Tuesday, April 22, 2014

अगर लाहौर जाना


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मेरे दादू कहा करते थे,
जिसने लाहौर नहीं देखा उसने दुनियां नहीं देखी,
नूरेजमीं है लाहौर|

बड़ी मुहब्बत थी मेरे दादू को लाहौर से,
वहां के तांगे, हो या तांगेवाले,
वहां की बंद गलियाँ, गलियों के मुहाने के फाटक,
कोट सा शहर, शहर के भीतर, सबके अपने कोट,
दादू कहते,
लाहौर परकोटों का शहर है, बबुआ
बाहर से भी, भीतर से भी|

बूढ़े हो चले थे, दादू
पर अनारकली की बात चलते ही
उनकी ज़र्द आखें टिमटिमा उठती थी|
बताते रहते मेयो कालिज के किस्से,
जो बाद में नेशनल कालिज आफ आर्ट हो गया था|
रीगल पर आकर ठहर जाते थे दादू
वक़्त में पीछे चले जाते थे |
लक्ष्मी चौक, सिंगार बाज़ार, गनपत रोड, धनीराम बाज़ार
न जाने कहाँ कहाँ घूमते रहते ख्यालों में
और घुमाते रहते हमें भी अपने साथ, ख्यालों में ही|

एक तस्वीर लेकर चले थे, दादू लाहौर की
सन अड़तालीस की सितम्बर में,
और बाकी जीवन भर,
वह तश्वीर ही रहा दादू का अपना शहर लाहौर
जहाँ सुबह-सुबह सड़के धोयी जाती थी|

दादू के साथ-साथ एक शहर लाहौर
मेरे ख्यालों का भी बसता चला गया|
अब मेरे लाहौर में भी है, मोरी गली
बादशाही मस्जिद, बादामी बाग़,
रावी का किनारा और सिविल लाइंस भी|
                                                                                            
                                                                                     सिविल लाइंस की बात चली तो याद आया         
वही कहीं डीएवी कालिज भी है, गुजरे वक़्त का,
उसके बगल से बड़ी साफ़ सड़क गुजरती है,
आगे जाकर रेलवे रोड से मिलती है|

उस सड़क पर पहुचते ही,
जरा आगे बाए मुड़कर एक गली जाती थी
जो खत्म होती थी, मोहल्ले के एक छोटे से मैदान में,        
उस मैदान के, पूरब-उत्तर के कोने पर
एक पुराना शिवाला था,
एक पक्की मुंडेर का कुवाँ
और एक ईमली का पुराना पेड़ भी था,
पेड़ के चारो तरफ चबूतरा था,
जो लखौरी ईंटों से बंधा था|

आने के ठीक पहले,
सितम्बर अड़तालीस के एक दिन,
बड़े मायूस से मेरे दादू के पास
जब कोई चारा नहीं बचा,
सिवाय लाहौर छोड़ देने के,
तो रो पड़े थे, उस चबूतरे पर बैठे-बैठे|

एक घर भी था, कही वहीँ
पर उसकी बात उतनी जरूरी नहीं,
इस वक्त ज़रूरी वे आंसू है,

सुनो जायरीन,
मेरे लिए लाहौर जाने वाला
जायरीन ही है,
मेरे दादू के शहर जा रहे हो
उस चबूतरे तक ज़रूर जाना,

चबूतरा मिले न मिले,
शिवाला मिले न मिले,
ईमली का पेड़ मिले न मिले
पर मेरे दादू के आंसुओ की नमी ज़रूर मिलेगी|
उन आंसूओ की नमी को लेते आना,
मेरे मुल्क को उनकी सख्त ज़रूरत है|
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कश्यप किशोर मिश्र

Sunday, April 20, 2014

बहार ...एक दिन में नहीं आती


बहार एक दिन में नहीं आती...

