Tuesday, October 15, 2013

लोग बहल जाये !


आजकल हमारे पाकिस्तानी भाई बहुत नाराज है,अब भला इ भी कोई बात है कि उ थोड़ी बहुत तफरी के लिए इन्डिया आना चाहे तो उनपर इंडियन आर्मी वाले रोक लगाते है,एक तरफ तो इन्डिया कि कांग्रेस सरकार की तरफ से सबको खुली छूट है, की इस मुल्क में जो चाहे सो आवे, जो चाहे सो करे। बम फोड़े, गोली दागे और मौका पाए तो मासूम बच्चियों और औरतो से रेप करे। बस सरकार की, और उसके नातेदार रिश्तेदार और पुछल्लों की चोरी चकारी से आँखे मूंदे रहे।

चीन वाले जब चाहे तब आते है और इन्डिया की बाउंड्री में घुस आते है। नारे लिखते है,पहरेदारो की पिटाई करते है, सड़क बनाते मजदूरो को भगा देते है और फिर घुड्काते भी है कि बासठ भूल गए कि फिर से याद दिलाये...

पाकिस्तान से भी मियादाद आवे, रहमान मालिक आवे, जो चाहे सो बके,इन्डिया सरकार तो कुछ नहीं कहती है, अब इ मिलिट्री वाले कौन होते है, चे चे करने वाले, सो गुस्से में दू ठो इंडियन जवान को मार डाले और दू- तीन की पिटाई किए, जाते जाते एक सैनिक का मुड़ काट ले गए, और रोको हमको...!

अब एक गंभीर बात... पाकिस्तान वाले आये क्रिकेट खेल गए, ग़जब का तमाशा था, और भी तमाशे होंगे, इनपर शहरयार की लिखी चंद पंक्तिया याद आती है (ये अलग बात है की इन्ही पंक्तियों की वजह से इंदिरा कांग्रेस की अम्मा इंदिरा गाँधी ने आपातकाल में शहरयार को बैन कर दिया था )

यह जशन , यह हंगामा, ख़िदमत नहीं साजिश है?
कुछ लोंगो की कोशिश है, की लोग बहल जाये !

