“हिन्दू-मुस्लिम
एका” के प्रतीक पुरुष माने जाने वाले
जिन्ना को जब कांग्रेस में गाँधी के सामने अपना छोटा होता कद स्वीकार नहीं हुआ, तो
उन्होंने राजनीती से सन्यास ले लिया | राजनीती से ज़िन्ना का यह सन्यास अपने आप में
स्पष्ट करता था कि ज़िन्ना की राजनीती “व्यक्तिवादी”
थी और ज़िन्ना को अपनी समाजसेवा की मिहनत का ईनाम चाहिए था |
एक अंतराल के बाद ज़िन्ना अपनी
दुरभसंधियो के साथ वापिस आये और “मुसलमान
एक अलग कौम” की अलग तान
छेड़ बैठे | पता भी न चला और बस एक दशक के भीतर ज़िन्ना के पीछे-पीछे चला समूह एक
अलग कौम पाकिस्तान बन गया| इस धुन के फ़रेब से जबतक पाकिस्तानी भाइयो की आँख खुलती
तबतक दो कौमियत के उसूल को तमाचा लगाते पाकिस्तान से एक अलग मुल्क बांग्लादेश बन
चुका था |
ऐसा नहीं है, कि ज़िन्ना का पाकिस्तान
किसी बहुत सोच-विचार का नतीज़ा था | ज़िन्ना की कल्पनाओ में, जहाँ एक तरफ सदर ऐ
मुल्क होने का ख़्वाब था तो दूसरी तरफ अपने सप्ताहांत की छुट्टियाँ बम्बई के अपने
बंगले में बिताने जैसा, एकदम विरोधी ख्याल भी शामिल था| अपने ख़्वाब की तामीर के
पहले उदबोधन की बिना पर तो ज़िन्ना का पाकिस्तान, नेहरु के हिंदुस्तान के मुकाबले
कई गुना जादा सेकुलर होने वाला था पर विमान से जब उन्होंने शरणार्थियो के हूजूम
देखे तो सिर पकड़ बैठ गए और बस उनके मुह से यही निकाला “हे
भगवान् ! मैंने ये क्या कर दिया”|
अपनी बिमारी के दौरान ज़िन्ना ने, अपने चिकित्सक से, पाकिस्तान को अपनी ज़िन्दगी की
हिमालयी भूल कहा था | कम से कम ज़िन्ना, ईमानदार थे कि उन्होंने ख़ुद को गलत माना|
इधर आज़ादी के साथ ही नेहरु ने 'ट्राईस्ट विथ डेस्टिनी' के
राग में आम अवाम को झूमाना शुरू किया और निर्गुट आन्दोलन के जरिये अपने लिए एक
विश्व-नागरिक की पहचान का ईनाम ढूढने चल दिए| नेहरु के सपनो का “अंतिम
अंग्रेज” बस भारतीयों के ही नहीं बल्कि
दुनिया के दिलो पर राज करना चाहता था, पर भारत पर चीन के हुए हमले ने, नेहरु के
फ़रेबी-राग को भंग कर दिया और सामान्य भारतीय जनता मानो सोते से जाग गयी | जनता की
प्रतिक्रिया आये इसके पहले नेहरु की मौत हो गई |
लालबहादुर शास्त्री ने अपने छोटे से
कार्यकाल में पाकिस्तान को युद्ध में मात दी और युद्ध में जीती जमीन समझौते की मेज
पर हार आये, समझौते के तुरंत बाद ताशकंद में ही शास्त्री जी की मौत हो गई और
इंदिरा गाँधी परिदृश्य पर उभर आई, गूंगी गुड़िया इंदिरा के लिए जोड़-तोड़ का काम के.
