Thursday, March 27, 2008

अंतस की गहराईयां प्रशांत , ये कौन करता मुझको अशांत

शब्दों का कोई अर्थं नही होता , अर्थ उनमे निहित भाव का होता है , एक ही शब्द अलग अलग भाषाओ मे अलग-अलग अर्थ लिए होते है ।यहाँ तक की, उसी भाषा मे भी यमक और श्लेष के प्रभाव सेउनके निहितार्थ भी भिन्न भिन्न हो जाते है.
स्वराघात, स्पंदन, आरोह- अवरोह की तीव्रता या सहजता भी शब्दों के अर्थ परिवर्तित कर देती है । तो फ़िर क्या कारण है की हमारी व्यक्तिगत जिंदगी मे संवाद के लिए शब्दों का होना आवश्यक है , हम शब्दों के आधार पर किसी के भी व्यक्तित्व के बारे मे अपनी सहज ही एक धारणा बना लेते है ।
इसमे कोई शक नही की निश्चित ही किसी भी व्यक्ति की संवाद कुशलता, वार्तालाप के दौरान उसके शब्दों का चयन उसके बारे मे बहुत कुछ बता देता है पर एक व्यक्ति का पूर्ण परिचय उसके भाषिक संवाद की बनिस्पत संवाद की वो शैली जो प्रतीत कराती है, से जादा बेहतर तरीके से पाया जा सकता है ।
एक सधः जात शिशु दुनिया की समस्त भाषाओ से अनजान होता है, वास्तव मे वह अभी अनुभुतियो के आरंभिक आख्यान से रु ब रु भी नही हुआ होता है , पर अपने परिवेश मे व्याप्त माहौल के अनुरूप प्रतिक्रिया देता है । वो कौन सी भाषा है , जो एक मासूम सी छोटी सी बच्ची को किसी की वासनापूर्ण निगाहों से चेता रही होती है ।
अक्सर हम किसी से बात करते सतवाना पूर्ण शब्दों के बद भी असहज महसूस करते है , और कभी कभी जब की बार बार मांगने पर भी अस्वासन नही मिलता तब भी ख़ुद को आश्वस्त महसूस करते है।
ये कौन सी भाषा है जिसमे हम बिना किए भी अपने परम पीता से संवाद स्थापित कर लेते है । वास्तव मे संवाद शब्द मात्र का अंतरण नही बल्कि भाव का अंतरण ज्यादा है ।

Tuesday, March 25, 2008

ये किस मुकाम पर हयात मुझको ले के आ गई

ये किस मुकाम पर हयात मुझको ले के आ गई
हर कोई अपनी जिन्दगी के तमाम मुकाम तय करता है। हर एक प्रत्येक मुकाम उसे कुछ न कुछ ऊंचाई दे कर जाते है, पर ऐसा भी होता है, कि हम अपने आपको उस मुकाम पर पाते है , कि ख़ुशी या ग़म सब अपने इख्तियार से बाहर नज़र आता है । क्या ये हमारी आदमियत कि सीमाये है, या ईश्वर का दिशानिर्देश कि, बस यही तक, यही तक हमारा बस है, हम पर ।वक़्त रुकता नही और हम भी वक़्त के साथ पल -प्रतिपल बदलते रहते है । पर यकीं नही होता, करते भी नही। जिसके नतीजे हम ढेर सारी तस्वीरों को अपने दिमाग मे बसा लेते है , बेशक हम रूबरू थे कुछ पलो के आज से दस बीस साल पहले, पर वे पल एक तस्वीर कि तरह हमारे दिमाग मे चस्पा हो जाते है, और हम लेकर घूमते रहते है उन तस्वीरों को अपने दिमाग मे, अपने पूर्वाग्रहों के साथ। और अरसे बाद भी हमारा दिमाग वही खोजता है । यह स्वीकार करना ही चाहिऐ कि वक़्त और व्यक्ति दोनो बदलते रहते है।हां ये अलग बात है कि आदमी का बदलना ज्यादा कष्ट देता है।

मुझको चाँद ला दो


हरेक बचपन अपनी अनुभूतियों का एक चाँद चाहता है , और एक चाँद की अनुभूति यौवन से भी जुड़ी होती है । बुढापा ज़र्ज़र होते शरीर, चुकती इच्छाशक्ति, धुध्लाती नजरो और मंद होती स्मृति के साथ साथ अपनी अनुभूतियों को भी एक पृथक आयाम देता है, एक चाँद बुढापे की अनुभुतियो का भी होता है ।
चाँद तो बस चाँद होता है । न कम न ज्यादा , न नया न पुराना, न जवान का न बुढे का। पर कुछ तो जरुर है जो इस चाँद को उमर के विविध पड़ाव पर विविध अनुभुतियो का वाहक बना देता है । ये अनुभुतिया व्यक्तिनिष्ठ होती है , चाँद व्यक्तिनिष्ठ नही होता । चाँद हर बच्चे का मामा होता है, मगर एक बच्चे के चन्दा मामा दुसरे बच्चे के चन्दा मामा से एकदम अलग होते है।
चाँद कभी कभी रूप भी बदल लेता है , यौवन के उछाह मे, हरेक प्रेमिका चाँद लगती है , पर वही प्रेमिका रिश्ते के टूट जाने पर चाँद की बजाय बड़ा ही कुरूप शक्ल अख्तियार कर लेती है ।

Monday, March 24, 2008

एक हकीकत एक फ़साना






ये शायद उन गिनी चुनी होलियों मे एक होली थी, जब वाकई सबकुछ बेरंग था । शाम के चार बजे अपने सूने मन के आँगन मे चोर दरवाजे से प्रवेश करता हू । एक भय है, एक रीतापन भी । अपनी खलिश को खंगालता हूँ , के कही ओर- छोर पता चले , पर नाउम्मीदी हाथ आती है।

सोंचता हू उन पिछली होलियों को , जो
शायद कुछ इतनी उत्साह भरी नहीं थी, पर मन के सूने साज पर कुछ सुर हवाओं के हाथ मद्धम मद्धम लोरिया गाते थे। बेशक उनका हासिल कुछ ना रहा हों और दिन कितना भी उदास रहा हों, कितना भी बेरंग पर शाम के साथ कुछ रंग फिजाओ में तिर ही जाते थे. कुछ रंग मुस्कुराहटो से छिटक कर गालों पे आ ही जाते थे. वक़्त तमाशाबीन है पर तमाशा करने से गुरेज़ भी नहीं करता. अब मैं तमाशाबीन हू और वक़्त तमाशाई.