Rasrang|Apr 20, 2014, 04:00AM IST

वायु गतिकी के लिहाज से भवरे के शरीर की बनावट इतनी बेडौल और वजन ऐसा होता है, कि उसे किसी भी लिहाज से उड़ने में सक्षम नहीं होना चाहिए| पर वायु-गतिकी के किसी भी नियम से परे, भंवरा न सिर्फ खूब उड़ता है, बल्कि फूलो के ऊपर उड़ते हुए हवा में एक जगह रुक भी जाता है|
महान वैज्ञानिक थामस एडिसन, विद्यालय में महज तीन महीने ही नियमित रूप से पढ़ पाए, वो ऊँचा सुनते थे और बच्चो के बीच उनकी हरकते मूर्खता भरी लगती थी, वो अपने अध्यापको का कहा नहीं सुन पाते थे, एक दिन वह अपनी शिक्षिका के एक नोट के साथ लौटे जो उनकी माँ के लिए था आप का बेटा बेवकूफ है, इसे स्कूल से निकाल दीजिये माँ ने तय किया अपने बेटे को वह खुद पढ़ाएगी | आज हम जिस एडिसन को जानते है, उसके नाम हजार से भी जादा वस्तुओ के पेटेन्ट दर्ज है| मूर्खो सी हरकत करने वाला यह बालक कितना दृढ़ था, यह इस बात से पता चलता है, कि सन 1914 में जब एडिसन की फैक्ट्री जल कर राख हो गयी, तो अपनी जीवन भर की जमा-पूँजी को राख होते देख उन्होंने कहा था विनाश की भी एक सार्थकता होती है फैक्ट्री के साथ हमारी अतीत की सारी गलतियाँ भी जल गयी| अब हम नई शुरुआत करेगे और महज तीन हफ्तों के अन्दर उनका फोन का आविष्कार दुनिया के सामने था|

अंधो के लिए इस्तेमाल होने वाली ब्रेल लिपि का आविष्कार करने वाले, लुई ब्रेल ख़ुद भी जन्मजात नेत्र-हीन थे| कृष्ण की बाल लीलाओं का भावप्रण वर्णन करने वाले सूरदास भी नेत्रहीन ही थे|
लुई ब्रेल की लिपि का बड़ा माखौल उड़ाया गया, पर दुनिया भर के नेत्रहीन आज ब्रेल लिपि की बदौलत पढने में सक्षम है तो दूसरी तरफ सूरदास के अंधी आँखों से किये वात्सल्य वर्णन का मुकाबला शायद ही कोई कर सके| 
ऐसे कई उदाहरण हैं, जो बताते है, कि मनुष्य की इक्छा-शक्ति किसी भी अवरोध को नकारती है| यह अवरोध अज्ञान का हो, भय का हो, दुर्जेयता का हो, या अगम्य, अलघ्य होने का हो|

मनुष्य अपनी इक्षा-शक्ति के बूते असंभव से दीखते वाले कार्य कर जाता है, वरना थोर हैरदोल के पहले किसने सोचा भी होगा, कि सरकंडे से बनी नाव से, समूचा अंध-महासागर पार किया जा सकता है|
धीरूभाई अम्बानी महज चौथी तक पढ़े थे, पर अपनी मौत के पहले वो दुनिया के शीर्ष उद्योगपतियों में शुमार थे|

अब्राहम लिंकन, अमरीका के राष्ट्रपति बनने के पहले, न सिर्फ अपनी वकालत में असफल साबित हुए, बल्कि राष्ट्रपति चुनाव के पहले, लिंकन ने जीवन भर, जितने भी चुनाव लडे, सबमे उन्होंने पराजय ही झेली| पर जीवन भर अच्छा करने के जुनून से अभिप्रेरित रहे|
जीवन लगातार कोशिश करते रहने का और अच्छा करते रहने का नाम है| जरूरी नहीं नतीजा तुरत ही निकल आये, जरुरी नहीं नतीजा हमारी मेहनत के सापेक्ष परिणाम लेकर आये पर यह ज़रूरी है, हम हार न माने, हमारी कोशिश जारी रहे |
कोई भी सुगंध, जो किसी फूल से पैदा होती है, वह किसी सूखे फूल या फल के बीज से शुरू होकर, मिट्टी में एक अरसे दबे रहने के बाद, उगने, बढ़ने, फलने, फूलने के बाद अपनी खुशबू के साथ बाहर आती है| पहले फूल और फिर ढेर सारे फूलों के बीच का अंतराल बड़ा थोड़ा होता है, खुशबू और बाहर से भरपूर लहलहाते फूलों की सुरभि के बीच, बीज से पहली कली के लम्बे अंतराल का शंघर्ष सहज ही दिखाई नहीं देता, नहीं दीखता है वह जतन भी, जो बीज से होता हुआ कली तक पहुचने के बीच किया जाता है|
सहज और सच्चे अर्थो में जीवन इसी जतन से करते रहने का नाम है, जीवन करते रहने और अनुभूत करने का नाम है, जब हम अच्छा करते है, हमें भला महसूस होता है| जब हम बुरा करते है, हमें बुरा महसूस होता है| लिहाजा अच्छा करते रहे, अच्छा महसूस करते रहे| जीवन से सहज अपेक्षा बस इतनी ही होनी चाहिए| यह सहज अपेक्षा ही जतन से करते रहना है, और एक दिन नतीजे की कोई कली चट्केगी | बस, उसी के बाद सफलता की खुशबू अपने बहार के साथ जीवन में उतर आती है, पर यह बहार एक दिन की ही क्यों न हो, पर एक दिन में कभी नहीं आती | 
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ई पेपर का लिंक ;- http://epaper.bhaskar.com/magazine/rasrang/211/20042014/mpcg/2/