कामराज ने किया था |
पर इन सबका कोई भी फ़ायदा, भारत की जनता को नहीं मिल रहा था, उल्टे युद्ध की भारी लागत, तेल की बढती कीमतों और घटते औद्योगिक उत्पादन ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था| पर इंदिरा अब जनता को बहलाना सीख चुकी थी| उनकी भंगिमाए और कार्य भावनात्मक तौर पर जनता पर असर करते थे | उन्होंने भारतीय जनता को आत्म-मुग्ध करने की कसरत शुरू कर दी| वो एक तरफ भारतीय जनता को, कभी परमाणु-विष्फोट से तो कभी प्रिवी-पर्स की समाप्ति और बैंको के निजीकरण से बहला लिए जा रही थी तो दूसरी तरफ एक एक कर के अपने विरोध में उठने वाली हरेक आवाज को दबाती भी जा रही थी | अब इंदिरा किसी भी विरोध से बेपरवाह एक निर्विघ्न शासक बन गयी थी, जहा प्रतिरोध के स्वर नगण्य थे |
पर इन सबसे अलग, इलाहाबाद उच्च-न्यायालय के एक अकेले फ़ैसले ने इंदिरा के आधिपत्य को चुनौती देदी | 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इंदिरा के 1971 के चुनाव को अवैध ठहरा दिया| इंदिरा अबतक बेलगाम हो चुकी थी| उनकी मनःस्थिति एक लोकतंत्र के प्रधान की बजाय एक राजतंत्र वाले राजा की हो चुकी थी जिसकी ख़ुद की सनक की कीमत भी उसके प्रजा को चुकानी पड़ती थी| इंदिरा ने मध्यकाल के राजाओ वाली सनक का परिचय देते हुए, बजाय इस्तीफ़ा देने के 26 जून को आपातकाल की घोषणा कर दी और पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया, यह सब कुछ इतना त्वरित और अकल्पनीय था कि इसकी खबर जनता को सुबह के समाचार से मिली|
आपातकाल के इक्कीस महीने, देश की जनता को अपने मताधिकार के सूझ-बूझ से इस्तेमाल करने के सबसे बड़े सबक थे| सारे नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए| यह भारत के लोकतंत्र के सबसे अँधेरे दिन थे जब एक तरफ इंदिरा का अमर्यादित व्यवहार किसी तानाशाह की तरह का था तो दूसरी तरफ उनके पुत्र संजय गाँधी, वस्तुतः, दूसरे सत्ता ध्रुव बन गए थे, इन सबसे इतर संजय का एक चारण-भाट दल अत्यंत प्रभावी हो चुका था|
संजय का चापलूस और चारण यह दल एक से एक अमर्यादित कृत्य करता रहता| उस वक़्त सत्ता में प्रभावी रहा दल-बल लूट के हर मौके और तरीके को बड़ी ही निर्लज्जता से अमल में ला रहा था| भारतीय लोक ने अपनी बेबसी की जो वीभत्सतम कल्पना की थी, यह काल उससे भी वीभत्स था| 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी।
देश की जनता ने इंदिरा और उनके दल बल को करार जबाब दिया और इंदिरा के विरोध में बने जनता पार्टी को अपना विश्वास सौपते हुए, सत्ता सौप दी| मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने|
जनता पार्टी को भारत की जनता ने सिर्फ सत्ता ही नहीं अपने विश्वास की थाती भी सौपी थी| उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से कांग्रेस का एक भी उम्मेदवार विजयी नहीं हुआ, ख़ुद इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गई और कांग्रेस के मात्र 153 सांसद लोकसभा में पहुचे| यह एक भयानक पराजय थी और विरोधी दलों की प्रचंड विजय भी| भारतीय जनता, जिसका अहम् आपातकाल में बुरी तरह रौदा गया था, ने कांग्रेस के सिर्फ उन्ही चेहरों को लोकसभा की राह दिखाई थी, जिसे उसने इंदिरा की व्यक्तिवादी और उन्मक्त राजनीती से इतर समझा था| जनता इंदिरा से इतनी बिफरी हुई थी, कि जिसने भी इंदिरा का विरोध किया या इंदिरा द्वारा आपातकाल में प्रताड़ित हुआ उसे विजयी बना दिया| देश की जनता ने बड़े हुमक के साथ, इंदिरा को बेदखल कर के, यह प्रमाणित करने की कोशिश की, कि “लोकतंत्र का राजा लोक होता है, तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोग नहीं और शीर्ष पर बैठे लोग लोकजीवन से जुड़े हितो के प्रहरी मात्र होते है|”