Monday, September 23, 2013

बरस्ते चीन हमारे मानवाधिकारी हरकारे …

बरस्ते चीन हमारे मानवाधिकारी हरकारे


कश्यप किशोर मिश्र

मानवाधिकार को लेकर, जो मेरी सीधी -सीधी सोच है, उसके अनुसार, मानवाधिकार एक मनुष्य के तौर पर मिलने वाली मानवीय गरिमा का अधिकार है ! मानवीय गरिमा का पालन होना ही चाहिए, चाहे आप एक अपराधी हो, अथवा राष्ट्राध्यक्ष| मानवीय गरिमा के सवाल पर यह महत्वहीन है, कि आप उस देश में नागरिक है, शरणार्थी है, मुजरिम है अथवा उस राष्ट्र के शत्रु ही क्यों न हो | एक मनुष्य को, उसके मनुष्य होने की गरिमा पाने का अधिकार होना ही चाहिए और यह अधिकार सिर्फ एक मनुष्य को जीवित रहते ही नहीं, बल्कि अपनी मृत्यु के बाद भी, यहाँ तक कि, उसके शव को भी पर्याप्त गरिमा प्रदान की जाय, इसकी वकालत करता है|
दुनिया भर में फैले, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता, दुनिया भर के सत्ता तंत्र और उनके विरोधी तंत्रों से भी, मानवीय गरिमा के सवाल पर मोर्चा लेते रहते है| जबकि सरकारे और प्रतिरोधी तंत्र अपने विरोधियों को ज्यादा से ज्यादा तबाह करने की फ़िराक में होती है, उन्हें यह चेताना कि कहाँ वो मानवीय गरिमा का उल्लघन कर रहे है, अत्यंत चुनौती भरा काम है !
मसलन सीरिया के रासायनिक हमलों के आरोप को ही ले, एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता निश्चित ही, रासायनिक हमले पर सवाल खड़े करेगा और इसके इस्तेमाल करने वाले को अपराधी ठहराएगा | अब ये हमले चाहे असद सरकार कर रही हो, या विद्रोही पर दोनों हालात में यह गलत है| पर अगर एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता असद सरकार के हमलों पर जोर-शोर से हल्ला मचाये और विद्रोहियों के ऐसे हमले पर चुप्पी साध ले, तो ? निश्चित ही, उसे पूंजीवादी अमरीका का एजेंट माने या न माने, पर उसकी नीयत पर सवाल उठाना तो लाजमी ही है |
हिंदुस्तान में, मानवाधिकार के लिए लड़ने वाले, बेहद ईमानदार लोगों की एक लम्बी सूचि है, जिनकी निष्ठां संदेह से परे है| मानवीय अस्मिता के लिए लड़ने वाले तमाम नाम, बेशक वो किसी भी वाद से जुड़े रहे, पर मानवीय गरिमा के सवाल पर, उनके साथ कंधे से कन्धा मिला कर चलने वालों के लिए यह सवाल कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा कि वह किस वाद से जुड़े हुए है, ऐसे मामलों में उनकी निष्ठां असंदिग्ध रही है और मानवीय गरिमा के खिलाफ़ होने पर, उन्होंने खुल कर उनके खिलाफ भी मोर्चा सम्हाला, जिनका वैचारिक रूप से वह समर्थन करते आ रहे थे|
हमेशा की तरह, सिक्के के दो पहलू होते है| मानवाधिकार की लड़ाई लड़ने वाले भी इससे अछूते नहीं है| मानवीय गरिमा की लड़ाई के चेहरे का एक पहलू, वे चेहरे है, जिनके लिए मानवीय गरिमा की लड़ाई, रोजी-रोटी का जरिया नहीं, एक मिशन है|जिनके लिए लड़ी जा रही लड़ाइया, प्रायोजित नहीं है, उनके लिए कोई अनुदान नहीं आता, उनके आंदोलनों के लिए कोई हो हल्ला, प्रायः, नहीं मचता, ये आन्दोलन कोलाकंपनियों के कैम्पेन की तरह संगीत-ध्वनि-प्रकाशसे भरपूर, वैचारिक लफ्फेबाजी की पाठ्शाला नहीं होते|
शर्मिला इरोममानवीय गरिमा के लिए लड़ने वालो के लिए, ऐसा ही एक शशक्त नाम है| जबकि इरोम अपने अनशन के आगामी 5-नवम्बर को तेरह वर्ष पूरे करेगी, तो इन तेरह वर्षो की स्मृतियों में, बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं के कांगला फोर्ट के सामने सामूहिक रूप से नग्न होकर प्रदर्शन करने से लेकर, भारतीय सत्ता तंत्र द्वारा इरोम को नाक के जरिये जबरजस्ती तरल भोजन देने तक की, तमाम स्मृतियों के चित्र मौजूद है, जो मानवीय गरिमा के लिए ईमानदारी से लड़ने वालों को प्रेरणा देंगे|
सिक्के का दूसरा पहलू, मानवाधिकार के लिए लड़ने वाले, उन लोगों से जुडा है, जिन्होंने मानवाधिकार में बड़ी-बड़ी डिग्रियां इकठ्ठी की है, जिनके लिए मानवाधिकार उनकी रोजी-रोटी का जरिया है, रोजी-रोटी अपने प्रायोजकों के ख़िलाफ़ बोलने की मनाही करती है, लिहाजा ऐसे मानवाधिकार समूह, अपने दाताओ से जुडी ख़बरों पर आपको आश्चर्यजनक रूप से मौन दिखेगे| 
इन्हें हिन्दुस्तान में मणिपुर नज़र आएगा, पाकिस्तान का स्वात और बलूचिस्तान भी नजर आएगा, इनके एजेंडे में अयोध्या का मंदिर-मस्जिद विवाद बार-बार नजर आएगा, गुजरात-2002 इनके विमर्श का प्रिय बिंदु होगा, इन्हें मयान्मार की हिंसा नजर आएगी, इंडोनेशिया नजर आएगा, नेपाल और श्रीलंका तक पर इनकी जाहिर की जा रही चिंताए और वहां की घटनाओं पर इनके तथ्य खोजी दलोंके अन्वेषित विमर्श नजर आयेगे| पर इन चिंताओं के मध्य, चीन में मानवाधिकार हनन से जुड़े मुद्दे आपको गायब मिलेंगे|
एक सोलह साल की बच्ची, एक ट्वीट की वजह से, जो चीनी सत्ता तंत्र के अनुसार अफ़वाह फ़ैलाने में सहायक था, गिरफ्तार कर के जेल में डाल दी जाती है, अथवा चीन के सिक्यांग प्रान्त में उईगर मुसलमानों के दमन से जुडी खबरे हो, या तिब्बत में दमन की खबरे हो, पत्रकारों, बुध्धिजीवियों का दमन, लोकतंत्र समर्थको की हत्याए, युवा चीनी जनता का सत्ता के प्रतिरोधका हिंसक दमन या फायरिंग स्कवाड से, बिना किसी पारदर्शी तरीके से सुनवाई के, अपने विरोधियों की हत्याए हो| इनमे से कोई भी खबर आपको एशियन ह्यूमनराइट्स कमीशनकी ख़बरों में, प्रेस रिलीज में या कार्यक्रमों में नज़र नहीं आएगी|
एशियन ह्यूमनराइट्स कमीशनकी वेबसाइट जहाँ एक तरफ भारत में सत्ता में सहभागिता का भ्रमसे लेकर अयोध्या-मुद्दे का पुनर्पाठ कर रही हो, वहां हांगकांग में ही इसके दफ़्तर होने के बाद भी, चीन से जुडी बस एक खबर एक पाकिस्तानी के चीन में मृत्यदंडके होने पर, इसकी नीयत पर सवाल भी खड़े करती है|
यह निकट दृष्टि दोष तो कतई नहीं है, हां इसे चीन का प्रायोजित मानवाधिकार जरुर कहा जा सकता है, शर्मिला इरोम के पहलू से अलग यह मानवाधिकार के लिए लड़ने वालों का सिक्के का दूसरा पहलूहै, जो दुर्भाग्य से कुछ जादा ही दागदार दिखता है !


Saturday, August 24, 2013

रमरतिया की आबरू भी कहीं आबरू होती है ?


 

हे राम ...!

20-जनवरी-1948, को गाँधी जी की प्रार्थना सभा से 75 फीट की दूरी पर एक बम धमाका किया गया, मदनलाल पाहवा गिरफ्तार हुआ जबकि छः अन्य अपराधी एक टैक्सी से फरार होने में सफल रहे | महात्मा गाँधी की हत्या का सन 1934 से यह पांचवा प्रयास था, 30-जनवरी-1948, को हुई गाँधी जी की हत्या छठा प्रयास थी, ये सभी छः के छः प्रयास अतिवादी हिन्दू राष्ट्रवादियो द्वारा किये गए थे |

महात्मा गाँधी की हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को, पूना में किया गया | गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, रास्ते में उनकी मोटर को लक्ष्य करके मोटर पर बम फेंका गया पर गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे। गाँधी जी की हत्या का यह पहला प्रयास था, जो पूना के एक कट्टरपंथी हिन्दू गुट ने किया था| पुलिस रिपोर्ट में दर्ज विवरण के अनुसार, गांधीजी की मोटर पर बम फेंक कर उनकी हत्या का प्रयास करने वाले आरोपी के जूते में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरु के चित्र मिले थे |

