Sunday, December 14, 2014

घर ख़ुद बुला लेता है...



प्रकाशन लिंक ;-  घर ख़ुद बुला लेता है

दुःख तो दुःख होता है


आज के तेज रफ़्तार समय में, एक जान पर वक़्त देना फिजूल लगता है, यह बात एक बैंकर को भी फिजूल ही लगी थी, जब काम से वापिस लौटते मोहल्ले के चौराहे पर जमा भीड़ ने उसकी कार रोक मदद की गुहार लगाईं, किसी लड़के को सड़क-दुर्घटना में चोट आई थी और उसे अस्पताल ले जाना था, पर वह बहाना बना आगे बढ़ लिया, उसने मन ही मन सोचा रोज ही का किस्सा बन गया है, यह सब पर दुर्भाग्य से जिस लड़के के साथ यह दुर्घटना हुई थी, वह उसकी ही इकलौती संतान था, जिसकी समय से अस्पताल न पहुच पाने की वजह से मौत हो गई | रोजमर्रा की, सड़को पर होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं, जिन्हें वह देखा-अनदेखा किया करता था, उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी | 
  
आज के समाज का तानाबाना न्यूनतम संसाधन से अधिकतम लाभ अर्जित करने की आर्थिक सोच से इतना अधिक प्रभावित है, कि जीवन का मूल्य भी इकाई दहाई सैकड़े की गिनती से तय होने लगा है, ऐसे में किसी एक अकेले आदमी की जरूरते, ख़ुशी दुःख परेशानिया बहुतों की जरूरतों खुशियों दुःख और परेशानियों के सापेक्ष गौण हो जाती हैं, पर इससे उस अकेले आदमी की पीड़ा परेशानी या ज़रूरत महत्वहीन नहीं हो जाती |

भूख सौ लोगों की मिटे या एक आदमी की पर जिसे भोजन मिला उसके लिए यह बड़ी बात होती है, मौत एक आदमी की हो, या सौ आदमियों की, पर जो मर गया, उसके लिए सबकुछ ख़तम हो जाता है| यह बात मानवीय समझ का सहज हिस्सा है, पर परपीड़ा का आकलन जब संख्या के हिसाब से किया जाने लगे तो इसका आशय यह निकलता है, कि समाज से रफूगर कम हो रहे है | छोटी-छोटी घटनाओं, एक अकेले आदमी की पीड़ा, उसकी टूटन की रफू कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की रफूगरी, हमारा समाज भूलता जा रहा है |

आज के दौर में, हम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार करते है, हमारी प्रतिक्रिता किसी बड़ी घटना पर होती है, हमारी संवेदना किसी बड़ी घटना पर जाग्रत होती है | भयानक बाढ़ में पांच सौ लोगों की मौत से हम करुणा से भर उठते है, अपने वेतन से कटा कर पैसा भी भेजते हैं जबकि पड़ोस में सड़क की पटरी पर ठण्ड से मर गए भिखारी पर हमारी करुणा नहीं जगती, हांलाकि बस एक कंबल उसकी जान बचा सकता था | व्यक्तिगत पीड़ा और सुख दुःख की सहज समझ बच्चो में मौजूद है, पर आदमी अपनी समझदारी में इस सहज समझ को भूलता जा रहा है|

वैसे ही जैसे, उतर चुके ज्वार के बाद समंदर की रेत पर फंसी तड़फड़ा रहीं खूब सारी मछलियों के बीच, एक छोटा बच्चा एक-एक मछली उठाता और पानी में फेंकता जा रहा था | एक आदमी ने बच्चे को टोका, यहाँ हजारो मछलियाँ मर रही है, उनमें से पचास सौ को बचा लेने से क्या होगा बच्चे ने हाथ में पकड़ी तड़फड़ा रहीं मछली को देखते हुए कहा कम से कम यह मछली जिन्दा रहेगी और इस मछली के लिए यह बहुत बड़ी बात है|  

इस आलेख का प्रकाशित लिंक ;- दुःख तो दुःख होता है
भास्कर रसरंग का पृष्ठ लिंक ;- भास्कर रसरंग 14-दिसंबर-2014, पृष्ठ 2 एवं 3

