश्वर का निराकार स्वरूपअद्वैत था, वह एक अत्यंत व्यक्तिगत अनुभव और विचार से जुडा आध्यात्मिक स्वरूप था, पर ईश्वर का यह स्वरूप ज्ञान से जुड़ा हुआ और मानवीय था. अपने निराकार स्वरूप में ईश्वर कर्मकांड के अनुकूल नहीं था, लिहाजा धर्म के प्रतीक रूप में ईश्वर ज्यादातर साकार रूप में पूजा जाने लगा.
ईश्वर को साकार स्वरूप में पूजा जाना उसके स्वरूप में आई कोमलता की दूसरी वजह बनी. दरअसल ईश्वर के सर्वशक्तिमान होने के सिद्धांत के साथ-साथ वरदान का सिद्धांत भी जुड़ा हुआ था. लिहाजा जो ताकतवर है, वह ईश्वर से ज्यादा वरद है, का सिद्धांत स्थापित होता चला गया. बीतते समय के साथ-साथ ईश्वर ताकतवर का हथियार होता चला गया और बाद में तो ईश्वर राज्यसत्ता के एक बड़े हथियार में तब्दील हो गया.
इजिप्ट के फेरो हों या भारत के नरेश सबने खुद को ईश्वर के प्रतिरूप के रूप में कभी खुद को ताकतवर एमन बताया, तो कभी अपनी तुलना इंद्र से की और धर्म का इस्तेमाल शासन करने के लिए खूब किया. एक तरफ शासक खुद को ईश्वर का प्रतिरूप या मानवीय रूप बताने लगे, तो ईश्वर का पुरोहित वर्ग खुद को वरद बता ईश्वर के माध्यम के रूप में सुविधाजनक स्थिति में आने लगा. पुजारियों और शासकों के ईश्वर के माध्यम के रूप में उभरने ने ईश्वर के रंग रूप को मृदु और मानवीय बना दिया.
सभ्यताओं के विकास ने सत्ता के एकमात्र स्वरूप भौगोलिक सीमाओं को बढ़ाना और बदलना शुरू कर दिया. समय के साथ-साथ सत्ता का विकेंद्रीकरण और विस्तार भी शुरू हो गया. शासकों ने अपनी प्रजा के अधिकारों पर नियंत्रण बढ़ाना शुरू किया, जिसे प्रभावी करने के लिए धर्म का येन केन प्रकारेण इस्तेमाल किया जाता रहा.
हमेशा से सत्ता के साथ-साथ उसका प्रतिरोध भी रहा है. धर्म जब राज से जुड़ गया, तो प्रतिरोध के हथियार भी धर्म को निशाना बनाने लगे, पर यह एक पक्ष था. एक तरफ तो सत्ताओं के विरोध के तौर पर प्रचलित मान्यता की प्रतिरोधी मान्यतायें रखकर एक नई सत्ता बनाने की कोशिश होती थी, तो दूसरी तरफ सामाजिक जीवन में पैठी मान्यताओं के प्रतिरोधी विचार और मान्यताओं को समकालीन मान्यताओं का एक सामाजिक विरोधी विचार न मानकर उन्हें भी राजद्रोही माना जाने लगा.
दुनियाभर में राज्य के एक तंत्र के तौर पर विकसित होने के साथ-साथ, सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी परिवर्तन यह हुआ कि प्रचलित धर्म स्थापनाओं का विरोध भी राजद्रोह माना जाने लगा.
यहूद के खिलाफ इस्लाम का उदय एक नई व्यवस्था बनाने की इसी कोशिश का एक हिस्सा थी, जो बाद में एक धर्म बन गई. यहूदी और मुसलमानों की लड़ाई धर्म से ज्यादा सत्ता से जुड़ी हुई थी. ठीक यही बात मुगल सत्ता के विरोध के तौर पर सिख पंथ के उदय के साथ लागू होती है. यूरोप में भी कैथलिक राज्य सत्ता का विरोध 'प्रोटेस्टेंट' के तौर पर किया गया. प्राचीन मिस्र के राजवंश 'राजाओं के दैवीय अधिकार' के प्रतिरूप थे और यह दैवीय रूप राजाओं के साथ साथ बदलते रहते थे, कभी एटन तो कभी एमन बनकर.
