Sunday, August 30, 2009

खामोशी का कोलाहल (३०सित.07 को लिखे एक पैरे का पुनर्विस्तार )

अंतस की प्रशांत गहराइयो की करक कही गहरे और बड़ी मारक कसक पैदा करती है। अब इसे हूक कहे या खामोशी, पर एक बहुत ही सर्द अहसास है, ये। वास्तव में इसकी सर्द और गहनता इतनी जादा होती है, की ठंड कही से भी , कभी भी, गुलाबी न नज़र आती है, न ही महसूस होती है। इन सर्दियों के साथ, जो की अब आने वाले माह के उत्तरार्ध के दौरान अपनी आहट का आभास कराने लगेगी , मेरे जीवन में तमामो तमाम दस्तके जुड़ी है, जो एक सम ताल पर उत्ताल होकर गूंज और अनुगूँज का अदभुद संगीत पैदा करती है। संगीत जो जीवन है, संगीत जो शांत चिरनिद्रा (मौत ) की सुखद लोरी भी है। इन दस्तको से पैदा हुआ जीवन-संगीत सभी के लिए बड़ा ही सुखद होता है। मधुर-मधुर आम की बौरों की खुशबु मिली मंद मंद बहती पुरवाई के सुखद अहसास की तरह। विगत तीन-चार वर्षो का एक अन्तराल यकीनन मुझे ऐसे किसी भी अहसास की अनुभूति से दो -चार होने से वंचित करता रहा, ठीक वैसे ही जैसे परिस्थितिया प्रतिकूल होने पर बर्फ से चमड़ी झुलस जाती है। पर निश्चित ही वही बर्फ, लू के मारे को जीवन का संचार भी करती है। पूर्व स्मृतिया प्रतिकूल परिस्थितियों में अक्सर एक अनंत कूप से पैदा हुई ध्वनियों की तरह हो जाती है, जिसकी सुर लय ताल करीब-करीब अनजानी सी प्रतीत होतीं है, एकदम अबूझ भी। इस अबूझ पहेली का अपना एक अलग संत्रास, एक अलग ही कस्ट है। हमे पता भी नही चलता और हमारे अन्तर की पीड़ा सघन और सघनतम होती जाती है। ऐसे ही पलों में अनजाने ही हमारा मस्तिस्क इस निष्कर्ष पर पहुच जाता है और अजाने ही स्वीकार भी लेता है की इन तमाम अन-अनुभूत परिस्थितियों और तमामो तमाम अबूझ पहेलियों का सर्जक वो स्वयम है । इस तरह की निष्कर्ष जनित खामोशी और अंतस में चलने वाला द्वंद आदमी को इतना तोड़ देता है की उन्हें दुश्मनों की जरुरत नही रह जाती।
पर अंधेरे की गहनता कितनी भी क्यो न हो, वो सुबह को नही रोक सकता। अवसाद और अंतर्द्वंद के इस लंबे चले अन्तराल ने मुझे ये समझाया की "अँधेरा कितना भी गहन क्यो न हो, रास्ता तो अपनी जगह मौजूद होता है, फर्क सिर्फ़ यही है, की सहज उजाले में वो सहज द्रिस्ट होता है, जबकि अंधेरे में वो हमें दिखाई नही देता" और दिखाई नही देने का आशय यह नही होता की रास्ता है ही नही, बल्कि धैर्य और ज्ञान (विवेक) का प्रकाश हमें गहन से गहन अंधियारे में भी पथ प्रर्दशित करता है।
...और उजाले में नो अपनी रह सभी पहचान लेते है, असली मजा तो अंधेरे में अपनी रह की पहचान से है। है न...!