Wednesday, December 3, 2014

उस बाज़ार की औरतें

दर्द से टूटती देह,
पीड़ा से चमकती कमर के साथ,
इन औरतों की सुबह वैसी ही होती है,
जैसे प्याली की तलछट में छूटी चाय,
बेशक कितनी भी स्वादिष्ट थी,
पर जूठी प्यालियो से छलकती,
बस ऊबकाई आती है !
उस बाजार की औरतें,
चढ़ती शाम के साथ,
गर्म-गर्म भाप उठती चाय हैं, बबुआ !
पर रात-उतरते,
बेस्वाद बदबूदार तलछट में पड़ी
ऊबकाई दिलाती,
बची जूठन हो जाती हैं |
प्यालियाँ अभी भी वही की वही हैं |

तो जब इन जूठन को देख आपको ऊबकाई आ रही होती है,
तब कराहती हुई,
किरचों-किरचों में बिखरी
अपनी शख्शियत को समेटती,
उस बाजार की औरते उठती है,
उन्हें अपने सामने पसरे,
एक उदास और उजाड़ दिन का विस्तार लांघना है |
ख़ुद को टाँकती, अपनी उधड़ी सिलाई की तुरपन करते,
अलग-अलग कोनों में पड़ी पुतलियों से,
अलग-अलग रिश्तो के कंगन पहन,
वो बन जाती हैं, अम्मा, भाभी, दीदी, मामी, ताई !
ये रिश्ते
बेटियाँ वाले रिश्ते दफ्न,होने के बाद ही बने थे |
अब इन औरतों को चलानी हैंघर-गृहस्थी
करना है सौदा-सुलफ़,
पकाना है, खाना-खिलाना है,
पूरे का पूरा एक दिन, दोपहर भर में निपटाना है,
गो कि, शाम के पहले, धुल-पूछ
भाप उठती गर्म चाय की प्याली बन जाना है |
वो सोचती है, यह सब,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

तो वो जल्दी-जल्दी खरीदती है,
तेल-चावल-मसाला किराने से|
उसे जल्दी है और लाला वक़्त रोकने  को आतुर है,
उसे पड़ी है जल्दी से किराने की
उसकी निगाहों में है,
तेल का नपना, तराजू की डंडी |
इधर लाला की निगाहें उस पे धसी जा रही है,
वह झिकती है, सामान तौलों लाला- समय की तंगी है
लाला की निगाह और धस जाती है,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

सब्जी खरीदते,
सब्जी वाला उसे अर्थाते
घटिया मजाक करते जाता है,
उसका जी करता है, एक चमाट रख दे,
सब्जीवाले के गाल पर |
पर आखिरकार उसे चुप रह्जाना सही लगता है
अन्दर की पीड़ा से एकबार फिर,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

अब, वह मछली खरीद रही है
मछली वाला कह रहा है, पैसे की क्या बात है,
पूरी मछली ले जाए, खुश हो जाए !
बस उसे खुश कर जाए |
वो कहना चाहती है, 
जा अपनी बेटी को खुश कर
पर बेटी शब्द उसके कलेजे में फंसते हैं,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

जैसे-तैसे पूरे करती है, घर के काम धंधे,
हलक के नीचे, जल्दी-जल्दी उतार रही है कुछ कौर,
अभी भूख पेट में बाकी है,
वह पेट भर लेना चाहती है,
सब इस पेट का किया-कराया है |
कि आहट होती है,
साथ की सहेली बताती है, उसका गाहक है,
कुछ और निवाले उतार लेना चाहती है,
पर मजबूरी में उठती है,
गाहक को देख मुस्काती है,
ढक कर छोड़ आई थाली की ललक उठती है,
और वह,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे |

बबुआ !
उस बाजार की औरते,
बड़ी फ़रेबी है,
आँखों ही आँखों में जाल बुनती है,
होठो ही होठो में करती हैं, भेदिया इशारे,
उनके इशारों के ज़ाल गहरे है,
कसमसा कर काटती है वह अपने होठो के किनारे|
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कश्यप किशोर मिश्र 