Saturday, April 19, 2014

ये तस्वीरें कुछ बयां करती हैं

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SATURDAY, 19 APRIL 2014 16:11

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आँखों के बरक्स, तमामो तमाम तस्वीरों का एक कोलाज तारी है| यूँ तो माहौल में नुमायाँ नारे है बड़े फितरती, जो अपने साथ आदमी की फितरत बदल देने में माहिर है| इन नारों का असर बड़ा मादक और मारक है, आदमी की फितरत बदल देता है, वह सब कुछ भूल थाम लेता है एक नारा, एक झंडा और लगाने लगता है नारे
गली गली में शोर है यह सारा का सारा शोर उसकी अपनी आवाज का हो रहा होता है | ठीक वैसा ही, जैसा कान मूँद कर भ्रामरी करते जब हम हल्की भँवरे सी गुंजन करते है, तो उस हल्की सी गुंजन की कम्पन अपने बंद कान के भीतर हमारे पोर-पोर को हिलाती लगती है| अपने नारे गली गली में शोर है का शोर मचाने वाले और उसे सुन सुन कर शोर मान लेते दोनों एक ही आदमी है| आदमी के कान बस एक विचारधारा को सुन रहे है|

इस माहौल में ज़रूरी है, इस सारे हुल्लड़ से अलग उन तस्वीरों की बात की जाए, जिनका जिकर आज के माहौल में बहुत ज़रूरी है| वे तस्वीरे जिनसे रूबरू मतलब आज के दौर के नारों की न सिर्फ मादकता खत्म करने वाले है, बल्कि इन झंडो और नारों के मारक असर को भी बेअसर करते है | ये तस्वीरे सपाट बयानी है एक औरत की जो सारी रात पर्दानशीन रही हो और उसके आशिक बस उसकी एक झलक देखने को बेताब हो, पर अल्ल-सुबह घर लौटने ही अपने बच्चे का रोना सुन, अपना चेहरा देख लेने को आतुर आशिक के सामने अपना वक्ष अनावृत कर अपने बच्चे को दूध पिलाने लगी हो|
सच की हुमक ऐसी ही होती है| सारी चमकदार रोशनी और धूम-धड़ाके के लंद्फंद धरे के धरे रह जाते है| ऐसा ही एक सच है, मेरी आँखों में उभरी पहली तस्वीर| यह तस्वीर है अविनाश भाई की| जयप्रकाश नारायण के अनन्य सहयोगी रहे अविनाश चन्द्र सक्सेना, उन चन्द लोगो में एक थे, जिनकी पहुच जेपी तक बिना किसी रोक-टोक की थी| मुसहरी आन्दोलन से लेकर अपनी अस्वस्थता के दौरान बस दो चार लोगो से मिलने तक सिमित व्यक्तियों में से एक व्यक्ति में शुमार अविनाश भाई जेपी के समग्र क्रांति के बस गिनती के बचे पहरुओ में एक है और बनारस में एकाकी जीवन बिता रहे है| राजघाट के सर्व सेवा संघ में आत्मलीन, समग्र क्रांति का यह तेजस्वी पहरुआ खामोशी से, अपने हिस्से का दायित्व निभाये जा रहा है| चाहे केजरीवाल हो या मोदी या अजय राय किसी को इतना वक़्त नहीं की इस बस एक मत के लिए अपना थोडा सा समय बर्बाद कर ले|