जुलाई -1944 में, पंचगनी में, महात्मा गाँधी की हत्या की दूसरी असफल कोशिश हुई, जब महात्मा गाँधी अपनी बीमारी से उठकर स्वाश्थ्य लाभ के लिए पंचगनी गए हुए थे | इस खबर के फैलने के बाद पूना से 20 युवकों का एक दल बस से पंचगनी पहुंचा इस गुट ने समूचे दिन गांधीजी के विरोध में नारेबाजी की, इस गुट के नेता को गांधीजी ने बातचीत करने का न्योता दिया, पर उसने गांधीजी से, किसी भी तरह की बातचीत करने से इंकार कर दिया, शाम को प्रार्थना सभा में यह नवयुवक हाथ में छुरा लिए, गांधीजी की तरह लपका, प्रार्थना सभा में मौजूद, पूना के ही, सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने हमलावर को पकड लिया और पुलिस को सौप दिया। पुलिस-रिकार्ड में हमलावर का नाम नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जा!च करने के उद्देश्य से, 1965 में बिठाये गए कपूर-कमीशन के समक्ष उक्त हमलावर की पहचान नाथूराम गोडसे के रूप में की थी।

गांधीजी की हत्या की तीसरी कोशिश सितम्बर-1944 में, वर्धा में, की गई | गांधीजी मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे। गांधीजी के बम्बई जा कर जिन्ना से बात करने का, कुछ लोग विरोध कर रहे थे, इन्ही विरोध करने वालों का एक समूह पूना से वर्धा पंहुचा, पुलिस रिपोर्ट में दर्ज विवरण के अनुसार, उस गुट के ग.ल. थने के नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ। अपने बयान में उसने बताया की यह छुरा वह गांधीजी की मोटर पंचर करने के उद्देश्य से लेकर आया था | महात्मा गाँधी के निजी सचिव प्यारेलाल ने उस घटना का विवरण देते हुए लिखा है "आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी। बापू ने कहा कि मैं उनके बीच अकेला जाउगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूगा, स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें तो दूसरी बात है। किन्तु बापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है।

धरना देनेवालों का नेता बहुत ही उनेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला।" (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)

29 जून, 1946 को गांधीजी की हत्या की चौथी कोशिश हुई, जब गांधीजी एक विशेष टेंन से बम्बई से पूना जा रहे थे | नेरल और कर्जत स्टेशनों के मध्य रेल की पटरी पर एक बड़ी चट्टान कुछ अराजक तत्वों ने रख दी, ट्रेन के ड्राइवर की सूझ-बूझ और सावधानी से एक भयानक हादसा टल गया और गांधीजी सकुशल पूना पहुँच गए| अगले दिन, 30 जून को प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने बीते दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मुह से सकुशल वापस आया हू। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुचाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया।'

गांधीजी की हत्या का पांचवा प्रयास मोहनलाल पाहवा ने किया और छठवे प्रयास में 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी।

गांधीजी की हत्या के आरोप में विनायक दामोदर सावरकर, नाथूराम, नारायण आप्टे, सहित आठ लोगों पर हत्या का अभियोग चला, फ़रवरी 1949 में नाथूराम और नारायण आप्टे को मृत्युदंड अन्य पांच को आजीवन कारावास और सावरकर को सबूतों के अभाव का लाभ देकर बरी कर दिया गया |नाथूराम और आप्टे को नवम्बर 49 में फांसी पर लटका दिया गया |

सावरकर ने, जिरह के दौरान नाथूराम अथवा किसी भी अभियुक्त के साथ अपने सीधे सम्बन्धो की बात या कभी मुलाकात की बात नकारी, जो बाद में प्रकाश में आये तथ्यों के लिहाज से झूठी साबित हुई, सावरकर ने नाथूराम का इस्तेमाल किया था, नाथूराम उनका अंधभक्त था, सन 1940 में, हिन्दू महासभा के अध्यक्ष सावरकर के आदेश पर, हैदराबाद के निजाम की नीतियों का विरोध करने वाले पहले जत्थे का नेतृत्व नाथूराम ने किया था और गिरफ्तार होकर निजाम की जेल की सजा भी भुगती थी |

नाथूराम ने जिरह के दौरान दिए अपने बयान में, सावरकर के हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति अपनी निष्ठां व्यक्त की |

गांधीजी की हत्या के 20 जनवरी के प्रयास और 30 जनवरी की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों और गांधीजी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता का पता लगाने के लिए, भारत सरकार ने 1965 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाया जिसने उन तथ्यों की भी पड़ताल की, जिन्हें गांधीजी की हत्या के लिए चले मुक़दमे की जिरह के दौरान नहीं प्रस्तुत किया गया था, कमीशन ने सावरकर के अंगरक्षक रहे अप्पा रामचंद्र कसर और उनके सचिव गंजन विष्णु दामले के बयान भी लिए, यदि उक्त दोनों के बयान गाँधी हत्याकांड के दौरान लिए गए होते तो सावरकर का झूठ सामने आ जाता और भी गाँधी हत्या के दोषी करार दिए गए होते |

कमीशन के तथ्यों से यह प्रमाणित हुआ, कि 1948 की जनवरी 14 और 17 को नाथूराम और आप्टे ने सावरकर से मुलाकात की थी, कसर ने कमीशन को बताया की नाथूराम और आप्टे ने पुनः जनवरी 23 को, बम धमाके के बाद, दिल्ली से लौटने के बाद, सावरकर से मुलाकात की थी ...