Sunday, October 19, 2014

अपने अपने राम-अपने अपने दीप























अज्ञान के अंधकार सी सघन, अमावस की गहन काली रात, कार्तिक माह में रूपवती नारी सी दिखती है, ढलती शाम के साथ-साथ एक एक दीप जलते हैं और अमावस दीपावली में बदल जाती है | साल की सबसे काली रात, साल की सबसे सुन्दर प्रकाशपूर्ण-पर्व बन जाती है, दुनिया भर के मिथकों और परम्पराओं से इतर यह मनुष्य के सामूहिक प्रयास से गहन से गहन अन्धकार पर विजय प्राप्त कर उसे प्रकाशोत्सव में तब्दील करने के विजयघोष की रात होती है |

एक प्रतीक के तौर पर दीपावली एक पर्व उत्सव या त्यौहार की बजाय मनुष्य की सामुदायिकता और निरंतरता के जरिये असंभव को संभव बना देने का प्रतीक है, एक ऐसा प्रतीक जिसमे समाज के हर एक प्रत्येक इकाई का योगदान होना है, यह योगदान एक दीपक का भी हो सकता है और जगमग दीपों की तमाम श्रृखला का भी, पर जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि मनुष्य का सामूहिक प्रयत्न प्रकृति के अत्यंत निष्ठुर स्वरुप को भी कोमल सुन्दर भाव में बदल देने में सक्षम है |

दीपावली का दीप गहन काले अन्धकार में तमसो माऽ ज्योतिर्गमय का प्रतीक है, यह प्रतीक है ज्ञान के आलोक की | जिस आलोक से प्रदीप्त राम काले होते हुए भी काले न दीख, भक्ति और ज्ञान की गहन नील गहराई की आभा से युक्त नीलाभ दिखते है | राम प्रतीक है, आदमीयत के | राम प्रतीक है, मनुष्यता के उन भावों के जिनके न रहने से गौरवर्णा तमामो तमाम विधाओ का ज्ञाता महान पराक्रमी और महान ज्ञानी ऋषि विश्वेश्रवा का पुत्र दशानन, रुक्ष राक्षस रावण बन जाता है |
राम प्रेम करना जानते हैं, विरह-व्याकुल हो सकते है, भाई के घायल होने पर आर्तनाद कर सकते है, पिता की मृत्यु सुन अशांत हो सकते है | राम कोमल है, कोमलता से अपनी पत्नी का श्रृगार कर सकते है, पर्ण कुटीर बना सकते है, सबरी के जूठे बेर खा सकते है, केवट के प्रेम को समझ उसका आलिंगन कर सकते है | राम सतत चिरंतन चलते रहने वाले, ज्ञान-पथ के पथिक हैं, सीखते जाते हैं | राम को पता हैं, रणभूमि में आसन्न मृत्यु के करीब पड़ा रावण, महान पंडित है लिहाजा क्षत्रिय-राम क्षात्र-राम बन लक्ष्मण को रावण के पास भेज सकते है | दीपावली राम के उस सहज मनुष्य रूप की स्मृति का पर्व है | मनुष्य के निरंतर सीखते-सुधार करते, ज्ञान के पथ पे चलते जाने का पर्व है | एक मनुष्य के मनुष्यता की मर्यादानुकूल आचरण करते हुए उत्तमोत्तम होते जाने की प्रक्रिया की सामाजिक वैद्यता का पर्व है |

रावण महान पंडित है, पर सत्य सुनने का उसे साहस नहीं, वह गर्वोन्मत्त है, मनुष्य को अत्यंत तुच्छ समझता है, विरोध की सिमित संभावना पर भी किसी को बंदी बना सकता है, सहज ही वध करना उसका स्वभाव है, नारी उसके लिए वस्तु है, रिश्ते-नाते युद्ध के पांसे| रावण परम प्रतापी है, महान पंडित है पर वह क्षात्र-रावण से पूर्णत: क्षत्रिय-रावण में बदल गया है| रावण रुक गया है, वह ज्ञान की राह का पथिक नहीं रहा, उसे ख़ुद पर अभिमान हो चुका है | दीपावली उत्तमोत्तम-पुरुष रावण के क्षात्र-भाव को त्याग क्षत्र-गर्व में उन्मत्त राक्षस हो जाने का चेत-पर्व है | जन्मना श्रेष्ठ रावण पर कर्मणा श्रेष्ठ राम के अभ्युदय की प्रक्रिया के सामाजिक वैद्यता का पर्व है |

