Saturday, August 24, 2013

...औरत !

प्रेम ने , वात्सल्य ने और उन सभी गुणों ने, जिन्हें समाज स्त्रेण कहता है, समाज को सभ्य बनाने में सर्वाधिक मदद पहुचायी है | मनुष्य की बर्बर हिंसक प्रविर्ति ने कभी किसी सभ्यता को विकसित नहीं किया, हां सभ्यताओं को नष्ट ज़रूर किया, शक यवन, हूण, तातार लड़ाके थे, लूटमार करते थे, और इनके पास काफी सारी सम्पदा थी, पर इनकी किसी विकसित सभ्यता के प्रमाण हमारे पास मौजूद नहीं है |
अतीत में, जिन समाजों में, स्त्री अगुवाई कर रहीं थी, सभ्यताए वही विकसित हुई, पर कालान्तर में, इन सभ्यताओं ने स्त्री को "मातृदेवी" बना कर, अथवा "कामरूपा" बना कर चहारदिवारी के भीतर कर दिया और खुद इनकी नियंता बन गयी |
स्त्री की स्वभाव की कोमलता, दयालुता, समर्पण भाव का इस्तेमाल कर स्त्री को निरुद्ध कर दिया गया और पुरुष समाज की दिशा-निर्देशक ताकत की अगुवाई करने लगा, जिसे एक क्षद्म नाम दिया गया "पुरुषार्थ" !
बदलते वक़्त के साथ, स्त्री और उसकी भुमिका बदली पर उसकी अधिकतम सीमा "सह-चरी" पर आ कर रुक गयी, जबकि स्त्री समाज के बाकी आधे हिस्से के मुकाबले, जादा समर्थ, जादा जिम्मेदार और जादा सहिष्णु है |
...और आज, एक स्त्री जो जननी है, अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़ने को मजबूर है, इस लड़ाई को वह सबसे लड़ेगी, उनसे भी जिनसे उसे नफरत है और उनसे भी जिन्हें वो बेइंतिहा प्यार करती है, उसकी लड़ाई जारी है और आगे भी जारी रहेगी, सबसे उस समाज से, जो उसपर पाबंदियो की बात करता है और विद्रोहिनी स्त्री पर लानते भेजता है, और साथ ही उस घर से भी, जिसे मकान से घर वो खुद बनाती है |
पर अंतत ...! स्त्री हमेशा हार जाती रही है, अपने ही जने से ! एक औरत के भीतर बैठी "माँ" उसे अपने बेटे को दुलारते तो स्वीकारती है, पर अपनी मुक्तियात्रा के एक अवरोध के रूप में अपने बेटे को स्वीकार नहीं पाती, लिहाजा एक औरत के चेतन मुक्ति शंघर्ष में, बेशक दुनिया के सारे मर्दों से लड़ने की बात हो, पर उस औरत का अवचेतन, बेटे को उस युद्ध में एक मर्द के रूप में नहीं देख पाता !
...कुल मिला कर,यह एक बहुत अच्छी बात है, मर्दों और उनके अहंकार से युद्धरत एक स्त्री, बुनियादी रूप से एक माँ है, जो झाँसी की रानी भी है और पीठ पर अपने बेटे को बांधे, साथ-साथ ही, एक माँ भी है |
तो एक औरत के लिए अपने मुक्ति संघर्ष के दौरान यह बहुत जरुरी है, की एक तरफ तो वह अपने गैर बराबरी के विरुद्ध लड़ेगी तो दूसरी तरफ़ अपने बेटे को औरतों की इस गैर बराबरी के विरुद्ध तैयार भी करेगी ! यह तैयारी, औरत की आज की मुक्तियात्रा के किसी भी पड़ाव से बड़ा पड़ाव होगी |
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सन्दर्भ ; बहन Manisha Pandey का स्टेटस ;-

हर इतिहास, हर दर्शन, हर राजनीति में औरत द्वितियक है और इसे समझना जरा भी कठिन नहीं, आप नहीं समझ रहे लिहाजा इसे हल्का कर रहे हैं, कुतर्क कर रहे हैं और फिर उम्‍मीद कर रहे हैं कि आपकी नीयत पर भी शक न किया जाए। क्‍यों?
सबकी लड़ाई के साथ औरतों की लड़ाई अलग से भी लड़ी जाएगी। आप ही से लड़ेंगे। बाप से लड़ेंगे, पति से लड़ेंगे, भाई से लड़ेंगे, साथी कॉमरेडों से लड़ेंगे, आंदोलन के नेतृत्‍वकर्ताओं से लड़ेंगे। पार्टी महासचिव से लड़ेंगे। आपके संग मिलकर औरों के लिए तो लड़ेगे ही, लेकिन अलग से आपसे भी लड़ेंगे। आखिर आप भी तो ठहरे मर्द ही।
 

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