दामले ने कमीशन को बताया; "आप्टे और गोडसे ने जनवरी के मध्य में सावरकर को देखा और वो साथ ही बगीचे में बैठे"

कपूर कमीशन के तथ्य एकदम स्पष्ट थे, उन्होंने पुलिस की भयानक लापरवाही को उजागर किया, जो अगर नहीं की गई होती तो गांधीजी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता साफ साफ साबित हो जाती |

बहरहाल, सावरकर सबूतों के अभाव में अपने को बचा ले गए और नाथूराम और नारायण आप्टे नवम्बर-1949 की एक सुबह, "अखण्ड भारत अमर रहे" का नारा लगाते फांसी के फंदे पर झूल गए, उन्हें सपने में भी गुमान नहीं था, कि जिस व्यक्ति की उन्होंने हत्या की "अखण्ड भारत" उसका सबसे बड़ा सपना था |

प्रेमचंद्र और उनकी प्रगतिशीलता ...

प्रेमचंद को कम्युनिष्ट मानने वालों का कहना है कि उनपर सोवियत रूस की क्रांति का असर था और ऐसा लगता है कि वे रुसी क्रांति से प्रभावित थे, टॉल्स्टॉय उन्होंने पढ़ रखा था और वे प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष भी थे लिहाजा ये सारी बातें उनके वामपंथी रूझान को साफ करती है |

पर प्रेमचंद की लेखकीय प्रगतिशीलता का आशय, समाज की रुढियो से मुक्त सोच से था,1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा भी था कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है वह लेखक नहीं है।

प्रेमचंद कभी भी गाँधी की विचारधारा से अलग नहीं हुए, हां उन्होंने रूस की तारीफ़ जरूर की थी, लेकिन रूस के संबंध में मुंशी प्रेमचन्द की राजनीतिक समझ की कमी थी जैसा कि उस समय बहुत सारे लोगों के साथ थी, यह बात उनके जोसेफ स्टालिन की प्रशंसा करते लिखे लेख से भी स्पष्ट हो जाती है |

उनकी जीवनी में इस बात का ज़िक्र मिलता है, कि नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद चरखा, स्वदेशी और स्वराज के प्रचार में लग गए थे |गोरखपुर से लमही जाकर उन्होंने चरखे बनवाकर भी बाँटे | इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि सन् 1930 में जब वह लखनऊ के अमीनुद्दौला पार्क में रहते थे तो नमक क़ानून के खिलाफ सत्याग्रह करने वालों को अपने हाथ से कुर्ता और टोपी पहनाकर रवाना करते थे |

प्रेमचंद के लिए प्रगतिशील होने का तात्पर्य सांप्रदायवाद, जातिवाद, छूआछूत और स्त्रियों की स्वाधीनता से था, यही वजह थी की वह आर्य समाज से अत्यंत प्रभावित थे और 1906 में उन्होंने एक विधवा शिवरानी देवी से अपना दूसरा विवाह किया |

यहाँ यह भी ध्यान रखने की बात है, कि 1934 में प्रेमचंद बम्बई गए थे और वहाँ से उकता कर पुनः बनारस भाग आये, आने के पश्चात् पत्नी शिवरानी देवी ने उनसे कांग्रेस के टिकट पर काउंसिल चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा, लेकिन प्रेमचन्द ने इसे नामंजूर कर दिया और कहा,"मेरा काम काउंसिल में काम करने वालों की समालोचना करना हैं." ध्यान दे प्रस्ताव कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का था |

लिहाजा कम से कम जैसा की दावा किया जा रहा है , उस लिहाज से प्रेमचंद वामपंथी नहीं थे, हां वामपंथ से प्रभावित जरुर थे और अंत तक वो गांधीवादी रहे |

क्या वाकई इकबाल पाकिस्तान के सह संस्थापक थे ?

हमारे खूब सारे पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी भाई , अक्सर अल्लामा इकबाल को पाकिस्तान की मजहबी सोच की बुनियाद की एक मजबूत ईट मानते है, पर अक्सर इकबाल का एक अलहदा चेहरा भी नुमाया होता रहता है, एक ऐसा इकबाल जो, हरियाला बन्ना, मजहबी हरियाली से रंगा होने से नहीं बल्कि अपनी माटी की समरस खाद पानी की वजह से हरियाला दिखता है, भला एक कट्टरपंथी मजहबी नमाज अदा करने का जिक्र चलने पर बेसाख्ता ही कैसे बोल उठता है:-
"जो मैं सर-ब-सजदा हुआ कभी, तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आश्ना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में|

बात यही नहीं रूकती, वह अपने तरन्नुम में काफ़िरो के शिवाले की तामीर की बात करने लगता है और आप मानते रहें शिर्क, पर यह अपनी बात कहते बाज नहीं आता कि;-
"सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्‍ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आस्‍मां से इसका कलस मिला दे"

मै अचरज में हूँ, वाकई गोकि इकबाल जिन्ना नहीं थे, लिहाजा लकीरों के मानी उन्हें जिन्ना के मुकाबिल खूब खूब और खूब पता थे, बेशक जिन्ना के साथ इकबाल को पाकिस्तान का सह संस्थापक माना जाता रहा है, लेकिन मशहूर पाकिस्तानी अखबारनवीस इरशाद हक्कानी के अनुसार इकबाल ने भारत से बाहर मुस्लिम मुल्क की बात कभी नहीं की, बल्कि भारत के भीतर ही एक मुस्लिम राज्य का प्रस्ताव रखा था।

