
हरेक बचपन अपनी अनुभूतियों का एक चाँद चाहता है , और एक चाँद की अनुभूति यौवन से भी जुड़ी होती है । बुढापा ज़र्ज़र होते शरीर, चुकती इच्छाशक्ति, धुध्लाती नजरो और मंद होती स्मृति के साथ साथ अपनी अनुभूतियों को भी एक पृथक आयाम देता है, एक चाँद बुढापे की अनुभुतियो का भी होता है ।
चाँद तो बस चाँद होता है । न कम न ज्यादा , न नया न पुराना, न जवान का न बुढे का। पर कुछ तो जरुर है जो इस चाँद को उमर के विविध पड़ाव पर विविध अनुभुतियो का वाहक बना देता है । ये अनुभुतिया व्यक्तिनिष्ठ होती है , चाँद व्यक्तिनिष्ठ नही होता । चाँद हर बच्चे का मामा होता है, मगर एक बच्चे के चन्दा मामा दुसरे बच्चे के चन्दा मामा से एकदम अलग होते है।
चाँद कभी कभी रूप भी बदल लेता है , यौवन के उछाह मे, हरेक प्रेमिका चाँद लगती है , पर वही प्रेमिका रिश्ते के टूट जाने पर चाँद की बजाय बड़ा ही कुरूप शक्ल अख्तियार कर लेती है ।
चाँद तो बस चाँद होता है । न कम न ज्यादा , न नया न पुराना, न जवान का न बुढे का। पर कुछ तो जरुर है जो इस चाँद को उमर के विविध पड़ाव पर विविध अनुभुतियो का वाहक बना देता है । ये अनुभुतिया व्यक्तिनिष्ठ होती है , चाँद व्यक्तिनिष्ठ नही होता । चाँद हर बच्चे का मामा होता है, मगर एक बच्चे के चन्दा मामा दुसरे बच्चे के चन्दा मामा से एकदम अलग होते है।
चाँद कभी कभी रूप भी बदल लेता है , यौवन के उछाह मे, हरेक प्रेमिका चाँद लगती है , पर वही प्रेमिका रिश्ते के टूट जाने पर चाँद की बजाय बड़ा ही कुरूप शक्ल अख्तियार कर लेती है ।
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