Thursday, September 24, 2015

माँ ! काली

मंदिर के बाहर बरगद के तले बने पक्के किनारे पर पता नहीं कहाँ से भटकती एक बावली औरत ने अपना डेरा डाल रखा था.
आते जाते लोग उसे घूरते, वह युवा थी और अक्सर उसे अपनें कपड़ो का होश नहीं रहता.
सुबह का वक्त था, एक युवा लड़की टहलने निकली थी, मंदिर के ठीक सामने उसके बगल से गुजर रहे एक वाहन में उसका कुर्ता फँस गया और चर्रर की आवाज के साथ फटा हुआ कुर्ता वाहन के साथ फँसा निकल गया.
हठात लड़की लज्जा के मारे किंकर्तव्यविमूढ़ सन्न रह गई.
बावली औरत ने यह देखा, उसने बस साड़ी पहन रखी थी और उसनें अपनी साड़ी उतार झट लड़की को ढ़क दिया.
एक लड़की की लज्जा की फिक्रमंद बावली खुद पूर्णतया नग्न थी.
सामने से पूजा की थाली सजाए गुजर रहीं चार-पाँच औरतों नें बावली को देखा और उस पर हँसती मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़नें लगी.
मंदिर के पुजारी की आँखों के सामने यह वाकया गुजरा, वह पूजा को जा रहा था ...
उसके समक्ष काली कलूटी बावली अपने बिखरे बाल लिए निरावृत खड़ी थी.
पूजारी एकटक अपलक बावली को देखे जा रहा था और सहसा उसके मुँह से निकला "ओ माँ !"
पुजारी मंदिर की सीढ़ियाँ उतर बावली की तरफ बढ़ चला.
ऊपर मंदिर में पुजारी को ढ़ूढ़ती औरतों ने सहसा देखा पुजारी बावली के चरणों पे दंडवत पड़ा हुआ है उसके होठों से अस्फुट मंत्र उच्चारित थे "जयंती काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा"

कश्यप किशोर मिश्र (आदमीयत की आखिरी किताब)

प्रकाशन का लिंक :- माँ काली

Wednesday, September 23, 2015

औरत

इन औरतों के हाथ पत्थरों से कठोर और खुरदुरे थे, तीखी तेज खूली धूप में काम करते-करते इन औरतों की चमड़ी जल कर आबनूस सी काली हो चुकी थी, जिससे चमकती आँखें बड़ी विद्रूप लगती थी.
मोटे मोटे होंठों की चमड़ी मोटी और जहाँ तहाँ से फटे हुए थे, सर के बाल रूखे और एड़ियाँ दरारो से भरी थी.
दरवेश ने दुनिया घूमी थी, औरतों से जुड़ी कोई भी एक विशेषता इस बस्ती की मजदूर औरतों में उसे नहीं दिखाई दीं, इन औरतों को देखते सोचते उसकी आँख लग गई.
गहरी नींद में सो रहे दरवेश ने अपनें परिवेश में किसी औरत के होने के एक बेहद मजबूत अहसास को महसूस किया और हड़बड़ा कर उठ बैठा. पसीने से तर-बतर एक मजदूर औरत दरवेश के बगल में बैठकर सुस्ता रही थी, उसकी पसीने की गंध दुनिया की पहली औरत सी थी.
उसके शरीर से उठ रही गंध में सातों देवियों की गंध समाई थी, दरवेश का मन आशनाँ हो उठा, उसनें कायनात से मन ही मन शुक्रिया कहा और सजदे में झुक गया.
कश्यप किशोर मिश्र
(एक हर्फ आदमी से )
प्रकाशन का लिंक : औरत ; (एक हर्फ़ आदमी )

Wednesday, May 6, 2015

इस हार में ही जीत है


(माँ की डायरी)

तीस जूनदो हजार तेरह ;-
आज एक विज्ञापन देखाजिसके शब्द थे "दुनिया को जीतने के लिएजरुरी हैमेरा बेटा पहले मुझे हराएमै खुद नहीं हारुगीबल्कि वो मुझे हरायेगा और जिस दिन वो मुझे हरायेगा दुनिया जीतने की उसकी शुरुआत होगी !!!"
तीस जूनदो हजार तेईस ;-
दस बरस पहले देखे एक विज्ञापन से प्रेरित होअपने आठ बरस के बच्चे के साथ मै रोज दौड़ लगाती रहीआज भी उसके साथ दौड़ती हूँउसे मै दुनिया का सबसे तेज धावक बनाने चली थीऔर मैंने तय किया थाजीतने के लिए उसे मुझे हराना पड़ेगादस बरस बीत गएउसने आज तक मुझे हराया नहींऔर खुद मै हारूंगी नहींपर आज वो दुनिया का सबसे तेज धावक है !!!
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(बेटे की डायरी )तीस जूनदो हजार तेरह ;-
आज मम्मा ने मेरे साथ रेस कीशुरू में वो खूब तेज दौड़ी पर आधी दूरी के बाद वो हाफ़ने लगीसो मैंने अपनी गति धीमी कर लीमम्मा मुझे दुनिया का सबसे तेज रेसर बनाना चाहती हैसो रेस के बाद उन्होंने मुझे बहुत प्यार किया और समझाया कि सबसे तेज दौड़ने के लिए लोगों को हराना पड़ता है और इसकी शुरुआत जो साथ दौड़ते है,उन्ही से होती हैजानता तो ये मै भी हूँ पर मम्मा ने कहे इसलिए इसे अपने पढने की मेज के सामने मैंने लिख के टांग दिया |
तीस जूनदो हजार तेईस ;-
आज मै दुनिया का सबसे तेज धावक हूँ और हर दिन जब घर होता हूँमाँ मेरे साथ दौड़ती हैमै आज भी उनसे रोज हारता हूँक्योकि मुझे पता हैजिस दिन मैंने अपनी माँ को हरा दियाउस दिन मै सबकुछ हार जाउगा...और मुझे जीवन भर बस जीतना हैलिहाजा ज़रूरी हैजीवन भर मै अपनी माँ से हारता रहू !


