Thursday, December 18, 2014
Wednesday, December 17, 2014
Sunday, December 14, 2014
दुःख तो दुःख होता है
.bmp)
आज के तेज रफ़्तार समय में, एक जान पर वक़्त देना फिजूल लगता है, यह बात एक बैंकर को भी फिजूल ही लगी थी, जब काम से वापिस लौटते मोहल्ले के चौराहे पर जमा भीड़ ने उसकी कार रोक मदद की गुहार लगाईं, किसी लड़के को सड़क-दुर्घटना में चोट आई थी और उसे अस्पताल ले जाना था, पर वह बहाना बना आगे बढ़ लिया, उसने मन ही मन सोचा “रोज ही का किस्सा बन गया है, यह सब” पर दुर्भाग्य से जिस लड़के के साथ यह दुर्घटना हुई थी, वह उसकी ही इकलौती संतान था, जिसकी समय से अस्पताल न पहुच पाने की वजह से मौत हो गई | रोजमर्रा की, सड़को पर होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं, जिन्हें वह देखा-अनदेखा किया करता था, उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी |
आज
के समाज का तानाबाना “न्यूनतम
संसाधन से अधिकतम लाभ”
अर्जित करने की आर्थिक सोच से इतना अधिक प्रभावित है, कि जीवन का मूल्य भी इकाई
दहाई सैकड़े की गिनती से तय होने लगा है, ऐसे में किसी एक अकेले आदमी की जरूरते,
ख़ुशी दुःख परेशानिया बहुतों की जरूरतों खुशियों दुःख और परेशानियों के सापेक्ष गौण
हो जाती हैं, पर इससे उस अकेले आदमी की पीड़ा परेशानी या ज़रूरत महत्वहीन नहीं हो
जाती |
भूख सौ लोगों की मिटे या एक आदमी की पर जिसे भोजन मिला उसके लिए यह बड़ी बात होती है, मौत एक आदमी की हो, या सौ आदमियों की, पर जो मर गया, उसके लिए सबकुछ ख़तम हो जाता है| यह बात मानवीय समझ का सहज हिस्सा है, पर परपीड़ा का आकलन जब संख्या के हिसाब से किया जाने लगे तो इसका आशय यह निकलता है, कि समाज से रफूगर कम हो रहे है | छोटी-छोटी घटनाओं, एक अकेले आदमी की पीड़ा, उसकी टूटन की रफू कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की रफूगरी, हमारा समाज भूलता जा रहा है |
भूख सौ लोगों की मिटे या एक आदमी की पर जिसे भोजन मिला उसके लिए यह बड़ी बात होती है, मौत एक आदमी की हो, या सौ आदमियों की, पर जो मर गया, उसके लिए सबकुछ ख़तम हो जाता है| यह बात मानवीय समझ का सहज हिस्सा है, पर परपीड़ा का आकलन जब संख्या के हिसाब से किया जाने लगे तो इसका आशय यह निकलता है, कि समाज से रफूगर कम हो रहे है | छोटी-छोटी घटनाओं, एक अकेले आदमी की पीड़ा, उसकी टूटन की रफू कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की रफूगरी, हमारा समाज भूलता जा रहा है |
आज
के दौर में, हम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार करते है, हमारी प्रतिक्रिता किसी बड़ी
घटना पर होती है, हमारी संवेदना किसी बड़ी घटना पर जाग्रत होती है | भयानक बाढ़ में
पांच सौ लोगों की मौत से हम करुणा से भर उठते है, अपने वेतन से कटा कर पैसा भी
भेजते हैं जबकि पड़ोस में सड़क की पटरी पर ठण्ड से मर गए भिखारी पर हमारी करुणा नहीं
जगती, हांलाकि बस एक कंबल उसकी जान बचा सकता था | व्यक्तिगत पीड़ा और सुख दुःख की
सहज समझ बच्चो में मौजूद है, पर आदमी अपनी समझदारी में इस सहज समझ को भूलता जा रहा
है|
इस आलेख का प्रकाशित लिंक ;- दुःख तो दुःख होता है
भास्कर रसरंग का पृष्ठ लिंक ;- भास्कर रसरंग 14-दिसंबर-2014, पृष्ठ 2 एवं 3
Wednesday, December 3, 2014
उस बाज़ार की औरतें
दर्द से टूटती देह,
पीड़ा से चमकती कमर के साथ,
इन औरतों की सुबह वैसी ही होती है,
जैसे प्याली की तलछट में छूटी चाय,
बेशक कितनी भी स्वादिष्ट थी,
पर जूठी प्यालियो से छलकती,
बस ऊबकाई आती है !