जून 75
की शुरुआत में जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया था, जयप्रकाश
नारायण जिन्हें जेपी भी कहा जाता था, के साथ पूरा बिहार हुंकार भर के खड़ा हो गया |
जून के अंत में इंदिरा ने आपातकाल लगा दिया और जेपी को गिरफ्तार कर लिया, पर
सम्पूर्ण क्रांति के स्वर दबाने में वह असफल रही| जनता पार्टी के सूत्रधार जेपी
थे, पर अधिक उम्र और अस्वस्थता की वजह से उनका सक्रीय रहना कठिन था, लिहाजा खूब
सारी रार, मान मनौअल के बाद मुरारजी देसाई ने जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के तौर
पर मार्च-77 के अंत में शपथ ग्रहण किया, प्रधानमंत्री पद के दुसरे दावेदार और
प्रधानमंत्री की कुर्सी न मिलने से खफा चौधरी चारण सिंह उप-प्रधानमंत्री बने|
जनता
पार्टी की सरकार तो बन गयी पर स्थिति “मुंडे-मुंडे
मतिभिन्ना” की थी| सरकार बन जाने के बाद जनता पार्टी से जुड़े
लोग अपना हित देख रहे थे, जबकि मोरारजी देसाई कायदे के बड़े सख्त थे, उनके भीतर
प्रशाशनिक सख्ती भी बहुत थी, साथ ही वो एक बेलाग-लपेट बात करने वाले आदमी थे| लिहाजा
सरकार बनने के साथ ही गुटबाजी और आपसी खीचतान नज़र आने लगी| देश की जनता ने बड़े
भरोसे से जनता पार्टी के हाथ में शासन की बागडोर सौपी थी, पर सरकार एक तमाशा बन गई
थी|
भारत
की जनता इस तमाशे से विचलित थी, पर जनता पार्टी से जुड़े लोग अड़ियल रुख से काम कर
रहे थे, यहाँ तक कि जनता पार्टी ने शासन में आते ही, उन नौ राज्यों में जहाँ
कांग्रस की सरकार थी, उन्हें भंग कर दिया और वहां चुनाव की घोषणा कर दी, यह अत्यंत
असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और गलत निर्णय था, पर जनता पार्टी सारी आलोचनाओ को
दरकिनार कर अपने रुख पर कायम रही| कांग्रेस भी चुप नहीं बैठी थी, उसने चौधरी चारण
सिंह और हेम्वंती नंदन बहुगुणा जैसे लोगों को तोड़ना शुरू कर दिया कांग्रेस की धुर विरोधी जनसंघ ने जनता पार्टी
में अपना विलय कर लिया था पर उसकी एक इकाई “आरएसएस” जो
राजनैतिक दल के रूप में पंजीकृत नहीं थी अपने अस्तित्व को कायम रखे हुए थी|
पूर्ववर्ती जनसंघ के सदस्यों के “आरएसएस” से
सम्बन्ध के मुद्दे को चरण सिंह ने हवा देना शुरू किया और इसी मुद्दे पर चरण सिंह ने जनता सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया|
भारतीय जनता अवसरवादिता के इस निक्रिष्ट उदहारण की बेबस गवाह बनने को मजबूर थी| जिस कांग्रेस के विरोध में उसने जनता पार्टी को अपना मत दिया था, उसी का एक हिस्सा बड़ी ही बेशर्मी से, चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा कर रहा था| चौधरी चरण सिंह, अवसरवादिता के इस घटिया गठजोड़ के प्रधानमंत्री बने और यह सरकार पांच महीने तक चली, जिसमे चौधरी चरण सिंह कभी संसद नहीं गए|
