Saturday, August 24, 2013

किसी भी शायर ने आज तक "ख़ुद" कभी नहीं लिखा !

निदा फ़ाजली साहब का एक शेर है;-
"मेरे जैसा आदमी, मेरा ही हमनाम 
उल्टा सीधा वो करे, मै होऊ बदनाम "
तो निदा साहब तौबा-तौबा करते रहते है और उनके ये नामालूम हमशक्ल और हमनाम साहब आकर कभी "मस्जिदों से उठ उठ के नमाजी चले गए" पढ़ आते है, तो कभी "मस्जिद आलीशान" को देख, "एक अकेले के लिए इनता बड़ा मकान ?" पूछने लगते है |
बशीर बद्र ने भी एक आदमी में अनेक आदमी होने की बात की है ...

लिहाजा वाकई में, तो दुनिया के सारे के सारे दीवान उन शायरों के हमशक्ल और हमनाम लोगों ने ही लिखे है, पर वो तो लिख कर गायब हो जाते है, लिहाजा हम उनकी बची शक्ल और नाम वाले आदमी को उनका असल शायर मान बैठते है ...

यही वजह थी कि, फ़िराक भी, अल्ल सुबह फजिर की नमाज के समय उठते तो "फ़िराक, अक्सर बदल कर भेष, फिरता है कोई काफ़िर" कह आईने में ख़ुद को देखकर तस्दीक कर लेते, हाँ ! ये वही भेष बदला काफ़िर है, और नमाज अदा करने की बजाय, लम्बे हो रहते, बाद में मुसलमान बन आठ बजे उठते |(अब यह मत पूछियेगा ये रघुपति सहाय कौन था ?) ऐसे ही उस काफ़िर ग़ालिब ने "बैल है, तभी तो मस्जिद में जा रहा है" कह कर मियां ग़ालिब को शर्मिंदा किया था |

यहाँ तक तो चलो, सब ठीक ठाक था, पर एक रात शायरों के हमनाम और हमशकल एक ऐसे ही शख्स ने, जो "मुहम्मद अल्वी" साहब के साथ साथ रहता है, लिख मारा और ख़ुद गायब हो गया, कि ;-
अगर तुझको फुर्सत नहीं तो ना आ, मगर एक अच्छा नबी, भेज दे
क़यामत के दिन खो ना जाएँ कहीं, ये अच्छी घडी है, अभी भेज दे|
इसे लिखने के सत्रह साल बाद जाकर जब चिल्ल पों मची, तो मुहम्मद अल्वी साहब ने ख़ुद को इस शेर की वल्दियत से अलग कर दिया, अब ये शेर जामा मस्जिद की सीढियों पे अनाथ होने के बाद बैठ कर, आते जाते हर नमाजी में अपने पिता को ढूढ़ता फिरता है और जनाब शाही इमाम से इसका जब भी साबका होता है, जनाब शाही इमाम पता नहीं क्यों गीदड़ हो जाते है, सोचता हूँ इस अनाथ शेर को JNU का पता देकर Khurshid सर के पास भेज दूँ ...

वैसे जनाब मुहम्मद अल्वी साहब का यह हमशक्ल और हमनाम चुपके से आकर एक रात फिर लिख गया, कि
"गिराना ही है तो मिरी बात सुन
मैं मस्जिद गिराऊँ तू मंदिर गिरा"
ये अलग बात है, कि अभी भी हम इसे उनका ही शेर मान रहे है, जबकि मुझे पक्का पता है, इसे लिखने वाला और एक और नबी भेजने वाले शेर को लिखने वाला आदमी एक ही है !

तो मेरी नजर में सारे के सारे दीवान नामालूम लोगों के ही है, ये अलग बात है कि उनकी गैर-मौजूदगी की वजह से हम उनके घर बने उन जैसे हमशक्ल और हमनाम लोगों को उनका शायर मान बैठते है ... 

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