प्राचीन मिस्र का फेरो अपनी प्रजा और ईश्वर के बीच के मध्यस्थ के रूप में ही शासन करता था, जब तक कि आरेकल की नई प्रणाली स्थापित करके पुजारियों ने खुद को मध्यस्थ नहीं बना लिया, पर इसके लिए पुजारियों को एक नवीन साम्राज्य के बनने तक इंतजार करना पड़ा और समय के साथ-साथ् एक आध्यात्मिक मध्यस्थ के रूप में फेरो की भूमिका पर बल देना कम करके और धार्मिक संस्कारों का झुकाव, देवताओं की प्रत्यक्ष पूजा करने की ओर स्थानांतरित करके पुजारियों ने लोगों और देवताओं की इच्छा के सीधे सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में खुद को आगे कर दिया.
दुनियाभर में पुजारियों ने इसी तरीके से राज्य के समान्तर अपना धार्मिक साम्राज्य कायम किया. एक तरफ पुजारियों ने राजा को 'दैवीय प्रतिरूप' बता कर संरक्षण प्राप्त किया, तो दूसरी तरफ शासकों से अपने संरक्षण के लिए विशेषाधिकार प्राप्त किया. यही वजह थी कि जहाँ तस्वीर का एक पहलू, जिसमे धर्म का विरोध राज्य सत्ता के विरोध के तौर पर किया जाता था, उसके ठीक विपरीत धर्म से जुड़ी मान्यताओं का विरोध राज्य सत्ता से विद्रोह मान लिया जाता था.
यही वजह थी की एक तरफ तो चार सौ ईसा वर्ष पूर्व सुकरात जब पुरानी रुढि़यों और मान्यताओं का विरोध कर रहा था, तो उसे धर्म विद्रोही माना गया और राज्य द्वारा उसे जहर का प्याला पीने की सजा मिली. तो दूसरी तरफ मध्यकाल में कोपरनिकस को जिन्दा जलाने की वजह जनता को बगावत के लिए भड़काना न होकर, एक सामान्य से खगोलीय सिद्धांत की स्थापना थी कि 'पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है'.
चूंकि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा करने का सिद्धांत बाइबिल की मान्यता के विरुद्ध था, लिहाजा वह राज-दंड का भागी हुआ. ईटली के गलीलियो को भी चर्च की मान्यता के खिलाफ ग्रहों की स्थिति की सही व्याख्या करने की वजह से जीवन भर का कारावास भुगतना पड़ा.
सत्ता और धर्म की जुगलबंदी के ताने-बाने से ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म ने हमेशा राज्य के शोषक स्वरूप के मजबूत स्तम्भ के तौर पर शासक की सहायता की है और शासकों ने धर्म को सुरक्षा दी, क्योकि धर्म उनके 'राजा होने के दैवीय अधिकार' के दावे की अभिपुष्टि करते थे, जिसकी बिना पर धर्म पुरोहितों के एक पाखंडपूर्ण शोषणकारी तंत्र के रूप में फला फूला.
मगर भारत से शुरू होकर वाया मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और वहां से होता हुआ दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैल जाने वाले बौद्ध धर्म, जिसका मूलभूत सिद्धांत दया और करुणा थी, धर्म और शासक की शोषक जुगलबंदी के सिद्धांतपर सवालिया निशान खड़ा करते हैं. एक करुणापूर्ण शासक के सबसे बड़े प्रतीक बने सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था और उनके बाद यह धर्म बड़ी तेजी से फैला.
बौद्ध धर्म के विस्तार की सबसे बड़ी वजह शासको द्वारा उनको अपनाया जाना था और एक शासक द्वारा दया, करुणा, क्षमा की बात करने वाले धर्म को स्वीकारना या बढ़ावा देना, शासक के 'कल्याणकारी' चरित्र के साथ साथ धर्म के भी कल्याणकारी चरित्र का एक बड़ा पहलू था. तिब्बत का अस्तित्व सदियों तक बौद्ध धर्म के झंडे तले एक मानव-कल्याणकारी राज्य के रूप में रहा, जहाँ शासक और धर्म-प्रमुख एकाकार हो गए थे. तिब्बत में दलाई लामा शासक भी थे और बौद्ध धर्म के सबसे बड़े लामा भी.