भारत की जनता के साथ यह करारा विश्वासघात था| जनता ने समाजवाद और राष्ट्रवाद के जिस घालमेल को नजरअंदाज कर, लोकद्रोही इंदिरा को हरा कर जनता पार्टी को अपना विश्वास सौपा था, उस विश्वास की, जनता पार्टी के धड़े अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओ और अंतरविरोधो की खुलेआम अभिव्यक्ति से, खिल्ली उड़ा रहे थे| साथ ही दूसरी तरफ अपने खिलाफ़ चल रहे आक्रामक जाँच के तेवरों से इंदिरा एक बार पुनः अपने प्रति सहानुभूति का पात्र बन रही थी| इंदिरा जनता पार्टी के नेताओं के मुकाबले कई गुणा जादा चतुर थी, उन्होंने जनता पार्टी के नेताओं की फूहड़ता का पूरा फ़ायदा उठाया और पांच महीने बाद, चरण सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया|
भारतीय जनता के पास अब कोई विकल्प नहीं था, इंदिरा के रूप में एक अकेला चरित्र था, जो एक मजबूत सरकार दे सकता था और सातवे आम चुनाव में इंदिरा कांग्रेस ने 350 जबकि जनता पार्टी ने 32 सीट प्राप्त की| जनता पार्टी ने भारतीय जनता से तगड़ा विश्वासघात किया था और जनता अपने को मूर्ख बना महसूस कर रही थी|
इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री बने “मि. क्लीन” राजीव गाँधी के नेतृत्व में, कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और 409 लोकसभा सीटों के प्रचंड बहुमत से वह सत्ता में आई, पर राजनीती में अनुभवहीन राजीव गाँधी पार्टी के भीतर चल रही भीतरघात और गुटबाजी से निबटने में इंदिरा की तरह सक्षम नहीं थे| राजीव को अभी भारतीय राजनीती के प्राम्भिक पाठ भी सीखने थे और उनका पाला बड़े ही घाघ राजनीतिज्ञों से था| कांग्रेस के भीतर का ही एक गुट, राजीव की कैम्ब्रीज की पढाई और आम आदमी से जुडाव न होने की ख़बरे उड़ाया करता|
राजीव युवा थे और उस वक़्त भारतीय उपमहाद्वीप की भू-राजनैतिक परिस्थितिया जटिल थी| राजीव ने मालदीव में सत्ता-पलट की एक कोशिश नाकाम की और वाह-वाही लूटी पर तमिल समस्या उनके गले की फांस बन गयी| आपरेशन ब्रास ट्रैक्स के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बनाया तो बोफ़ोर्स का जिन्न उछल कर सामने आ गया| राजीव पर उसके ही मंत्रिमंडल के सहयोगी विश्वनाथ प्रताप सिंह आक्षेप करने लगे| एक तरफ सहयोगियों का आक्षेप तो दूसरी तरफ राष्ट्रपति जैल सिंह से मनमुटाव की खबरों के बीच राजीव ने अपने राजनैतिक जीवन की भयानक भूल की| राजीव ने प्रेस-अध्यादेश लाकर अखबारों की स्वतंत्रता सिमित करने की कोशिश की. जिसे चौतरफ़ा विरोध के बाद उन्होंने वापस ले लिया, पर प्रेस उनका विरोधी हो चुका था| अखबारी जगत ने राजीव को खलनायक बना दिया और मंत्रिमंडल से
बर्खास्त किये जाने के बाद कांग्रेस और लोक सभा में अपनी सदस्यता से इस्तीफा देकर, अरुण नेहरू और आरिफ
मोहम्मद खान के साथ जन मोर्चा नाम से अपना दल बना कर राजीव विरोध की राजनीती कर रहे “विश्वनाथ प्रताप सिंह” को जननायक बना कर पेश कर दिया|