दीपावली एक व्यक्ति के लिए सामाजिक सरोकारों के प्रति व्यक्तिगत जबाबदेही और जुडाव का भी पर्व है | यह पर्व है, चिरंतन भाव का | राम आ रहे हैं, सभी राम के आने की राह देखते साफ़-सफाई में लगे दीप जलाने की तैयारियों में हैं |
राम के आने की दिशा के एकदम विपरीत, सूदूर सरयू-तट पर एक बूढे मल्लाह ने घाट की सफाई की, बाती बनाई, मृदु-मिट्टी के दीप बनाये और उन्हें जला दिया |
कोई पथिक पूछ बैठा यह तो राम के आने का रास्ता नहीं मल्लाह ने कहा मेरे राम के आने का रास्ता मेरे ह्रदय से होकर गुजरता है |


दीपावली अपने अपने राम-अपने अपने दीप के भाव का पर्व है |   

प्रकाशित लेख का PDF लिंक ;- अपने अपने राम अपने अपने दीप

प्रकाशित लेख का लिंक :- अपने अपने राम अपने अपने दीप

Sunday, July 20, 2014

हर दिल अजीज़ "अज़ीम प्रेमजी "



अजीम हाशिम प्रेमजी का जन्म 24-जुलाई-1945 को बम्बई में हुआ था, विप्रो कारपोरेशन के अध्यक्ष अज़ीम भारतीय कार्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े दानकर्ता हैं, अबतक वो अपनी एक चौथाई से जादा संपत्ति दान कर चुके हैं    
स्टेनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग स्नातक कर रहे 21 साल के युवा अजीम प्रेमजी की पढ़ाई अभी बाकी थी, जब नियति ने उनकी सहज जीवन की राह बंद कर दी, पिता की मौत के साथ अज़ीम के पास विकल्प सिमित थे | पढ़ाई पूरी न कर पाने की कसक के साथ युवा अजीम ने अमरीका से वतन वापसी की और वनस्पति तेल के अपने पारिवारिक व्यवसाय की बागडोर थाम ली| 1966 में अजीम ने जब अपने व्यवसाय की बागडोर थामी तो उसका सालाना व्यवसाय 2 मिलियन डालर था, अजीम चाहते तो बड़ी आसानी से अपने व्यवसाय को दुनियादारी से चला सकते थे, पर प्रेमजी को आरामतलबी और समझौतापरस्ती स्वीकार नहीं थी|
भारत उस वक्त कोटे परमिट राज में था, जहाँ पामोलिन आयल जैसी आम जरूरत की वस्तु का कोटा भी देखते देखते आदमी को धनवान बना सकता था, पर अज़ीम प्रेमजी ने अलग राह चुनी, नौकरशाहों की खुशामद करने की बजाय अपने धंधे के गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित किया | उस वक़्त अचरज की बात थी, कि  इस स्तर पर कोई व्यवसायी नौकरशाही को खुश कर परमिट या लाइसेंस में अपना वक़्त जाया करने की बजाय, सीधे सीधे अपने ग्राहकों को उनकी अपेक्षा से भी बेहतर माल देने, ग्राहक और उत्पादक के बीच कम से कम बिचौलियों के जरिये, सबको जादा मुनाफा के सिधांत के साथ बाजार में उतर रहा हो|
पर अजीम को यहीं नहीं रुकना था, उन्होंने अपने व्यापार का प्रबंधन पूरीतरह पेशेवर रवैये से किया और देश के सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन और इंजीनिरिंग स्नातको को नौकरी पर रखा| आज भी जब भारत के तमाम कार्पोरेट घराने पारिवारिक प्रबंधन से संचालित होते हैं, तो सत्तर के दशक के भारत में यह बहुत बड़ी बात थी, जिसके साथ बहुत बड़ा जोखिम भी जुड़ा था, पर अजीम तो सबकुछ सिर्फ और सिर्फ उत्कृष्ट चाहते थे, अपने भावों को शब्द देते उन्होंने कहा भी उत्कृष्टता सिर्फ दिमाग से नहीं, बल्कि दिल और आत्मा से भी सोचो तब आती है