बौद्ध धर्म के विस्तार के साथ-साथ विकसित हुए लोक कल्याणकारी राज्यों की यह चर्चा इस लिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है, कि जहाँ एक तरफ तिब्बत में धर्म और राज्य एकाकार हो गए, ठीक इसके विपरीत यूरोप में ब्रिटेन के शासक हेनरी और पोप एक दूसरे पर नियंत्रण की कोशिश में न सिर्फ एक दूसरे के पूर्ण विरोधी बन गए, बल्कि दोनों अपने विरोधियों को प्रताडि़त और उनका कत्ल करने लगे. चर्च और ताज दोनों का इस तरह निरंकुश और अत्याचारी स्वरूप, तिब्बत के सत्ता और धर्म के एकीकृत हो जाने वाले स्वरूप् से एकदम भिन्न था. इसकी वजह सभ्यता के शुरुआत के साथ ईश्वर के स्वरूप् के साकार और निराकार होने में छुपा हुआ था.
चर्च का ईश्वर कर्मकांडी था, लिहाजा चर्च के लिए ईश्वर का अस्तित्व सत्ता को मजबूत करने वाले एक तंत्र की स्थापना था. यही वजह थी कि जब इंग्लैण्ड के राजा हेनरी ने वेटिकन को चुनौती दी, तो वेटिकन से इतर उसने 'चर्च ऑफ इंग्लैण्ड' नाम से वेटिकन का एक अंग्रेजी समकक्ष भी खड़ा कर दिया.
यूरोप का सामाजिक तंत्र उस काल में इतना कर्मकांडी हो गया था कि राजा, जो कभी नहीं मरता था, के लिए ताज को बिशप द्वारा पहनाया जाना जरूरी होता था. राजा पर अभिमंत्रित जल का छिड़का जाना एक जरुरी कर्मकांड था, लिहाजा इस धार्मिक कर्मकांड के जरिये चर्च राज्यसत्ता को एक दैवीय वैद्यता प्रदान करता था और इस दैवीय वैद्यता प्रदान करने की कीमत के रूप में, यूरोपियन देशो में पोप राज्य के सापेक्ष एक और राज्य बन गया था.
ठीक इसके विपरीत तिब्बत के लामा का ईश्वर या भारत में देवानामप्रिय अशोक या हर्षवर्धन का ईश्वर आध्यात्मिक था. ईश्वर का यह स्वरूप जड़ नहीं था. यक अपनी स्थिति में एक व्यक्ति को स्थापित केंद्र या दूसरे शब्दों में कहें तो जड़ बनाने की बजाय एक भाव में बदल देता था. ईश्वर का आध्यात्मिक स्वरूपा मनुष्य को किसी कर्मकांडी बेडि़यों में आबद्ध करने की बजाय एक यांत्रिक में बदल देता था, जिसका अंतिम अनुभूत मानवता की सर्वोच्च पायदान तक पहुंचना होता था, जिसे वह 'ईश्वरीय' होने के रूप में परिभाषित करता था. 
यही वजह थी कि जहाँ पश्चिम के धर्मों में परिभाषित ईश्वर चर्च के भौतिक साम्राज्य में मददगार हुए जा रहे थे, जिनकी मदद से चर्च की संपत्तियों और राज्य का विस्तार हुआ जा रहा था, यही नहीं समानांतर सत्ता केंद्र होने का यह अहम् इतना तगड़ा था कि पोप की वेशभूषा में भी ताज और राजसी वस्त्र शामिल हो गए. ठीक इसके विपरीत भारत और चीन में राजा फकीर होने लगे. एक तरफ हर्षवर्धन हर बारह साल में एक बार अपना सबकुछ दान कर देता था, तो दूसरी तरफ तिब्बत का राजा लामा हो गया था.
