Monday, March 11, 2002

बाट की जोह

_________________कभी एक चेहरे को देखू
कभी किसी से बात करूं
कभी हंसू दिल खोल के अपना
और कभी उदास रहूँ

चेहरे पे एक दूजा चेहरा
दूजे पे तीजा चेहरा
बदल रहे प्रतिपल चेहरों में,
बिसर गया असली चेहरा।

राते आती सन्नाटा ले,
शाम लगे खाली खाली,
दिवस बड़ी उदास दुपहरी,
सुबह नहीं ताजी ताजी।

कभी अगर कोयल कूके तो,
करती जैसे मुझसे संवाद,
पपीहा की बोली तो जैसे,
हो मेरे ही मन की बात।

चल देना है छोड़ मूझे अब,
सारी माया ममता मोह,
तब भी नजर ठिठक सी जाये,
जिसमे तेरे बाट की जोह।
_________________
कश्यप किशोर मिश्र
सिविल लाइन्स, देवरिया |

Kashyap Kishor Mishra

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

    राते आती सन्नाटा ले,
    शाम लगे खाली खाली,
    दिवस बड़ी उदास दुपहरी,
    सुबह नहीं ताजी ताजी।

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