कम्युनिज्म विचारधाराए, एक वर्ग-विहीन और राज्य विहीन समाज की बात करती है, फिर शासक की अवधारणा कम्युनिष्टो में कैसे है ?
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आदिम, धार्मिक और यूटोपिया के कम्युनिज्म विचारधारा से इतर आधुनिक कम्युनिज्म का जनक कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स को मानते है, मार्क्स के अनुसार कम्युनिज्म में जनता को कोई नेता/ शासक नहीं होता, जनता अपने आप को "खुद शासित" (?) करती है, पर लेनिन ने इस विचार को दफ़न कर दिया, लेनिन का मानना था की जनता को "निर्देशित" करने के लिए, एक शासक संस्था (governing body ) का होना आवश्यक है, लेनिन के इस विचार ने दुनिया भर में कम्युनिष्ट शासको को, तानाशाह बनने का मार्ग प्रशस्त किया, जोसेफ स्टालिन रूस में लेनिन के तुरंत बाद एक क्रूर तानाशाह के रूप में सामने आया, चीन का कम्युनिष्ट शासन अपने शासक चरित्र में अत्यंत क्रूर है, उत्तर-कोरिया में तो किम परिवार का ही तानाशाही शासन है | क्यूबा में भी कास्त्रो के बाद, उसके छोटे भाई ने नियंत्रण सम्हाला हुआ है | वर्तमान कम्युनिष्ट राज्य अपने नागरिकों के किसी भी, विरोधी विचार को कतई सहन नहीं करते और बड़ी ही सख्ती से विरोध का दमन करते है |
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तो क्या शासक और शासित, कम्युनिज्म में" अपने आप में दो वर्ग नहीं ?
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कम्युनिज्म आदर्श रूप में, एक मुद्रा विहीन समाज की कल्पना करता है, जहाँ उत्पादन के सभी साधन का मालिक समाज होगा, ऐसा समाज जो न तो गरीब होगा, न अमीर और मशीनीकरण का लाभ एक मजदुर को सहूलियत के रूप में लिया जायेगा, न की अमीर के लाभ अर्जित करने के यंत्र के रूप में,चूकि उत्पादन के सारे साधनों पर समाज का (राज्य का नहीं ) अधिकार होगा और मुद्रा नहीं होगी, लिहाजा शासक सिर्फ एक ताकतवर मनुष्य होगा, शासक की हैसियत भी जनता के जनवादी प्रतिनिधि की होगी और एक कम्युनिष्ट समाज "जनता की जनवादी तानाशाही" होगा |
पर किसी भी कम्युनिष्ट राष्ट्र में जनता अत्यंत तुच्छ बनी रही, परंपरागत रूप से कम्युनिष्ट राज्यों ने, उत्पादन के अधिलाभ का इस्तेमाल जनता के बीच कर उनकी सुख शांति समृद्धि में अभिवृद्धि की बजाय, युद्ध के उपकरण और सैनिक साजोसामान पर बेइंतिहा खर्च किया, राष्ट्र विहीन समाज का सपना दिखाने वाले कम्युनिष्ट विचारधारा में राष्ट्र एक "पीड़क" प्रतीक है और शासक जल्लाद !
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...तो जनता की जनवादी तानाशाही ?