प्रकाशन का लिंक इस हार में ही जीत है

Sunday, March 8, 2015

दुनियाँ तुमपे हँसे तो तुम भी हँसो

 


दुनियां डरपोकों से भरी है, जिनमे डर के पार जाने का साहस नहीं होता, वे अपनी लीक पर जीते जाते है| पर कुछ अपने डर से पार उतरना, सपने देखना, और कोशिश करना जानते है| दुनियाँ के लिए यह हजम करनी कठिन है, कठिन है, अपने डरपोक होने को स्वीकार करना| तो लोग कोशिश करने वालों का मज़ाक उड़ाते है| लिहाजा अपने भय के साथ-साथ दुनियां की हँसी के पार उतर जाना, सफलता पाने कि पहली शर्त है |

तैमूर, एक गड़ेरिया, राजा बनने की बात करता ! लोग ठहाके लगाते उसका मजाक उड़ाते, कभी हुई एक झड़प में तैमूर के पैरों पर लगे तीर ने उसे लंगड़ा कर दिया, लोग मजाक में उसे “लंग” कहते, दुबले, सामान्य काठी के तैमूरलंग के शरीर का दायाँ हिस्सा विकलांग था, पर तब भी तैमूरलंग हिन्दुस्तान के साथ-साथ पश्चिम और मध्य एशिया के एक विशाल साम्राज्य का मालिक बना |

स्वामी विवेकानंद जिनकी वक्तृत्व शैली पर समूचा अमरीका मुग्ध था, यह हमेशा नहीं था, स्वामी विवेकानंद जब शुरू शुरू में अमरीका गए तो लोगों ने उनके पहनावे और जीवन शैली का खूब मजाक उड़ाया, कई जगह उनके वक्तव्य के दौरान उनपे असभ्य टिप्पड़िया भी कि गई, पर इन सारी बातों से स्वामीजी तनिक भी विचलित नहीं हुए, अपने धैर्य कि बदौलत स्वामी विवेकानंद ने अंततः समूचे अमरीका को अपना प्रशंसक बना लिया, जो लोग कभी स्वामी विवेकानंद का मजाक उड़ाते नहीं थकते थे, वे स्वामी विवेकानंद का गुणगान करते नहीं थकते थे |


जर्मनी के वान ने काठ की साइकिल “रनिग मशीन” बनाई तो लोग उसपे खूब हसें थे, जेम्स वाट के भाप-इंजन पर लोग उसे पागल कहने लगे, आइन्स्टीन को करीबी रिश्तेदार तक “भुलक्कड़ और मूर्ख” कहते थे, पर ये सब आज एक सम्मानित नाम है| इनकी नज़र दुनियां कि हँसी पर नहीं, अपने लक्ष्य पर थी |

बेहद निर्धन फ्रेंकलिन, सत्रह भाई-बहन थे, महज दस वर्ष की उम्र में काम कि तलाश में घर त्याग फिलाडेल्फिया चले आये, भूख से व्याकुल फ्रेंकलिन नें तीन रोटियाँ खरीदी, दो बगलों में दाबी और एक खाते, चिथड़े कपड़ों में सड़क पे चले जा रहे थे, एक अमीर की बेटी “देबोरा रीड” ने यह देखा, फटेहाल गवांर फूहड़ लड़के पर वह खिलखिला कर हँस पड़ी, खुद का मजाक देखना फ्रेंकलिन के लिए नई बात नहीं थी, ऐसी बातों से वह निराश नहीं हुए|

उन्होंने कड़ी मेहनत की, लोहे पीटे, बर्तन बनाये, बेकरी पर काम किया, जूते गांठे, लोगों के कपडे धोये और अपना छापाखाना लगाया | अखबार निकाला, किताबे छापी, संगीत कि धुनें बनाई, शिक्षा संस्थान खोले, आविष्कार किये और अमरीका की स्वतंत्रता कि लड़ाई लड़ अमरीका को मुक्त किया, उन्हें “पहला अमरीकन” भी कहते हैं | जो अनिंध सुंदरी “देबोरा रीड” बेंजामिन पर हँसी थी, उसने इस घटना के सात वर्ष बाद बेंजामिन फ्रेंकलिन से स्वयं शादी का प्रस्ताव किया |

कस्बे से लगा, साधकों का आश्रम था, सब एक से लगते| एक दिन कस्बे के बच्चों में सहज जिज्ञासा उठी, कैसे पता चले इनमें सबसे ज्ञानी कौन है ? एक बूढ़े ने बच्चों से कहा यह जानने का सबसे आसान तरीका साधकों का मजाक उड़ाना है, अतः अगले दिन से बच्चे साधको को देखते ही उनपे हँसने लगते|

बच्चों की मजाकिया हँसी कुछ साधकों को नागवार लगती, कुछ साधक निरपेक्ष रहते, कुछ बच्चों को भगाते, एकाध मुस्कुरा भी देते पर एक साधक बच्चों के मजाक पर उनके साथ ठहाके लगाने लगा, अब बच्चे उसके साथ वाकई ठहाका लगा लगा कर हँसने लगे | कस्बे को सबसे ज्ञानी साधक का पता चल चुका था |
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कश्यप किशोर मिश्र

दैनिक भास्कर- रसरंग में प्रकाशन का लिंक :- दुनियाँ तुम पे हँसे तो तुम भी हँसो