Monday, March 24, 2008

एक हकीकत एक फ़साना






ये शायद उन गिनी चुनी होलियों मे एक होली थी, जब वाकई सबकुछ बेरंग था । शाम के चार बजे अपने सूने मन के आँगन मे चोर दरवाजे से प्रवेश करता हू । एक भय है, एक रीतापन भी । अपनी खलिश को खंगालता हूँ , के कही ओर- छोर पता चले , पर नाउम्मीदी हाथ आती है।

सोंचता हू उन पिछली होलियों को , जो
शायद कुछ इतनी उत्साह भरी नहीं थी, पर मन के सूने साज पर कुछ सुर हवाओं के हाथ मद्धम मद्धम लोरिया गाते थे। बेशक उनका हासिल कुछ ना रहा हों और दिन कितना भी उदास रहा हों, कितना भी बेरंग पर शाम के साथ कुछ रंग फिजाओ में तिर ही जाते थे. कुछ रंग मुस्कुराहटो से छिटक कर गालों पे आ ही जाते थे. वक़्त तमाशाबीन है पर तमाशा करने से गुरेज़ भी नहीं करता. अब मैं तमाशाबीन हू और वक़्त तमाशाई.

2 comments:

  1. ब्लॉग की दुनिया में आप भी , हार्दिक स्वागत!
    उत्कट इक्छा आपके मन में है, और कोशिश भी की है, अच्छा लगा.
    कभी समय मिले तो इस तरफ भी रुख़ कीजिये:
    http://shahroz-ka-rachna-sansaar.blogspot.com/
    http://saajha-sarokaar.blogspot.com/
    http://hamzabaan.blogspot.com/

    ReplyDelete
  2. aacha likha hai par maine to study hi nahi kiya

    ReplyDelete