Saturday, August 24, 2013

प्रेमचंद्र और उनकी प्रगतिशीलता ...

प्रेमचंद को कम्युनिष्ट मानने वालों का कहना है कि उनपर सोवियत रूस की क्रांति का असर था और ऐसा लगता है कि वे रुसी क्रांति से प्रभावित थे, टॉल्स्टॉय उन्होंने पढ़ रखा था और वे प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष भी थे लिहाजा ये सारी बातें उनके वामपंथी रूझान को साफ करती है |

पर प्रेमचंद की लेखकीय प्रगतिशीलता का आशय, समाज की रुढियो से मुक्त सोच से था,1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा भी था कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है वह लेखक नहीं है।

प्रेमचंद कभी भी गाँधी की विचारधारा से अलग नहीं हुए, हां उन्होंने रूस की तारीफ़ जरूर की थी, लेकिन रूस के संबंध में मुंशी प्रेमचन्द की राजनीतिक समझ की कमी थी जैसा कि उस समय बहुत सारे लोगों के साथ थी, यह बात उनके जोसेफ स्टालिन की प्रशंसा करते लिखे लेख से भी स्पष्ट हो जाती है |

उनकी जीवनी में इस बात का ज़िक्र मिलता है, कि नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद चरखा, स्वदेशी और स्वराज के प्रचार में लग गए थे |गोरखपुर से लमही जाकर उन्होंने चरखे बनवाकर भी बाँटे | इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि सन् 1930 में जब वह लखनऊ के अमीनुद्दौला पार्क में रहते थे तो नमक क़ानून के खिलाफ सत्याग्रह करने वालों को अपने हाथ से कुर्ता और टोपी पहनाकर रवाना करते थे |

प्रेमचंद के लिए प्रगतिशील होने का तात्पर्य सांप्रदायवाद, जातिवाद, छूआछूत और स्त्रियों की स्वाधीनता से था, यही वजह थी की वह आर्य समाज से अत्यंत प्रभावित थे और 1906 में उन्होंने एक विधवा शिवरानी देवी से अपना दूसरा विवाह किया |

यहाँ यह भी ध्यान रखने की बात है, कि 1934 में प्रेमचंद बम्बई गए थे और वहाँ से उकता कर पुनः बनारस भाग आये, आने के पश्चात् पत्नी शिवरानी देवी ने उनसे कांग्रेस के टिकट पर काउंसिल चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा, लेकिन प्रेमचन्द ने इसे नामंजूर कर दिया और कहा,"मेरा काम काउंसिल में काम करने वालों की समालोचना करना हैं." ध्यान दे प्रस्ताव कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का था |

लिहाजा कम से कम जैसा की दावा किया जा रहा है , उस लिहाज से प्रेमचंद वामपंथी नहीं थे, हां वामपंथ से प्रभावित जरुर थे और अंत तक वो गांधीवादी रहे |

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