आँखों में करक पैदा कर रही दूसरी तश्वीर मेरी अम्मा की है| हमारे बचपन के शुरूआती सालों में, अम्मा हम बच्चो से बेफिक्र घर का चौका-चूल्हा सम्हालती थी| हम बच्चे नहाने नदी पर जाते, गावं का कोई भी आदमी, यह कोई भी आदमी कोई भी हो सकता था यह निगरानी करता जरूर था कि वह घाट छोड़ कर तभी हटे, जब बच्चे नहा चुके हो| हम बच्चे बगीचे में ओल्हा-पाती खेलते रहते और इस दौरान जैसे ही कोई भी बच्चा पेड़ पर चढ़ता, किसी न किसी तरफ से, किसी न किसी की मनाही करती खंखार सुनाई पड़ जाती| नाव से नदी पार करते, कोई भी हो बच्चो को कगार से हटकर बैठने को कह देता| ऐसा लगता था, बच्चे समाज की साझी ज़िम्मेदारी हों| लिहाजा अम्मा निश्चिन्त थी| पर देखते ही देखते अम्मा की आँखों ने चौरासी के दंगो का कत्ले-आम देखा, बानबे का रक्तपात देखा, गोधरा-गुजरात की हौलनाक तश्वीरे देखी, मुजफ्फरनगर के दंगे देखे और अम्मा की आँखों में डर बस गया | पटना में हमारे घर के अहाते के भीतर हमारे कुत्ते को गोली लगी थी, गोली किसी को नहीं पहचानती, वहां मेरी अम्मा की औलादों में से कोई एक भी हो सकता था| अम्मा राय साहब के बेटे की मौत नहीं भूल पाती | काँटा टोली, रांची में गोली लगने से मारा गया था वो, इकलौता लड़का था, इक्कीस बरस बस लगे थे| सड़क पर रिक्शे से जा रहा था| बलवाइयो के दो गुट आपस में लड़ रहे थे| किसी ने गोली चला दी| खबर बनी राहगीर मारा गया| राय साहब का पूरा परिवार ही मर सा गया उस दिन| अम्मा का कलेजा जोर-जोर धड़कता रहता है, इस धड़कने में तमाम आशंकाओं का भी हाथ रहता है, आँखों में डर बस सा गया है, मनाती रहती है सम्मे माई को, अपने बच्चो के सलामती के लिए |

तीसरी तस्वीर, घर के छत से मील भर दूर दीख रहे, खेतो में निकल आये हिरण की है| हिरण बेफिक्र है, दूर दूर तक उसे कोई ख़तरा नहीं दीख रहा, पर उसे नहीं पता, मील भर दूर बैठा एक शिकारी, बिना किसी टीम टाम के अपने घर की छत पर बैठे बैठे बस एक निशाने में हिरण का काम तमाम कर देगा| बेचारा हिरण, उसे नहीं पता आज के शिकारी दिल्ली शिकारी है, उनके पास ताकतवर दूरबीने है, दूर तक निशानची बंदूके है, बड़ी ही सुरक्षित और पोशीदा उनकी पनाह्गाहे है|
चौथी तस्वीर मेरे बच्चे की है, उसने कानो से मोबाईल लगा रखा है जो उसके एक हाथ में है और दूसरे हाथ में खिलौना हेलीकाप्टर को उड़ाने का रिमोट| इस मोबाईल से वह अपनी नानी से बात कर रहा है, उसके लिए एक तरफ, यह मोबाईल, हजारो मील दूर बैठी अपनी नानी से जुड़ने का, उनकी दुलराहट महसूस करने का माध्यम है तो दूसरी तरफ हेलीकाप्टर का रिमोट अपने खिलौने को हवा में उड़ा कर अपनी ख़ुशी अपने उल्लास को साथ के बच्चो के साथ बाटने का जरिया है| उसने अपने घर में अभी यही सीखा है | उसकी तरह ही दुनिया का हर बच्चा भी यही सीखता होगा अपने-अपने घरो में| पर कुछ लोग इन बच्चो को इनका इस्तेमाल बदल देना सिखाते है, वे मोबाईल से निशाना बताते है, खिलौनों का इस्तेमाल बम बनाने में करना सिखाते है| जो बच्चे ये तरीके सीखते है, वो अपने बचपन में एकदम उतने ही मासूम थे, उतने ही सरल जैसा फिलहाल मेरा बच्चा है |

