Monday, July 7, 2014

गुन-गुन गीत

                                                             _____________
बरसो पहले, अपने ग्रेजुएशन के दौरान, शाम को ट्यूशन पढ़ाने निकलता और रात दस बजे तक ट्यूशन ख़तम करके लौटते वक्त, गोरखपुर के रेती रोड पर एक अपाहिज भिखारी को देखता था | दुकानों के सामने, फूटपाथ पर वह अपने चीथड़ो में समाये, बगल में खडी अपनी व्हील चेयर से ख़ुद को टिकाये और प्लास्टिक की पन्नियो और कचरे का अलाव जला, उसकी गरमी के सहारे, रात गुजारने की जुगत में लगा रहता था | गर्मियों में तो अक्सर, और जाड़ों में कभी-कभी हमारी आँखे आपस में मिलती, उसकी आँखे काफ़ी बड़ी और गोल थी, एक अज़ब सी कशिश भी थी उन आँखों में और वो जीवन से भरपूर थी ! मै उसे देखता और वह मुझे और एक बड़ी सी मुस्कराहट वह मेरे लिए देता, जबाब में मै भी मुस्कुरा देता |

इस स्मृति के अवांतर, एक अन्य स्मृति है, जो सन दो हजार दो (या फिर सन चौरानबे भी हो सकता है ) की सर्दियों से जुडी है | बेतियाहाता से गोलघर आते, बीते पाच-सात दिन से एक किशोर को, लाल बहादुर शास्त्री चौराहे पर, सेंट एंड्रूज कालेज के गिरिजाघर वाली पटरी पर पड़े देख रहा था, उसका पैर घायल था और वह पटरी पर घायल पड़ा हुआ था, उसके सामने चुक्कड़ में चाय या पानी पड़ी रहती, शरीर पर मक्खियाँ भिनभिनाती रहती और लोगो की इकट्ठी की लकड़ियों का अलाव जलता रहता, पर यह बस पांच छः दिन से ही था, उसके पहले उसे वहां मैंने कभी नहीं देखा था | पच्चीस दिसम्बर की रात, जब सेंट एंड्रूज गिरिजाघर में क्रिसमस कार्निवाल हो रहा था, सेंटा क्लाज बच्चो को उपहार बाँट रहे थे, बाहर पड़ रही कड़कती ठण्ड में, वह आदमी उस कार्निवाल के शोर-शराबे को सुनता, हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया | छब्बीस दिसंबर की सुबह, जब कि उधर से मै गुजरा, ठण्ड से अकड़ी उसकी लाश उस पटरी पर पड़ी थी | उसने कोई क्रिसमस गीत नहीं गाया था, उसके होठ अकड़े थे |

अब चले जीवन से भरी मुस्कराहट वाले भिखारी की तरफ, तो सर्दिया काफ़ी पड़ रही थी और ऱोज रात लौटते उसका ठिठुरता शरीर मुझे परेशान करता, मेरी खुद की आर्थिक स्थिति बढ़िया नहीं थी, अपनी पढाई ट्यूशन के जरिये कर रहा था और खर्चे मुश्किल से पूरे पड़ते थे | एक शाम मुझसे रहा नहीं गया और मै उर्दू बाजार की एक दूकान में घुस गया, सबसे सस्ता कम्बल अस्सी रूपये का था, एक बण्डल कम्बलों का ऐसा था, जिसे चूहों ने किनारे कुतर दिया था, थोडा किनारे कुतरा कम्बल दूकानदार चालिस रूपये में देने को तैयार हो गया, यह दूकानदार के लिए राहत की बात थी कि जिस माल से उसे कुछ नहीं मिलना था, उससे उसे कुछ मिल गया, पर मेरे लिए बहुत बड़ी राहत की बात थी |

उस शाम, उस कम्बल को साथ लिए मै ट्यूशन पढ़ाने गया और जानबूझ कर लौटते हुए, मैंने ग्यारह से जादा बजा दिए, सड़क एकदम ख़ामोश थी, धुंध अपनी चादर फैलाये हुए थी और स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी, ठण्ड को और ठंडा बना रही थी | भिखारी अपने सामने अलाव जलाये अपनी गुदडी में समाया सिमटा सा सो रहा था, मैंने पहले कम्बल उसके पहलू में सटा कर रखा, पर तेज पड़ रहे पाले ने मुझे रोक दिया, मैंने ख़ामोशी से कम्बल खोला, उसे उढ़ा दिया |

अगली रात मै लौट रहा था, सड़क खाली थी, मै अपनी जेबों में हाथ डाले लौट रहा था, हमारी आँखे मिली, उसकी आँखों में हमेशा की तरह बड़ी मुस्कराहट थी, हमारे बीच कभी कोई मौखिक-संवाद नहीं हुआ था पर उस रात जैसे ही मैंने उसकी ओर देखा, उसने कहा "रात नींद बहुत अच्छी आई, कोई ये कम्बल दे गया" |

...मुझे यह एक गुनगुन गीत सा लगा !

जब भी ठण्ड आती है, मुझे यह गुनगुन गीत याद आता है और अवांतर स्मृति उन मृत होठो की आती है |
_______________
कश्यप किशोर मिश्र

No comments:

Post a Comment