हक्कानी के दावे पर हालांकि पाकिस्तान के दो मुख्य इतिहासकारों फतेह मोहम्मद मलिक और डॉ. सफदर महमूद ने सवालिया निशान लगाते हुए कहा कहा कि इकबाल ने ब्रिटिश हुकूमत से बाहिर एक अलग मुल्क की बात की थी, जो जाहिर तौर पर भारत के बाहर ही होता। मलिक ने उनके दावे को खारिज करने वाले दो और इतिहासकारों के. अजीज और डॉ. मुबारक अली को आलोचना करते हुए कहा कि 1930 में अपने संबोधन में इकबाल ने दक्षिण एशिया में मुसलमानों के लिए अलग देश की परिकल्पना की थी।

मगर दिलचस्प है, कि सुहैल जहीर लारी की ' ए इलस्ट्रेटेड हिस्ट्री ऑफ सिंध ' के नए संस्करण में ई. जे. थॉमस लिखे इकबाल के एक ख़त को शाया किया गया है। इसमें इकबाल लिखते हैं , ' मैंने एक गलती की है जिसे मैं तुरंत बता दूं क्योंकि मुझे लगता है कि यह काफी गंभीर है। मुझे पाकिस्तान नाम की एक योजना का कर्णधार बताया जा रहा है। पाकिस्तान मेरी योजना नहीं है। मैंने अपने संबोधन में ये सुझाव रखा था वह एक मुस्लिम प्रांत यानी प्रस्तावित भारतीय संघ के पश्चिमोत्तर हिस्से में जहां मुस्लिमों की ज्यादा आबादी है को देश का एक प्रांत बनाने संबंधी था। ' लिहाजा इसमें कोई शुबहा नहीं कि इकबाल ने अपने मित्र थॉमस को पत्र लिखकर अपनी बात साफ़ कर दी थी की वह पाकिस्तान की कल्पना के हिस्सेदार नहीं है |

सावन का पहला सोमवार और एक नास्तिक व्रती ..!

आज की सुबह जरा व्यस्त रही और करीब साढ़े सात बजे जब मै सुबह की पहली चाय पी रहा था, मेरी पत्नी ने मुझे बताया आज सावन का पहला सोमवार है, उसे पता है, मै मंदिर नहीं जाता, पूजापाठ नहीं करता, कोई व्रत नहीं रखता पर उसने मुझसे सीधे सीधे बताया "आज आपका व्रत है, न " मैंने उसकी तरफ देखते हुए लगभग पूछा "व्रत...?" "मै कबसे व्रत रखने लगा ?" मेरी पत्नी ने बताया "आप पिछले साल भी व्रत थे, मेरे साथ ही" और फिर उसने मेरी तरफ से तय भी कर दिया "हम दोनों का आज व्रत है "|

घर से कार्यालय आते याद आया, बीते साल सावन के पहले सोमवार को हम जबकि खाम्भारखेडा थे, मेरी पत्नी पूरे परिवार के साथ लिलौटीनाथ का दर्शन करने गयी थी और मैंने दर्शन करने जाने या व्रत रखने से साफ मना कर दिया था और अपने लिए सबकी गैर-मौजूदगी में अपना भोजन खुद बनाया था|

...फिलवक्त प्लांट पे हू, यहाँ व्रत के लिहाज से कुछ खा सकू ऐसा कुछ भी उपलब्ध नहीं, मेरा व्रत इश्वर के लिए कतई नहीं, न ही ईश्वर के प्रकोप से मै भयभीत होने वाला मै आदमी हू, पर प्रायः मुझसे झूठ न बोलने वाली मेरी पत्नी, जब झूठ बोल कर मुझे व्रत रखने की कोशिश कर सकती है, तो क्या मुझे उसकी इस कोशिश को सफल होते देखने के सुख से वंचित करना चाहिए ?

मेरी माँ भी, ऐसी ढेर सारी कोशिशे करती थी ...!

(शायद धर्म के "धारयति सः धर्मम" का मर्म यही रहा होगा !)

बच्चे जो सुनते है ...!

बच्चे जो सुनते है,
वही याद कर लेते है|

वो याद कर लेते है,
सुन-सुन कर एक इतिहास
जो कभी घटा ही नहीं
उनके जहन में नक्स हो जाती है,
वो अपराधी सूरते,
जिनका अपराध से,
दूर दूर तक, कोट नाता नहीं होता|

बच्चे सुन-सुन कर
याद कर लेते है
अपने उद्धारकों के चेहरे |
जिन्होंने
उनके हांथो में कटोरे थमाये,
उनके निवाले छीन कर,
ख़ुद के महल बनाये|
और, ना जाने कितने बचपन की,
पूरी उमर के मानी,
बस बचपन तक ही,
रख डाला |

बच्चो ने सुना
और याद कर ली,
काफिर पहचान|
चीन्हने लगे,
मुर्गी की शुतुरमुर्गी चाल,
आदमी बैताल |

बच्चे जो सुनते है,
वही याद कर लेते है |
यह बात...
बच्चो को नहीं पता,
और
हम सब के लिए
लगभग बेपता होती है|
पर...
जिन्हें बच्चो के करीब भी
नहीं फटकना चाहिए !
उन्हें यह,
बहुत अच्छे से पता है !
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कश्यप किशोर मिश्र
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धन्यवाद Shayak Alok को
सन्दर्भ ;- एक बच्चा बोलता है कि हेडमास्टरनी जी ने जहर मिला दिया था .. दूसरा बच्चा टोकता है उसे - नहीं, नीतीश कुमार जहर मिलाया .. तीसरा कहता है नीतीश को जेल भेजने के लिए विरोधी जहर मिला दिया ..."बच्चे जो सुनते हैं उसे याद कर लेते हैं"|
 

किसी भी शायर ने आज तक "ख़ुद" कभी नहीं लिखा !