अजीम के लिए व्यवसाय दिमाग से नहीं दिल और आत्मा से होता था, जहाँ कठिनाइयों नजर नहीं आती नज़रों में बस अपने आदर्स बसे होते है, यही वजह थी कि 1979 में जब कंपूटर मशीन की दिग्गज कंपनी आईबीएम् को भारत छोड़ना पड़ा तो उससे उपजे शून्य को भरने के लिए अजीम की विप्रो कारपोरेशन ने वनस्पति तेल के धंधे से कंपूटर निर्मार्ण में छलांग लगा दी | अजीम का यह निर्णय इतनी बड़ी बात था कि भारत में विप्रो कारपोरेशन के विकास की कहानी कंपूटर उद्योग के विकास की कहानी है |
दो मिलियन डालर के सालाना धंधे से शुरुआत करते हुए आज अजीम की कंपनी का व्यवसाय 8 बिलियन डालर सालाना का है, पर आज भी अज़ीम और उनकी कसक जस की तस है, बेशक अजीम अपनी पढाई अधूरी छोड़ने को मजबूर हुए पर 2 मिलियन की हजार गुनी रकम अर्थात 2 बिलियन डालर की रकम अज़ीम प्रेमजी ने बच्चो की पढ़ाई से जुड़े कार्यो के लिए 2010 में दान की, अज़ीम प्रेमजी की कसक अभी बाकी है, उनकी जिंदगी लम्बी चले यह दुआ है |
अजीम के जीवन की रोचक बातें :
·         अजीम का परिवार गुजरात के कच्छ इलाके से है, ये इस्माइली मुसलमान है |
·         अजीम के पिता को बंटवारे के वक़्त जिन्ना ने पाकिस्तान में बसने औए वहां के वित्तमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे अजीम के पिता एम एच प्रेमजी ने नकार दिया
·         अजीम के दादा एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे, उन्हें बर्मा का राइस किंग भी कहा जाता है
·         1999 से 2005 तक लगातार छः वर्ष तक फ़ोर्ब्स के अनुसार अज़ीम सबसे अमीर भारतीय थे
·         दुनिया के साठ देशो में विप्रो का कारोबार फैला है, जिसमे डेढ़ लाख कर्मचारी है
·         विप्रो ब्रांड वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्टस लिमिटेड का संक्षित नाम है
·         2013 तक अजीम अपनी कुल संपत्ति का एक चौथाई दान कर चुके है    
·         टाइम पत्रिका द्वारा अज़ीम को दो बार, 2004 और 2011 में, दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया जा चुका है, एशियावीक ने 2000 में उन्हें दुनिया के सर्वाधिक प्रभावी बीस लोगों में शुमार किया
·         अज़ीम जीवन में सादगी को महत्वपूर्ण मानते है और हवाई यात्राए मितव्ययी श्रेणी अर्थात इकोनामी क्लास में करते है, किसी शहर में अगर उनकी कंपनी का गेस्टहाउस हो तो होटल की बजाय गेस्टहाउस में रुकना पसंद करते हैं
·         शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन भारत के सात राज्यों के तीन लाख से जादा स्कूलों में कार्यरत है  
सम्मान और पुरस्कार :
·         2005 में पदम् भूषण भारत सरकार द्वारा
·         2011 में पदम् विभूषण भारत सरकार द्वारा
·         फैराडे मेडल पाने वाले पहले भारतीय
·         लीजन ऑफ़ आनर फ़्रांस की सरकार द्वारा 
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कश्यप किशोर मिश्र