यह निश्चित ही सत्य है कि ईश्वर एक अवधारणा मात्र है, पर उससे बड़ा सत्य यह है कि ईश्वर की पूरब और पश्चिम की अवधारणा पूरी तरह दो विरोधी और अलग विचार हैं. पूरब के ईश्वर की अवधारणा ईश्वर के निकृष्ट स्वरूप से ईश्वर के उत्कृष्ट स्वरूप् की तरफ जाने की यात्रा की अवधारणा है, जो समय के साथ-साथ धारण-त्याग और परिष्कार की अवधारणा है जिसका 'चरैवेति-चरैवेति' मूल मन्त्र है. पूरब का ईश्वर अन्ततः मनुष्य के आत्मज्ञानोमुखि है.
शायद यही वजह रही कि भारतीय परंपरा में जहाँ एक तरफ वेद उपनिषद् की व्याख्याएं ईश्वर की अवधारणा पुष्ट कर रही थीं, तो वेदबाह्य दर्शन के रूप में चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक और आर्हत तार्किक रूप से नास्तिकता और अनीश्वरवाद की बात कर रहे थे. भारतीय मनीषा में ईश्वर का स्वरूप हमेशा दर्शन की एक अवधारणा के रूप में रहा है, जिसने नास्तिकता या अनीश्वर को भी दर्शन की एक अवधारणा माना है. यही वजह है कि भारतीय मनीषा में दर्शन का प्राचीनतम ग्रन्थ 'सर्वदर्शन संग्रह' चार्वाक के दर्शन को नास्तिकता का दर्शन मान उसके मत को भी दार्शनिक महत्व प्रदान करता है.
इसके विपरीत पश्चिम का दर्शन सापेक्षिक रूप से उतना समावेशी नहीं था और प्रचलित धर्म, मान्यता या ईश्वर जनित अवधारणा के विपरीत अवधारणाओं पर हिंसक प्रतिक्रिया देता था, जो कभी सुकरात को विष का प्याला पिलाती थी, तो कभी प्रोटोस्टेंट मतावलंबियो को चुन-चुन कर जिन्दा जला देती थी. शायद यही वजह थी कि माक्र्स ने साम्यवाद के रूप में जब अपने प्रतिरोधी विचार रखे, तो यह प्रतिरोध राजसत्ताओं के साथ-साथ, युरोप में सत्ता के तत्कालीन सहायक तंत्र ईश्वर के खिलाफ भी था.
एक दर्शन के रूप में साम्यवाद एक उग्र प्रतिरोध का दर्शन था, जो यूरोप में राज्य और ईश्वरीय सत्ता के प्रतिरोध तक सीमित न होकर राजसत्ता और धर्मसत्ता को समर्थनकारी तंत्र के हरेक तबके के हिंसक प्रतिरोध का सिद्धांत था. साम्यवाद गैरबराबरी के लिए जिम्मेदार तंत्र से जुड़े हर व्यक्ति, तबके और विचार को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने का सिद्धांत था.