निदा फ़ाजली साहब का एक शेर है;-
"मेरे जैसा आदमी, मेरा ही हमनाम 
उल्टा सीधा वो करे, मै होऊ बदनाम "
तो निदा साहब तौबा-तौबा करते रहते है और उनके ये नामालूम हमशक्ल और हमनाम साहब आकर कभी "मस्जिदों से उठ उठ के नमाजी चले गए" पढ़ आते है, तो कभी "मस्जिद आलीशान" को देख, "एक अकेले के लिए इनता बड़ा मकान ?" पूछने लगते है |
बशीर बद्र ने भी एक आदमी में अनेक आदमी होने की बात की है ...

लिहाजा वाकई में, तो दुनिया के सारे के सारे दीवान उन शायरों के हमशक्ल और हमनाम लोगों ने ही लिखे है, पर वो तो लिख कर गायब हो जाते है, लिहाजा हम उनकी बची शक्ल और नाम वाले आदमी को उनका असल शायर मान बैठते है ...

यही वजह थी कि, फ़िराक भी, अल्ल सुबह फजिर की नमाज के समय उठते तो "फ़िराक, अक्सर बदल कर भेष, फिरता है कोई काफ़िर" कह आईने में ख़ुद को देखकर तस्दीक कर लेते, हाँ ! ये वही भेष बदला काफ़िर है, और नमाज अदा करने की बजाय, लम्बे हो रहते, बाद में मुसलमान बन आठ बजे उठते |(अब यह मत पूछियेगा ये रघुपति सहाय कौन था ?) ऐसे ही उस काफ़िर ग़ालिब ने "बैल है, तभी तो मस्जिद में जा रहा है" कह कर मियां ग़ालिब को शर्मिंदा किया था |

यहाँ तक तो चलो, सब ठीक ठाक था, पर एक रात शायरों के हमनाम और हमशकल एक ऐसे ही शख्स ने, जो "मुहम्मद अल्वी" साहब के साथ साथ रहता है, लिख मारा और ख़ुद गायब हो गया, कि ;-
अगर तुझको फुर्सत नहीं तो ना आ, मगर एक अच्छा नबी, भेज दे
क़यामत के दिन खो ना जाएँ कहीं, ये अच्छी घडी है, अभी भेज दे|
इसे लिखने के सत्रह साल बाद जाकर जब चिल्ल पों मची, तो मुहम्मद अल्वी साहब ने ख़ुद को इस शेर की वल्दियत से अलग कर दिया, अब ये शेर जामा मस्जिद की सीढियों पे अनाथ होने के बाद बैठ कर, आते जाते हर नमाजी में अपने पिता को ढूढ़ता फिरता है और जनाब शाही इमाम से इसका जब भी साबका होता है, जनाब शाही इमाम पता नहीं क्यों गीदड़ हो जाते है, सोचता हूँ इस अनाथ शेर को JNU का पता देकर Khurshid सर के पास भेज दूँ ...

वैसे जनाब मुहम्मद अल्वी साहब का यह हमशक्ल और हमनाम चुपके से आकर एक रात फिर लिख गया, कि
"गिराना ही है तो मिरी बात सुन
मैं मस्जिद गिराऊँ तू मंदिर गिरा"
ये अलग बात है, कि अभी भी हम इसे उनका ही शेर मान रहे है, जबकि मुझे पक्का पता है, इसे लिखने वाला और एक और नबी भेजने वाले शेर को लिखने वाला आदमी एक ही है !

तो मेरी नजर में सारे के सारे दीवान नामालूम लोगों के ही है, ये अलग बात है कि उनकी गैर-मौजूदगी की वजह से हम उनके घर बने उन जैसे हमशक्ल और हमनाम लोगों को उनका शायर मान बैठते है ... 

मलाला अगर ड्रोन हमले में मारी जाती तो...?

हममे से कितनो को पता है, कि इराक और अफगानिस्तान में अमरीकी फौजो ने डीप्लेटेड युरेनियम का इस्तेमाल बमों में किया था ? आतंक के विरुद्ध युद्ध के समर्थन के नाम पर मचाये अमरीकी आतंक हमारी सवेदना से परे रहते है | दुनीया भर से अमरीका घुमने गए लोग औए साथ -साथ अमरीकी लोगों के लिए "ग्राउंड जीरो" आतंकवाद के क्रूर चेहरे की एक विलासितापूर्ण नुमाइश है, क्या जापान की हिरोशिमा -नागासाकी भी आतंकवाद की ही और उससे कई गुना ज्यादा क्रूर नुमाइश नहीं है ? क्या समूचा का समूचा अफगानिस्तान और इराक बेशर्म और बर्बर अमरीकी आतंकवादी गतिविधियों का बनाया ग्राउंड जीरो नहीं है ?

अमरीका महत्वपूर्ण है, स्नोडेन नहीं ! ब्लादिमीर पुतिन जो रूस के सोवियत युग की बची-खुची अकांछा के अकेले बचे प्रतिनिधि नजर आते है, इस बयान के साथ अमरीका के साथ साथ रूसी जनता को भी आश्वस्त करते है, नहीं घबराओ नहीं, हम अमरीका के ही साथ है, अमरीका, जो आज की दुनियाभर की मरीचिकाओ का प्रोजेक्टर है, उसका खुश रहना जरुरी है |

...और यहाँ अमरीका के मानी, वहाँ के असली निवासी रेड-इन्डियन वाला या उनको भी साथ लेकर चलने वाला अमरीका नहीं, वह अमरीका है, जो आक्रान्ता अप्रवासियो;- जिन्होंने मूल-निवासी रेड इन्डियन की हत्या की, उन्हें गुलाम बनाया और अमरीकी भूभाग पर जबरी कब्ज़ा किया;- का प्रतिनिधित्व करता है और यहाँ आप बराक ओबामा के चेहरे के धोखे में न पड़े, उनका चेहरा बस एक लिफ़ाफ़ा है, जिसका असल सामान से कोई सम्बन्ध नहीं |

अमरीका और ब्रिटेन ने मलाला युसुफजई को हाथो हाथ लिया, बीबीसी ने उसकी डायरी प्रकाशित कर कर के उसे एनी फ्रेक बना देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, पर मलाला की तरह ही न जाने उसकी कितनी बहने, अमरीकी बमबारी में मारी गई, दुनिया भर में, और अफ़गानिस्तान तथा इराक में आज भी यह बदस्तूर जारी है...!