Thursday, August 27, 2009

जिन्ना, वाक स्वतंत्रता और मेरा देश ! (२)

...गतांक से आगे;-
हम बेहद ईमानदारी से स्वीकार करे की हमारे राजनेता अपनी छुद्र कमजोरियों की वजह से एक ऐसे व्यक्ति से पराजित हुए जिसका मुख्य झुकाव धर्म में न होकर राजनीति में था, वास्तव में यह एक अत्यन्त ही जिद्दी व्यक्ति की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के आगे हमारे राजनेताओ का घुटना टेकना था। ये वास्तव अद्ध्ययन की विषय वस्तु है की आख़िर वो कौन सी मजबूरिया थी, जिनकी वजह से कांग्रेस के राजनेताओ ने जिन्नाह के अलग पाकिस्तान की मांग मन ली।

वरना महात्मा गाँधी देश के बटवारे के खिलाफ अडिग थे, और उनका वक्तव्य की "देश का बटवारा मेरी लाश पर ही हो सकता है" उनकी बटवारे पर पूरी तरह सार्वजनिक हो चुकी उक्ति थी, जिसपर न सिर्फ़ सिक्खों, मुस्लिम बहुल इलाको में रहने वाले हिन्दुओ, सिंधियों(जिसमे हिंदू मुस्लमान दोनों शामिल थे) और बलूचो का पुरा भरोसा था, शायद यही भरोसा उनकी बर्बादी का सबब भी बना, इस भरोसे में नार्थ वेस्ट फ्रंटियर की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल था । गाँधी तो बटवारे के इतने खिलाफ थे की उन्होंने जिन्ना को फटकारते हुए १५-सितम्बर-१९४४ को लिखा की; मेरी समझ में द्विरास्त्रवाद का सिद्धांत "पूरी तरह काल्पनिक है। मुझे इतिहास मे ऐसी कोई मिसाल नही मिलती की धर्म बदलने वालों और उनके वंशजों के किसी समूह ने अपने मूल स्रोत से अलग रास्ट्र होने का दवा किया हो। अगर इस्लाम के आने से पहले भारत एक रास्ट्र था तो अपनी बहुत सी संतानों के धर्म परिवर्तित कर लेने के बाद भी एक रास्ट्र ही रहना चाहिए"

और इसमे कोई शक नही की जिन्ना जिस शिखर को कभी नही पराजित कर पाते, और वक्ती राजनीती में अगर उनको हराने वाला कोई विरोधी था, तो वो सिर्फ़, सिर्फ़ और सिर्फ़ उनसे छः वर्ष बड़े और उन्ही की तरह काठीयावारी तथा उनकी मातृभाषा बोलने वाले बैरिस्टर "मोहनदास करमचंद गाँधी" थे। पर गाँधी से न जाने नियति ने, उनके करीबी राजनेताओ की छुद्र लिप्सा ने अथवा न जाने किसने ऐसा घटिया खेल खेला की व्यक्तिगत अहम् को संतुस्ट करने वाली राजनीती करने वाले और बेहद अधार्मिक नेता ने, जिसके ख़ुद उसके समुदाय के सिर्फ़ ५% लोगों ने उसे मत दिया और जिसने मुस्लिम लीग में एकदम अलग धलग पड़ जाने के बाद १९३० से १९३३ के दरमियाँ राजनीती से करीब करीब सन्यास लेकर लन्दन में पुनः वकालत शुरू कर दी थी , वह १९४७ के उतरार्ध में कायद-ऐ-आज़म की जय के नारे सुन रहा था और आजीवन सामाजिक उद्देश्यों के लिए समर्पित, सत्य और अहिंसा के पक्षधर, दुनिया भर के निर्बल असहाय की करुना से द्रवित हो उठने वाले, अपने प्रति वैर भाव रखने वालों से भी समभाव रखने वाले गाँधी आजाद हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में "गाँधी को मर जाने दो" के नारे सुन रहे थे।
और नियति का मजाक देखिये की बटवारे को स्वीकार करने वाले नेहरू "स्वप्नदर्शी प्रधानमंत्री " और वल्लभ भाई पटेल "लौह गृहमंत्री " की उपधियो से नवाजे गए, जबकि बटवारे का दारुण आरोप उसे कभी भी न स्वीकार करने और अंततः एक भारत के रूप में देश को आजाद करवाने का दम रखने वाले "महात्मा" गाँधी के हिस्से में गया।
(क्रमशः...)