भारतीय जनता विश्वनाथ प्रताप सिंह और मिडिया की जुगलबंदी को समझ नहीं पाई और एक बार फिर फ़रेब का शिकार हुई| अखबारों ने “वीपी सिंह” की “राजा नहीं फ़कीर” की छवि गढ़ दी और राजीव की छवि बोफ़ोर्स के दलाल की गढ़ दी गई| वीपी एक मंझे हुए राजनितिज्ञ थे और उनके मुकाबले राजीव अनाड़ी थे| विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जान बुझकर इस अफवाह को हवा दी कि उनके पास बोफ़ोर्स मामले से जुडी एक ऐसी फाइल है, जिससे राजीव का राजनैतिक जीवन तबाह हो जायेगा| वीपी अपनी जनसभाओ में एक पाकिट डायरी निकलते और दावा करते इस डायरी में बोफ़ोर्स से जुड़े खातो और व्यक्तियों के नाम के विवरण मौजूद है और वह उन्हें बेनकाब कर के रहेगे| वीपी का यह दावा बाद में सफ़ेद झूठ निकला, उनके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं थी और वह भारतीय जनता को धोखा दे रहे थे| भारतीय जनता वीपी सिंह के फ़रेब का शिकार हुई और उसने एक झूठ बोल कर फ़रेब गढ़ रहे आदमी को भारत का प्रधानमंत्री बनने का मौका दे दिया|
वीपी सिंह बोफ़ोर्स से जुडा कोई दावा
सामने नहीं ला सके और उनके कार्यकाल की दो प्रमुख स्मृतियाँ बीजेपी का उभार और
मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करना रही| वीपी की मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की
काट बीजेपी ने रथयात्रा से करने की कोशिश की जिसका अंत सरकार से बीजेपी के समर्थन
वापसी के रूप में सामने आया| वीपी सिंह के पास विश्वासमत हारने के बाद कोई चारा
नहीं बचा और उन्होंने नवम्बर-90 में इस्तीफ़ा दे दिया| कांग्रेस ने, 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी को बाहर से समर्थन देकर सरकार बनवाई जो मार्च-91 के शुरू तक चली| कांग्रेस विरोध के नाम पर आये चंद्रशेखर अपने दल के साथ कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे थे और देश की जनता इस विडंबना की मूक गवाह बने रहने को मजबूर थी|
दसवे आम चुनाव के दौरान राजीव गाँधी की हत्या हुई और 232 सीटों के साथ कांग्रेस ने पीवी नरसिंहराव के नेतृत्व में अल्पमत सरकार बनायीं| यह सरकार लगातार घोटालो के आरोप में रही, विश्वास मत पाने के लिए, इस सरकार पर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख्त के आरोप लगे, जो कालांतर में सही साबित हुए और कुछ करने की बजाय, यह सरकार कुछ न करने के लिए जादा जानी गई| इसी सरकार के दौरान अयोध्या में विवादित ढांचा ढ़हाया गया और यह आरोप लगे कि विवादित ढांचे को ढहाने में नरसिंह राव की मूक सहमति थी|
ग्यारहवे आम चुनाव के बाद संसद त्रिशंकु थी,
सबसे पहले बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने मई में प्रधानमंत्री का पद
सम्हाला और तेरह दिनों के भीतर उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा जिसके बाद जनता दल के नेता
देवेगौड़ा ने जून में संयुक्त मोर्चा गठबंधन की सरकार बनाई, यह सरकार 18 महीने चली
और अंत में एक बार पुनः देश की जनता ने देखा कि, बीस बरस भी पूरे नहीं हुए और इस
छोटी सी समयावधि में ही, कांग्रेस विरोध के नाम पर चुने लोगो की सरकार को कांग्रेस
तीसरी बार समर्थन दे रही थी| कांग्रेस के
के बाहरी समर्थन से, देवेगौड़ा के विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री
के रूप में अप्रैल 1997
में पदभार संभाला जो नवम्बर-97 तक चली|
बाद के छः वर्ष तक बीजेपी का शासन रहा जिसमे बारहवें और तेरहवे लोकसभा चुनाव के
साथ साथ वाजपेयी की पहले तेरह महीने और फिर पांच साल का शासन शामिल था| लोकसभा के
चौदहवे आम चुनाव के साथ कांग्रस की सत्ता में वापसी हुई| तमाम नाटकीय घटनाक्रम के