मलाला, ने बेशक, तालिबान के नक़ाब नोच फ़ेंके, बहुत खूब, पर जो मुह उसकी वाह-वाही में लगे है, नकाबपोश वो भी है, उनके चेहरों पे भी, मलाला युसुफजई की बहनों के खून के धब्बे है !

लोकतंत्र का मर्सिया और डुगडुग मदारी कम्युनिष्ट !

लोकतंत्र का मर्सिया पढ़ते छद्म बुद्धिजीवी, पूजीवाद की हाय हाय करते, माओ की पूजीवादी संतानों की चाकरी करते, भारत नाम के राष्ट्र राज्य की अवधारणा पर जब तब सवाल उठा कर, अपने जैसे मानसिक गुलामों की ही वाह वाह से आत्म मुग्ध भारत से बाहर बैठ कर, भारत की बात करते उनके गुलाम, या धर्म को घोर अनैतिक बताते हुए नास्तिकता को अपना धर्म के बुनियादी मानव मूल्यों की कभी भी चर्चा न कर अपने जनवादी शासक में समस्त मानवीय मूल्य होने के प्रपंच का पिंगल पढ़ते, हमारे परम ज्ञानी मित्र गण;
क्या आज की तारीख में, आपके पास कोई बस एक उदाहरण समूची दुनिया से है जहाँ :- संविधान एक समाजवादी समाज के निर्माण के लिए है और संविधान, कानून, अदालत और पुलिस का उपयोग जनता भी कर सकती है, और अत्याचारियों को सजा दिला सकती है? शासक वर्ग अपनी सत्ता का दुरूपयोग नहीं करता है ! जनता जिस कानून और मशीनरी का उपयोग करती है उसे सरकारे शसक्त करती है ! उन अदालतों और फोरम को ताकतवर बनाया जाता है, जो जनता के हित से जुड़े होते है ?

इस उदाहरण में आप लोकतंत्र , सैनिक तानाशाही , राजतन्त्र और हाँ सर्वहारा तंत्र (कम्युनिज्म) को भी शामिल कर सकते है !!!

कोई शाब्दिक बाजीगरी नहीं, बस हाँ या ना !!!

...अगर आपके पास इसका कोई जबाब नहीं, तो जनाब हम एक काल्पनिक दुनिया की बात पर, और उसपे भी तब , जब कि, आप सब अबतक यह ही नहीं तय कर पाए की स्टालिन सही है, या माओ या ट्राटस्की तो बस एक शब्दों के भरम पर, आपके प्रयोग के गिनी-पिग क्यों बने ? पिछले एक सदी में कम्यूनिस्टो ने अपने भ्रमजाल को बनाये रखने के लिए, जितना खून बहाया है, उसकी समझ के लिए लोकतंत्र के विरोधियों को किसी यंत्रणा शिविर में रख कर समझाने की जरुरत नहीं !

कम्युनिज्म के नाम पर, बीती सदी में, जितने भी सर्कस सजाये गए, वो आदमी को बस ज़ोकर बनाते और समझते रहे और शासक वहाँ रिंग मास्टर बने रहे ! बड़ी खूबसूरती से नारों को कम्युनिष्टो ने विचारधारा बना दिया, झंडे को भगवान, डंडे नियंत्रक शक्ति बन गए और, जिस सर्वजन की बात कर वो सत्ता में आते रहे, उन्ही में से कुछ को बाकी का "दुश्मन" बना कर, एक बर्बर युद्ध अपने ही लोगों से करते, अपनों का ही खून बहाते और खुद ही भविष्य में "जनता की जनवादी तानाशाही" का सपना दिखाते, अपने कृत्य के लिए "वाह रे हम !" कहते रहे |

मै तमाम बुराइयों के साथ भी, अपने लोकतंत्र का समर्थक हूँ, और हाँ, आप लोग डुगडुगी भी बजाये, डुगडुगी ! मदारियों के साथ वही फबती है !!!

क्या इशरत जहाँ आतंकवादी थी ?

व्यक्तिगत तौर पर, अबतक की रिपोर्ट और जाँच के आधार पर, मै मानता हूँ, कि इशरत जहाँ वाली मुठभेड़ फर्जी थी, पर जिस सवाल का जबाब मुझे आज तक नहीं मिला, वह यह कि क्या इशरत जहाँ, आतंकवादी थी अथवा आतंकवादियों से उसकी सांठ गाँठ थी, अथवा नहीं ?
दुर्भाग्य से, इस पूरे प्रकरण में दो पक्ष बन गए है, एक वो, जो इस मामले में नरेन्द्र मोदी को संलिप्त मान के या करके नरेन्द्र मोदी को हत्यारा - हत्यारा कहे जा रहे है और इशरत जहाँ और उसके साथ हत तीन लोगों को एक दम निःदोष साबित करने पर तुले हुए है, तो दूसरी तरफ इसका विरोधी पक्ष अपनी दलीलों में इशरत जहाँ पर, उसके चरित्र पर और उसके आतंकवादियों से संलिप्तता पर जोर-शोर से सवाल उठा कर, कथित मुठभेड़ की इस घटना को औचित्यपूर्ण साबित करने पर तुला हुआ है |