पांचवी तस्वीर है किसुन यादव की, होली के दोपहर की| जब लोग होली मनाने की तैयारियों में लगे थे, किसुन अपने घर के चूल्हे पर पकने के लिए राशन के जुगाड़ में लगे थे | आज भी सात हाथ की लाठी लेकर चलने वाले किसुन को होली की उस चढ़ती दुपहरी, सुनसान सड़क पर गावं लौटते देख मेरी आँखों की कोर गीली हो गई देस चोरी परदेस भिक्षा सोच मै भीतर तक कातर हो उठा| मुल्क आज़ाद हुआ तो महज आठ बरस के थे किसुन, अल्ल-सुबह उनके बाबा चिल्ला रहे थे, सुराज आ गया- सुराज आ गया एक दम झार नगें, मटियालोट किसुन दौड़ पड़े पोखरे की तरफ, गावं में आनेवालों की राह उधर से ही थी, कोई आता नहीं दिखा था, किसुन को | आज शरीर पर कपडे है, उमर अब पचहत्तर हो रही है, किसुन यादव की| पर आत्मा झार-झार नंगी हो चुकी है | सुराज उनको आज भी नहीं दिखता|

छठी तस्वीर उभरती है, गयासुद्दीन की| तांगा चलाना उसका पुश्तैनी है, मेरी निगाह में वह चौथी पीढ़ी है, जिसे तांगा चलाते मै देख रहा हूँ| जब सब त्यौहार की मस्ती में डूबे थे, गयासुद्दीन गावं से कस्बे के बाज़ार की सूनी सड़क पर चला जा रहा है, अपने तांगे के साथ| कोई मिलता है, रँगना चाहे तो रंग लगवाने से कोई गुरेज नहीं है| उसकी पोटली उसके साथ है, घोड़े का चना-चबेना साथ है| रोज जैसे ही| गयासुद्दीन शाम तक बाज़ार पहुचेगा और भिन्सहरे-भिन्सहरे सामान लाद कर लौट पड़ेगा| इस तरह कल एक फेरी और हो जायेगी| होली के दिन जो मजूरी नहीं हो पाई, उसकी कुछ भरपाई हो जायेगी| गयासुद्दीन पीढ़ी डर पीढ़ी तांगा चला रहा है, और उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी, अपनी मजूरी की भरपाई करती जा रही है | भरपाई हो जाए तो अल्लाह की नेमत, कुछ जोड़ सके यह बस ख्वाब है | वह जिस सड़क पर तांगा चला रहा है, वह बड़ी टूटी हुई है, जो पल भर के सुकून और खवाब की इजाजत कतई नहीं देती|

सातवी तस्वीर नदी के उस घाट की है, जिसपर पुल बनाने की बात नेहरु के समय से उठती-बैठती अब सो चुकी है| बरसात में नदी का पाट फ़ैल जाता है, लिहाजा उस पार दिखता गावँ और लोग उस दौरान बेगाने हो जाते है| इस घाट पर पहले नाव चलती थी | गर्मी की सख्त दोपहर हो या जाड़े की सर्द कोहरे भरी रात, घाट पर पहुचे राहगीर एक जोर की हांक लगाते थे ए माझी और माझी अगर दूसरे पार भी हो, नाव लेकर राहगीर को पार उतार देता था| इस इलाके के लोग आज़ादी के बाद से इस घाट पर पुल की हांक लगाते लगाते थक गए| अब तो कोई पुल की बात करता ही नहीं| हजारो हजार लोगो की हांक अनसुनी रह गई| इस तस्वीर के घाट पर जन गण मन के अधिनायक जय हो की चिता जल रही है|

आठवी तस्वीर लखनऊ के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और बनारस के एक पत्रकार की है, जिनकी मुलाकात का जरिया आज के दौर का आभासी जगत था| महज एक मुलाकात के लिए लखनऊ से यह युवक शाम को चलता है, करीब पूरी रात अपनी गाड़ी चलाकर बनारस पहुचता है, एक दिन बनारस में, बस मिलने–बात करने के लिए बिता कर शाम को पुनः अपनी गाड़ी से लौट आता है, करीब-करीब पूरी रात गाड़ी चलाते हुए| यह तस्वीर जोड़ने-जुड़ने की है, मिलने-मिलाने की है|
इन सारी तस्वीरों का कोलाज आ कर ठहर जाता है, नवी तस्वीर पर| असल में यह नवी तस्वीर आखरी नहीं है, बल्कि इन सारी तस्वीरों के पार्श्व में बड़ी ख़ामोशी से दुबकी हुई है | यह तस्वीर उस घर की है, जिसमे अब कोई नहीं रहता| ज्यादातर लोगों को ठीक-ठीक नहीं पता इस घर के लोग कहाँ गए| ख़ुद घर छोड़ कर चले गए या बेदखल कर दिए गए| कारण जो भी हो, कसूरवार सभी है| इस घर की तरह ही हम अपने दिलों के भी कसूरवार है, जिनसे हम एक एक कर अपने समाज के लोगों को, उनकी खुशियों को, उनकी अभिलाषाओ को बेदखल करते जा रहे है| इसे यूँ भी कह सकते है कि हमारे दिलो के घर अब हमारे पडोसी की ख़ुशी से आबाद नहीं होते, न ही पडोसी के गम से इनमे मायूसी होती है |