हालांकि गैरबराबरी खत्म करने की अवधारणा के तौर पर साम्यवाद एक सुखद और मानवीय विचारधारा लगती थी, पर कृत्य के रूप में साम्यवाद का अनीश्वरवाद, अतीत के किसी भी हिंसक ईश्वरीय प्रतिनिधियों से कई गुणा ज्यादा हत्यारा था. यही नहीं जनता की जनवादी तानाशाही की बात करने वाले साम्यवाद ने एक मनुष्य को किसी भी काल या विचारधारा के तानाशाह के मुकाबले ज्यादा पशुवत किया, यही नहीं अपने विरोधी विचारधारा के रूप में साम्यवाद ने खुद को अपने वैचारिक विरोधियों की वधशाला में तब्दील कर दिया.राज्यसत्ता के रूप में साम्यवाद का उदय रूस से शुरू हुआ था, जबकि एक विचारधारा के तौर पर साम्यवाद का उदय फ्रांस और जर्मनी में हुआ. यह वह काल था जब फ्रांस और जर्मनी अपने संक्रमण काल से गुजर रहे थे और लोकतंत्र जैसी व्यवस्था से रूस जर्मनी या फ्रांस की जनता का साक्षात्कार होना अभी बाकी था.साम्यवाद ने कृत्य के रूप में एक अलहदा राज व्यवस्था बनाने की कोशिश की, जिसमें मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कोई जगह न होकर वह वर्ग-प्रतिनिधि मात्र रह गया था. कम्युनिस्ट विचारधारा नास्तिकता का अंध समर्थन करती थी और धर्म को अफीम मानती थी, पर पता ही नहीं चला कि कब यह विचारधारा मार्क्स, स्टालिन, माओ और लेनिन की अनुगामी से भक्त बन गयी और सबसे महान व्यक्ति पूजकोंमें बदल गई.धर्मों का विरोध करते करते पता ही नहीं चला कि कब साम्यवाद ने अपनी नास्तिकता को ही एक धर्म में तब्दील कर लिया और दूसरों की आस्था का वैज्ञानिक अथवा तार्किक प्रमाण मांगते मांगते इसके रहनुमाओं ने नास्तिकता को अपनी आस्था बना लिया. यह नास्तिकता, धर्म के नाम पर अतीत के पाखंडों से कही बहुत अधिक पाखण्डी थी और हत्यारी भी, क्योंकि इसका विरोधी या इसके विरोध में बात करने वाले को एक साथ वर्ग, समाज, राज और व्यवस्था विरोधी मान लिया जाता था. साम्यवाद मानवता के इतिहास में वैचारिकता के नाम पर प्रतिरोधी हत्याओं को जायज ठहराने का एक कलुषित अध्याय है, जहाँ वैचारिक मतभेद के समभाव की कोई जगह नहीं थी.आस्तिकता और नास्तिकता के इस द्वंद्व में कभी धर्म का आड़ लेकर मनुष्य ने बड़े ही क्रूर तरीके से अपने विरोधियों का सफाया किया, तो कभी धर्म का विरोध करने के नाम पर बेरहम हत्यायें कीं. लिहाजा चाहे आस्तिकता रही हो या नास्तिकता, अपने लाभ के लिए हत्यारे दोनों रहे. दूसरी तरफ आस्तिकता और नास्तिकता मानव इतिहास में सृजनात्मक ताकतों के भी प्रेरणास्रोत बनते रहे.
लिहाजा मानव इतिहास का अनुभव यह रहा है कि किसी व्यक्ति या समाज का धार्मिक या नास्तिक होना उसके उत्थान या पतन से जुडा उतना महत्वपूर्ण तत्व नहीं है, जितना कि उसका विध्वंसकारी या सृजनात्मक होना. अपने सृजनात्मक स्वरूप में धर्म से अभिप्रेरित तिब्बती शासक लामा थे तो अपने नकारात्मक चरित्र की वजह से नास्तिकता और वैज्ञानिक सोच की बात करने वाले साम्यवादी शासक हत्यारे बन गए थे.
कोई भी विचारधारा यदि किसी समाज या व्यक्ति को भय-रहित नहीं करती, मनुष्य के मस्तिष्क को चेतनाशील और उदार नहीं बनाती, तो ऐसी विचारधारा मनुष्यता का भला कतई नहीं कर सकती. कोई भी विरोध या समर्थन अगर मानवीय नहीं है और किसी भी अमानवीय कृत्य का समर्थन करता है, तो उस विचार का समर्थन करने वाले व्यक्ति कभी सही नहीं हो सकते. कोई भी विचारधारा जो किसी भी तरह से नफरत फैलाने के लिए इस्तेमाल होती हो, ऐसी विचारधारा व्यर्थ है और ऐसी विचारधारा त्याज्य होनी चाहिए.मानवता के लिए भले विचार धर्म के नाम पर कहे जायें या नास्तिकता के नाम पर, होते भले हैं. हत्यारे नास्तिक भी होते हैं और धार्मिक भी. बस वह अपना भेष बदलते रहते हैं. हत्यारे अपने मुखौटे खूब पहचानते हैं. उन्हें पता है कब नास्तिकता का और कब धर्म का मुखौटा पहनना है.

कश्यप किशोर मिश्र राजनीतिक विश्लेषक हैं.



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