Wednesday, August 26, 2009

जिन्ना, वाक स्वतंत्रता और मेरा देश ! (१)

इस देश के, एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर, यकीनन ये कल्पना कठिन है , कि इस राष्ट्र के एक स्वतंत्र नागरिक होने के बाद भी मेरी अभिव्यक्ति की मुझे गंभीर कीमत चुकानी पड़ेगी । एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र के नागरिक होने के नाते , और खासकर ऐसे देश के नागरिक होने के नाते जो मानव के बुनियादी अधिकार का हिमायती होने का दम भरता हो, यकीं करे आज के वातावरण से मुझे गहन निराशा है ।
यहाँ मेरा आशय जसवंत सिंह की न तो हिमायत करना है न ही किसी व्यक्ति विशेष पर दोषारोपण करना और न ही किसी को दूध का धुला साबित करना । पर मैं सचमुच ही सहमा हुआ हू । मैं सहमा हू अपने मुल्क के चरित्र को बदलते देख कर, मैं सहमा हू अपने देश के नुमाइन्दों के आचरण को देख कर और साथ ही निहायत ही निराश हू अपने पत्रकारिता जगत के साथियों की मक्कारी पूर्ण खामोशी से भी।
क्या हममें इतना धैर्य नही की हम किसी तत्थ्य का विवेक पूर्ण तरीके से विवेचन करे । आख़िर एक कांग्रेसी होते हुए हम ये क्यो नही स्वीकार पाते, की इस देश में परिवारवाद और तरफदारी को सावर्जनिक जीवन में जगह दिलाने का महान कार्य "नेहरू-गाँधी" परिवार की देन है और यह परिवार परिवारवाद में न सिर्फ़ आजादी के बाद बल्कि आजादी के पूर्व से ही लगा रहा , स्वर्गीय मोतीलाल नेहरू वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महात्मा गाँधी को पत्र लिख कर जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस पार्टी का अद्धय्क्ष बनानेकी सिफारिश की । एक काग्रेसी होते हुए हम ये कभी नही स्वीकार पाते की यह नेहरू-गाँधी परिवार ही है जिसने महात्मा गाँधी की विरासत को सबसे जादा नुकसान पहुचाया । और सबसे बड़ी बात "पाकिस्तान का बनना कायद-ऐ-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना की विजय नही, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल की सबसे बड़ी पराजय थी" दो व्यक्तियों की ऐसी पराजय, जिसकी कीमत दोनों तरफ़ (अब तीन तरफ़) के करोरो लोगो के विस्थापन, लाखो लोगों की मौत, न जाने कितनी हजारों हजार औरतों और बच्चियों की आबरू और खरबों की संपत्ति के नुकसान के साथ ही अलगाव के कभी न मिटने वाले दंश के रूप में चुकानी पड़ी ।
एक जिम्मेदार देश के जिम्मेदार नागरिक के तौर पर ये हमारा दायित्वा है की एक देश के तौर पर हम आत्मविश्लेषण करे और सच को, बेशक वो कितना भी करवा क्यो न हो स्वीकार करे , ये जरुरी है की हम तत्थ्यो से आँखे न मूंदे रख कर अपने आने वाली पीढी को दिग्भ्रमित न होने दे और अपने कर्तव्यो का समुचित तरीके से निर्वहन करे ।
हम ये स्वीकारे की जब देश बटवारे की आग में झुलश रहा था, तो नेहरू एडविना माउन्टबेटेन की सोहबत में आत्मा की शान्ति तलाश रहे थे। हम बेहद ईमानदारी से स्वीकारे की हमारे राजनेता अपनी छुद्र कमजोरियों की वजह से एक ऐसे व्यक्ति से पराजित हुए जिसका मुख्य झुकाव धर्म में न होकर राजनीती में था। (क्रमशः...)