बाद मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने पर शुरूआती उम्मीद जगाने के बाद कुल मिला
कर उन्होंने जनता को निराश जादा किया|
इसी निराशा के माहौल में, अन्ना हजारे
लोक जीवन के प्रतिनिधि बन के उभरे| अन्ना के सहयोगियों में से कुछ ने, अन्ना से
अलग होकर एक राजनैतिक दल बनाया और 2014 में होने वाले सोलहवे आम चुनाव के पूर्व,
एक पायलट प्रोजक्ट के तौर पर दिल्ली विधानसभा के चुनाव में शिरकत की| दिल्ली
विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 32, केजरीवाल के दल को 28 जबकि कांग्रेस को 8 सीटें
मिली| आज की तारीख में, देश की जनता कांग्रेस के बाहर से समर्थन से, दिल्ली
विधानसभा में, चल रही केजरीवाल की सरकार की साक्षी है|
यह जनता, जिसका एक बड़ा हिस्सा बढती शीत के साथ-साथ कापता है, जिसकी राते, पूस हो तो, गहराते जाने के साथ-साथ, और गहरी नहीं, और उनींदी होती है, वो ठंढाते रहते है, रात भर ! फागुनी राते बस उनका मन ही नहीं भिगोती,उनके घर को भी, उनके शरीर को और उसकी जमा-पूँजी को भी गीला करती है | उनकी पूरी की पूरी जेठ की दुपहरी और रात, गर्मी से भीगते तन बदन के साथ बीतती है| इन बीते बरसो में हिन्दुस्तान का एक आम-मतदाता हो सकता है मूर्ख नहीं रहा हो, राजनैतिक रूप से चतुर हो गया हो, नेताओं को पहचाने भी लगा हो पर कुल मिला कर बीतते हर बरस के साथ, सत्ता-प्रतिष्ठानों के सामने बेचारा और, और जादा बेचारा ही हुआ है, यह बेचारगी, कम से कम वे
लोग जो किसी भी तरह से,किसी भी सत्ता प्रतिष्ठान से नहीं जुड़े
है, रोज अनुभव करते है|
"इन्टरप्रेटेशन ऑफ़ डीड्स, डाकुमेंट्स एंड
ला" हमें यह सीखाता है, कि शब्दों के अर्थो से जादा अर्थवान शब्दों के गर्भित
अर्थ होते है | जैसा की "देरिदा" भी कहा करते
थे "शब्दों के मूलपाठ में नहीं, अर्थ उनके अंतरपाठ
में होता है" और जिसे कुटनीतिक तबके में और तरीके से "बिट्वीन द
लाइंस" कहते है |
इस देश का आम
मतदाता, न तो अंतरपाठ समझता है, न वाक्य मध्य के आशय जानता बूझता है, वह अपनी बात सीधी-सीधी कहता है और दुसरो की बात सीधी-सीधी ही
समझता भी है| अब अगर कोई आदमी यह कहता है कि वह उनके
बीच का ही, उनके जैसा ही, एक आम-आदमी है| तो यह असल वाला
आम-आदमी यही मान लेगा कि उसके कहे का वही मतलब है, जैसा कि उसने कहा
है|
तो जब विश्वनाथ
प्रताप सिंह अपनी पाकिट डायरी दिखाते हुए हरेक जन सभा में कहते फिरते थे, कि इस डायरी में बोफ़ोर्स से जुड़े खातो के नंबर उनके पास मौजूद
है और वह उन्हें बेनकाब कर के रहेगे तो लोग उसपर बिना तीन पांच किये भरोसा करते थे, यह भरोसा टूटा तो "राजा नहीं फ़कीर देश की तकदीर" का
नारा लगाने वाले इसी आम आदमी ने उनकी मौत की ख़बर तक को कितनी तवज्जो दी, यह बहुत पुरानी बात नहीं|
ठीक वैसे ही, जब केजरीवाल अक्तूबर-13 के दौरान कहते फिरते थे, कि उनके पास शीला
दीक्षित के खिलाफ़ 370 पेजों के सबूत है तो एक आम-आदमी मान लेता
था कि हां! इस आदमी के पास सबूत है और यह इसे साबित भी करेगा क्योकि केजरीवाल चाहे
जो भी हो , पर थे तो "भारतीय राजस्व सेवा"
के कमिश्नर रैंक के पूर्व अधिकारी ही, जिसे यह भली भांति
पता था कि "विधि सम्मत सबूत" क्या होता है|जब वो अपने पास सबूत होने का दावा करते थे, तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी उनकी ही बन जाती थी|
