लोकतंत्र का मर्सिया पढ़ते छद्म बुद्धिजीवी, पूजीवाद की हाय हाय करते, माओ की पूजीवादी संतानों की चाकरी करते, भारत नाम के राष्ट्र राज्य की अवधारणा पर जब तब सवाल उठा कर, अपने जैसे मानसिक गुलामों की ही वाह वाह से आत्म मुग्ध भारत से बाहर बैठ कर, भारत की बात करते उनके गुलाम, या धर्म को घोर अनैतिक बताते हुए नास्तिकता को अपना धर्म के बुनियादी मानव मूल्यों की कभी भी चर्चा न कर अपने जनवादी शासक में समस्त मानवीय मूल्य होने के प्रपंच का पिंगल पढ़ते, हमारे परम ज्ञानी मित्र गण;
क्या आज की तारीख में, आपके पास कोई बस एक उदाहरण समूची दुनिया से है जहाँ :- संविधान एक समाजवादी समाज के निर्माण के लिए है और संविधान, कानून, अदालत और पुलिस का उपयोग जनता भी कर सकती है, और अत्याचारियों को सजा दिला सकती है? शासक वर्ग अपनी सत्ता का दुरूपयोग नहीं करता है ! जनता जिस कानून और मशीनरी का उपयोग करती है उसे सरकारे शसक्त करती है ! उन अदालतों और फोरम को ताकतवर बनाया जाता है, जो जनता के हित से जुड़े होते है ?
इस उदाहरण में आप लोकतंत्र , सैनिक तानाशाही , राजतन्त्र और हाँ सर्वहारा तंत्र (कम्युनिज्म) को भी शामिल कर सकते है !!!
कोई शाब्दिक बाजीगरी नहीं, बस हाँ या ना !!!
...अगर आपके पास इसका कोई जबाब नहीं, तो जनाब हम एक काल्पनिक दुनिया की बात पर, और उसपे भी तब , जब कि, आप सब अबतक यह ही नहीं तय कर पाए की स्टालिन सही है, या माओ या ट्राटस्की तो बस एक शब्दों के भरम पर, आपके प्रयोग के गिनी-पिग क्यों बने ? पिछले एक सदी में कम्यूनिस्टो ने अपने भ्रमजाल को बनाये रखने के लिए, जितना खून बहाया है, उसकी समझ के लिए लोकतंत्र के विरोधियों को किसी यंत्रणा शिविर में रख कर समझाने की जरुरत नहीं !
कम्युनिज्म के नाम पर, बीती सदी में, जितने भी सर्कस सजाये गए, वो आदमी को बस ज़ोकर बनाते और समझते रहे और शासक वहाँ रिंग मास्टर बने रहे ! बड़ी खूबसूरती से नारों को कम्युनिष्टो ने विचारधारा बना दिया, झंडे को भगवान, डंडे नियंत्रक शक्ति बन गए और, जिस सर्वजन की बात कर वो सत्ता में आते रहे, उन्ही में से कुछ को बाकी का "दुश्मन" बना कर, एक बर्बर युद्ध अपने ही लोगों से करते, अपनों का ही खून बहाते और खुद ही भविष्य में "जनता की जनवादी तानाशाही" का सपना दिखाते, अपने कृत्य के लिए "वाह रे हम !" कहते रहे |
मै तमाम बुराइयों के साथ भी, अपने लोकतंत्र का समर्थक हूँ, और हाँ, आप लोग डुगडुगी भी बजाये, डुगडुगी ! मदारियों के साथ वही फबती है !!!
क्या आज की तारीख में, आपके पास कोई बस एक उदाहरण समूची दुनिया से है जहाँ :- संविधान एक समाजवादी समाज के निर्माण के लिए है और संविधान, कानून, अदालत और पुलिस का उपयोग जनता भी कर सकती है, और अत्याचारियों को सजा दिला सकती है? शासक वर्ग अपनी सत्ता का दुरूपयोग नहीं करता है ! जनता जिस कानून और मशीनरी का उपयोग करती है उसे सरकारे शसक्त करती है ! उन अदालतों और फोरम को ताकतवर बनाया जाता है, जो जनता के हित से जुड़े होते है ?
इस उदाहरण में आप लोकतंत्र , सैनिक तानाशाही , राजतन्त्र और हाँ सर्वहारा तंत्र (कम्युनिज्म) को भी शामिल कर सकते है !!!
कोई शाब्दिक बाजीगरी नहीं, बस हाँ या ना !!!
...अगर आपके पास इसका कोई जबाब नहीं, तो जनाब हम एक काल्पनिक दुनिया की बात पर, और उसपे भी तब , जब कि, आप सब अबतक यह ही नहीं तय कर पाए की स्टालिन सही है, या माओ या ट्राटस्की तो बस एक शब्दों के भरम पर, आपके प्रयोग के गिनी-पिग क्यों बने ? पिछले एक सदी में कम्यूनिस्टो ने अपने भ्रमजाल को बनाये रखने के लिए, जितना खून बहाया है, उसकी समझ के लिए लोकतंत्र के विरोधियों को किसी यंत्रणा शिविर में रख कर समझाने की जरुरत नहीं !
कम्युनिज्म के नाम पर, बीती सदी में, जितने भी सर्कस सजाये गए, वो आदमी को बस ज़ोकर बनाते और समझते रहे और शासक वहाँ रिंग मास्टर बने रहे ! बड़ी खूबसूरती से नारों को कम्युनिष्टो ने विचारधारा बना दिया, झंडे को भगवान, डंडे नियंत्रक शक्ति बन गए और, जिस सर्वजन की बात कर वो सत्ता में आते रहे, उन्ही में से कुछ को बाकी का "दुश्मन" बना कर, एक बर्बर युद्ध अपने ही लोगों से करते, अपनों का ही खून बहाते और खुद ही भविष्य में "जनता की जनवादी तानाशाही" का सपना दिखाते, अपने कृत्य के लिए "वाह रे हम !" कहते रहे |
मै तमाम बुराइयों के साथ भी, अपने लोकतंत्र का समर्थक हूँ, और हाँ, आप लोग डुगडुगी भी बजाये, डुगडुगी ! मदारियों के साथ वही फबती है !!!
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