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मूर्खो के पास श्रम बल होता है, समझदार किसान बैल के आँखों के बगल ढक्कन लगा देता है, और सामने हरा चारा लटका देता है, बैल चारे के लिए बढ़ते है, चारा बैल के साथ-साथ आगे बढ़ता जाता है, किसान की बैलगाड़ी चलती रहती है, बैल को कितना और कब चारा देना है, यह किसान की मर्जी होती है, बैल अपने चारे तक खुद कभी नहीं पहुचता, "जनता की जनवादी तानाशाही" ऐसा ही चारा है, सबसे मिहनत कश लोग सबसे पहले बेवकूफ बने और कम्युनिष्ट बन गए, जो खुद नहीं बने, क्रांति की मारकाट से डर के बना दिए गए |
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आदिम, धार्मिक और यूटोपिया के कम्युनिज्म विचारधारा से इतर आधुनिक कम्युनिज्म का जनक कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स को मानते है, मार्क्स के अनुसार कम्युनिज्म में जनता को कोई नेता/ शासक नहीं होता, जनता अपने आप को "खुद शासित" (?) करती है, पर लेनिन ने इस विचार को दफ़न कर दिया, लेनिन का मानना था की जनता को "निर्देशित" करने के लिए, एक शासक संस्था (governing body ) का होना आवश्यक है, लेनिन के इस विचार ने दुनिया भर में कम्युनिष्ट शासको को, तानाशाह बनने का मार्ग प्रशस्त किया, जोसेफ स्टालिन रूस में लेनिन के तुरंत बाद एक क्रूर तानाशाह के रूप में सामने आया, चीन का कम्युनिष्ट शासन अपने शासक चरित्र में अत्यंत क्रूर है, उत्तर-कोरिया में तो किम परिवार का ही तानाशाही शासन है | क्यूबा में भी कास्त्रो के बाद, उसके छोटे भाई ने नियंत्रण सम्हाला हुआ है | वर्तमान कम्युनिष्ट राज्य अपने नागरिकों के किसी भी, विरोधी विचार को कतई सहन नहीं करते और बड़ी ही सख्ती से विरोध का दमन करते है |
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तो क्या शासक और शासित, कम्युनिज्म में" अपने आप में दो वर्ग नहीं ?
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कम्युनिज्म आदर्श रूप में, एक मुद्रा विहीन समाज की कल्पना करता है, जहाँ उत्पादन के सभी साधन का मालिक समाज होगा, ऐसा समाज जो न तो गरीब होगा, न अमीर और मशीनीकरण का लाभ एक मजदुर को सहूलियत के रूप में लिया जायेगा, न की अमीर के लाभ अर्जित करने के यंत्र के रूप में,चूकि उत्पादन के सारे साधनों पर समाज का (राज्य का नहीं ) अधिकार होगा और मुद्रा नहीं होगी, लिहाजा शासक सिर्फ एक ताकतवर मनुष्य होगा, शासक की हैसियत भी जनता के जनवादी प्रतिनिधि की होगी और एक कम्युनिष्ट समाज "जनता की जनवादी तानाशाही" होगा |
पर किसी भी कम्युनिष्ट राष्ट्र में जनता अत्यंत तुच्छ बनी रही, परंपरागत रूप से कम्युनिष्ट राज्यों ने, उत्पादन के अधिलाभ का इस्तेमाल जनता के बीच कर उनकी सुख शांति समृद्धि में अभिवृद्धि की बजाय, युद्ध के उपकरण और सैनिक साजोसामान पर बेइंतिहा खर्च किया, राष्ट्र विहीन समाज का सपना दिखाने वाले कम्युनिष्ट विचारधारा में राष्ट्र एक "पीड़क" प्रतीक है और शासक जल्लाद !
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...तो जनता की जनवादी तानाशाही ?
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मूर्खो के पास श्रम बल होता है, समझदार किसान बैल के आँखों के बगल ढक्कन लगा देता है, और सामने हरा चारा लटका देता है, बैल चारे के लिए बढ़ते है, चारा बैल के साथ-साथ आगे बढ़ता जाता है, किसान की बैलगाड़ी चलती रहती है, बैल को कितना और कब चारा देना है, यह किसान की मर्जी होती है, बैल अपने चारे तक खुद कभी नहीं पहुचता, "जनता की जनवादी तानाशाही" ऐसा ही चारा है, सबसे मिहनत कश लोग सबसे पहले बेवकूफ बने और कम्युनिष्ट बन गए, जो खुद नहीं बने, क्रांति की मारकाट से डर के बना दिए गए |
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