पर वास्तव में इस समूचे प्रकरण पर उठाये जाने वाले सारे सवाल और उसके दिए जा रहे जबाब, चाहे वो किसी भी तरफ से हो, बस लोगों को भरमाने की कोशिश है, दोनो तरफ के लोग “झूठे-झूठे” तथ्य परोसने में एक दूसरे को मात देने में लगे है, और अपनी अपनी प्रतिबध्ताओ की वजह से, बजाय की झूठ के पीछे के सच को सामने लाने के, एक तरफ मोदी विरोधी, मुठभेड़ की झूठी कहानी में ख़ूब सारे और झूठ जोड़ –जोड़ कर उसे एक बड़ा और बहुत बड़ा झूठ बताने में लगे है तथा एक अपराध को इतना जादा अतिरंजित करने की कोशिश में लगे है, जिससे सामान्य जन की भावनाओं को भड़का कर या आहत कर के वो अपना फायदा लूट सके, भले ही इस कोशिश में असली अपराधी, अंततः इन गढ़े झूठो की सत्यता पर सवाल खड़े कर बच निकले, तो दूसरी तरफ मोदी समर्थक पक्ष इशरत जहाँ के व्यक्तिगत चरित्र पर उसकी आतंकवादियों से संलिप्तता पर सबूत देने में, एफ बी आई को मात देने में लगे है, पर एक जिम्मेदार नागरिक के नाते इस समूचे प्रकरण से जुड़े असली सवाल कुछ और है, जिन्हें जान – बुझकर अनदेखा किया जा रहा है, क्योकि असली सवालो के जबाब, असल अपराधी को दण्ड तो दिला देंगे पर, इस प्रकरण पर राजनीति करने वालों के मंसूबे को पस्त कर देंगे, लिहाजा जो सवाल वाकई उठने चाहिए, उनकी बजाय बस भावनाओं को आहात करने का खेल खेला जा रहा है |

बेहद सीधे और सपाट तरीके से, इस समूचे प्रकरण में, जो बुनियादी सवाल है, वो यह है ;-
क्या मुठभेड़ असली थी ? अगर नहीं तो इसमें शामिल लोगों का इस मुठभेड़ की घटना के पीछे क्या उद्देश्य था ? क्या उक्त प्रकरण में नरेन्द्र मोदी की सीधे –सीधे कोई संलिप्तता थी अथवा क्या उक्त घटना की उनको पूर्व जानकारी थी ? क्या उक्त मुठभेड़ में गुजरात पुलिस और किसी अन्य सरकारी एजेंसी की भी संलिप्तता थी ? क्या चारो के चारो आतंकवादी थे ? अगर हाँ तो अतीत में उनकी गतिविधियाँ क्या –क्या थी ? अगर सभी आतंकवाद से नहीं जुड़े थे, तो क्या उनमे से कुछ की हत्या सिर्फ साथ होने की वजह से की गयी ?

बेहद बुनियादी इन सवालों के जबाब से सभी बच रहे है | साथ ही, इस समूचे प्रकरण में कई सवाल खड़े हुए है, मसलन ;-
= अगर “सीबीआई” इशरत और उसके तीन साथियों को निर्दोष मानती थी, तो पूर्व में उसने उन सभी के आतंकवादी होने का हलफ़नामा क्यों दिया ?
= अगर गुजरात पुलिस और विशेष जाचं दल के साथ –साथ “आईबी” भी इस प्रकरण में शामिल थी, तो एक केन्द्रीय एजेंसी होने के नाते, तत्कालीन केंद्र सरकार इस घटना से अनभिज्ञ कैसे थी ?
= अगर शाजिश के सूत्र नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक जाते है, तो चार्ज शीट में उनका नाम क्यों नहीं है ?
= अगर नौ साल के बाद भी, “सिबीआइ” मोदी और शाह के विरुद्ध सबूत ढूढने में नाकाम रही, तो पूरक चार्जशीट में उनके नाम शामिल हो सकते है, जैसे शगूफे क्या राजनितिक हानि-लाभ के आधार पर तो नहीं दिए जा रहे ?
= “सीबीआई” ने अपनी समूची चार्जशीट में इशरत या उसके साथियों के आतंकवादी होने, आतकवादियो से संपर्क होने, लश्कर या ऐसी ही किसी एजेंसी से उसके सम्बन्ध होने जैसी बातों पर एकदम चुप्पी साध रखी है, क्यों ?
= “सीबीआई” की समूची चार्जसीट में “एफ़ बी आई” को डेविड कोलमैन हेडली के इकबालिया बयान का कोई सन्दर्भ नहीं, क्यों ?

लिहाजा यह बेहद जरुरी हो जाता है, की उक्त समूचे प्रकरण पर हम किसी भी निष्कर्ष पर न पहुचे और इस समूचे प्रकरण को हमारी सरकारों की एक और नौटंकी मात्र मान ले , यह बहुत जरुरी है की हम अपने को इस सरकारी तमाशे में न उलझा कर, बेवजह बहस, तर्क-वितर्क में लगे रह कर उन बेहद बुनियादी सवालों से भटक जाए, जिनको पूछा जाना, जिनका उठाया जाना बहुत ज़रूरी है !

... “सीबीआई” ने एक और चार्जशीट दाख़िल की है, जिसमे कांग्रेस के एक दागी पवन बंसल का भी नाम नहीं है !!!