उस बाजार की औरतें,
चढ़ती शाम के साथ,
गर्म-गर्म भाप उठती चाय हैं, बबुआ !
पर रात-उतरते,
बेस्वाद बदबूदार तलछट में पड़ी
ऊबकाई दिलाती,
बची जूठन हो जाती हैं |
प्यालियाँ अभी भी वही की वही हैं |
तो जब इन जूठन को देख आपको ऊबकाई आ रही होती है,
तब कराहती हुई,
किरचों-किरचों में बिखरी
अपनी शख्शियत को समेटती,
उस बाजार की औरते उठती है,
उन्हें अपने सामने पसरे,
एक उदास और उजाड़ दिन का विस्तार लांघना है |
ख़ुद को टाँकती, अपनी उधड़ी सिलाई की तुरपन करते,
अलग-अलग कोनों में पड़ी पुतलियों से,
अलग-अलग रिश्तो के कंगन पहन,
वो बन जाती हैं, अम्मा, भाभी, दीदी, मामी, ताई !
ये रिश्ते
“बेटियाँ” वाले रिश्ते दफ्न,होने के बाद ही बने थे |
अब इन औरतों को चलानी हैं, घर-गृहस्थी
करना है सौदा-सुलफ़,
पकाना है, खाना-खिलाना है,
पूरे का पूरा एक दिन, दोपहर भर में निपटाना है,
गो कि, शाम के पहले, धुल-पूछ
“भाप उठती गर्म चाय की प्याली” बन जाना है |
वो सोचती है, यह सब,
वो सोचती है, यह सब,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |
तो वो जल्दी-जल्दी खरीदती है,
तेल-चावल-मसाला किराने से|
उसे जल्दी है और लाला वक़्त रोकने को आतुर है,
उसे पड़ी है जल्दी से किराने की
उसकी निगाहों में है,
तेल का नपना, तराजू की डंडी |
इधर लाला की निगाहें उस पे धसी जा रही है,
वह झिकती है, “सामान तौलों लाला- समय की तंगी है”
लाला की निगाह और धस जाती है,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |
सब्जी खरीदते,
सब्जी वाला उसे अर्थाते
घटिया मजाक करते जाता है,
उसका जी करता है, एक चमाट रख दे,
सब्जीवाले के गाल पर |
पर आखिरकार उसे चुप रह्जाना सही लगता है
अन्दर की पीड़ा से एकबार फिर,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |
अब, वह मछली खरीद रही है
मछली वाला कह रहा है, पैसे की क्या बात है,
पूरी मछली ले जाए, खुश हो जाए !
बस उसे खुश कर जाए |
वो कहना चाहती है,
जा “अपनी बेटी को खुश कर”
जा “अपनी बेटी को खुश कर”
पर बेटी शब्द उसके कलेजे में फंसते हैं,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |
जैसे-तैसे पूरे करती है, घर के काम धंधे,
हलक के नीचे, जल्दी-जल्दी उतार रही है कुछ कौर,
अभी भूख पेट में बाकी है,
वह पेट भर लेना चाहती है,
सब इस पेट का किया-कराया है |
कि आहट होती है,
साथ की सहेली बताती है, उसका गाहक है,
कुछ और निवाले उतार लेना चाहती है,
पर मजबूरी में उठती है,
गाहक को देख मुस्काती है,
ढक कर छोड़ आई थाली की ललक उठती है,
और वह,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |
बबुआ !
उस बाजार की औरते,
बड़ी फ़रेबी है,
आँखों ही आँखों में जाल बुनती है,
होठो ही होठो में करती हैं, भेदिया इशारे,
उनके इशारों के ज़ाल गहरे है,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे|
_______________
कश्यप किशोर मिश्र
Subscribe to:
Comments (Atom)
.bmp)
.bmp)
.bmp)
.bmp)
.bmp)
.bmp)
.bmp)



.bmp)