हमारे दिल सूने होते जा रहे है, इस उजाड़ सूनेपन के जिम्मेदार हम है| इस सूने घर की खिलखिलाहते लौट सकती है, अगर बस मिलने और बात करने जैसी तस्वीरों की भरमार हो, पर ऐसा नहीं है| ऐसा हो भी नहीं रहा| पगड़िया सबकी लुट रही है, पर सब बस दूसरों के सर से लूटी जा रही पगड़ी देखने में व्यस्त है| काश कोई तो आईना ऐसा मिले जिसमे हम ख़ुद को देखे तो ख़ुद से ही कहें अपनी पगड़ी सम्हाल” | यह पगड़ी हमारा अपना मत है| यह मेरी तस्वीरे है, मेरी तस्वीरों का कोलाज है| आपके पास अपनी तस्वीरे होगी, उनके अपने कोलाज होगें| पार्श्व में सूने आँगन होंगे| ज़रूरी है उनसे रहगुजर हो ले| पांच साल पर अपनी पगड़ी सम्हालने का मौका एक बार आता है|

पगड़ी हमारी है, सर भी हमारे है|

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कश्यप किशोर मिश्र राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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Saturday, April 12, 2014

बुआ की ढपली

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एक ढपली थी,
मेरे घर में,
बुआ की|
अल्हड़, जिंदादिल बुआ 
जिन्दा रहना जानती थी|

अपनी असमय मौत के पहले की रात
वो देर रात तक ख़ूब नाचती रही|
कभी अम्मा को बाहों में भर लेती,
कभी मुझे दुलारती,
खूब सारे गीत गाती रही 
ढपली बजाती रही !


अपने बाबूजी का गीत थीं, बुआ!
शकुंतला थीं सुन्दर,
शेषा सुकोमल,
चेहरा मनोरम|

घर में, सबको पता था,
बुआ के गीत- संगीत 
जल्द ही थम जायेगे,
थम जायेगी बुआ भी |

यह बात बुआ को भी पता थी|
यह पते की बात,
बहुत पीड़ा देती थी, बुआ को|
सहा नहीं जाता उनसे
तो बजाने लगती थी,
अपनी ढपली|
बहुत खूब बजती है,यह ढपली|
है न बाबूजी ?
बुआ पूछती थी, बाबा से|
बाबा कहते,
"मेरी ढपली तो तू है, बेटी"|

सन अठत्तर की होली की सुबह,
बाबा की ढपली थम गई,
अपने बाबूजी की सारी होलियाँ
बेरंग कर गई|

घर की एक खूंटी पर
अम्मा के शब्दों में,
"बीबीजी की ढपली"
टंगी रहती थी|
हवाओं से रुनझुन करती|

सन अठत्तर से आज तक
उस ढपली में छुप के बैठी रहीं,
बुआ की पदचाप,
गुंजन आवाज,
फागुन का फाग|

कल यूँ ही, अनायास
ढपली फूट गयी|
उस वक़्त मै बच्चा था, बुआ
नहीं पता था,
टूटना क्या होता है?
कल लगा,क्या होता है,
शाख से टूटना, एक कोपल का|

सन अठत्तर की उस फागुनी सुबह,
मै मुरब्बा खाते,
तुम्हे ले जाया जाते देखता रहा
हमेशा ही ले जाई जाती थी
तुम, बुआ डाक्टर के घर|

उस वक़्त मुझे कुछ नहीं पता था
आज वह बच्चा रोने लगा
मै आज खूब रोया, बुआ
बाकी आंसुओ के व्याज सहित, रोया!
उठ के आई बिटिया मेरी,
बोली यह कैसी ललक,
ढपली की?
क्यों रोते हो?
तुम्हारी ढपली तो मै हूँ|
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कश्यप किशोर मिश्र