और अब ! जब
केजरीवाल कहते है "अगर कोई सबूत है तो लेकर आइये दो घंटे में जांच होगी"
तो वह इस आम-आदमी के भरोसे का मखौल उड़ा रहे होते है, यहाँ सीधे-सीधे
जिम्मेदारी दूसरो के पाले में डाल देने की बात भी है | अर्थात जो सबूत लायेगा, साबित करने की
जिम्मेदारी भी उसकी ही होगी कि आरोप सही है| यहाँ केजरीवाल किसी
भी तरह की जबाबदेही से परे रहेगे|
अभी जुम्मा जुम्मा
चार दिन हुए हैं पर इस तरह की पलट-बयानी के बाद हम इत्मीनान से कैसे रहे ? कहाँ तो केजरीवाल ने दिन रात जनता के हित में काम करने का वायदा
किया था और कहाँ वह "पोलिटिकली करेक्ट स्टैंड" के फिक्रमंद हुवे जा रहें
है| इस मुल्क के मतदाता ने बहुत धोखे खाए है, लिहाजा हम इत्मीनान से नहीं बैठ सकते| जनाब केजरीवाल! हम पहले दिन से ही, पहले घंटे से ही आपके किये के मुन्तजिर है|
हम आपको तगड़ा
सपोर्ट भी करेगे, हम आपका तगड़ा विरोध भी करेगे |
पर इन सबका कोई भी फ़ायदा, भारत की जनता को नहीं मिल रहा था, उल्टे युद्ध की भारी लागत, तेल की बढती कीमतों और घटते औद्योगिक उत्पादन ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था| पर इंदिरा अब जनता को बहलाना सीख चुकी थी| उनकी भंगिमाए और कार्य भावनात्मक तौर पर जनता पर असर करते थे | उन्होंने भारतीय जनता को आत्म-मुग्ध करने की कसरत शुरू कर दी| वो एक तरफ भारतीय जनता को, कभी परमाणु-विष्फोट से तो कभी प्रिवी-पर्स की समाप्ति और बैंको के निजीकरण से बहला लिए जा रही थी तो दूसरी तरफ एक एक कर के अपने विरोध में उठने वाली हरेक आवाज को दबाती भी जा रही थी | अब इंदिरा किसी भी विरोध से बेपरवाह एक निर्विघ्न शासक बन गयी थी, जहा प्रतिरोध के स्वर नगण्य थे |
संजय का चापलूस और चारण यह दल एक से एक अमर्यादित कृत्य करता रहता| उस वक़्त सत्ता में प्रभावी रहा दल-बल लूट के हर मौके और तरीके को बड़ी ही निर्लज्जता से अमल में ला रहा था| भारतीय लोक ने अपनी बेबसी की जो वीभत्सतम कल्पना की थी, यह काल उससे भी वीभत्स था| 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी।
इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री बने “मि. क्लीन” राजीव गाँधी के नेतृत्व में, कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और 409 लोकसभा सीटों के प्रचंड बहुमत से वह सत्ता में आई, पर राजनीती में अनुभवहीन राजीव गाँधी पार्टी के भीतर चल रही भीतरघात और गुटबाजी से निबटने में इंदिरा की तरह सक्षम नहीं थे| राजीव को अभी भारतीय राजनीती के प्राम्भिक पाठ भी सीखने थे और उनका पाला बड़े ही घाघ राजनीतिज्ञों से था| कांग्रेस के भीतर का ही एक गुट, राजीव की कैम्ब्रीज की पढाई और आम आदमी से जुडाव न होने की ख़बरे उड़ाया करता|
बाद के छः वर्ष तक बीजेपी का शासन रहा जिसमे बारहवें और तेरहवे लोकसभा चुनाव के साथ साथ वाजपेयी की पहले तेरह महीने और फिर पांच साल का शासन शामिल था| लोकसभा के चौदहवे आम चुनाव के साथ कांग्रस की सत्ता में वापसी हुई| तमाम नाटकीय घटनाक्रम के बाद मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने पर शुरूआती उम्मीद जगाने के बाद कुल मिला कर उन्होंने जनता को निराश जादा किया|


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