Saturday, August 24, 2013

एक निष्कर्ष बजरिये दो कथाए ...!

एक कहानी भाई Azhar Khan के स्टेटस से;-
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एक बार की बात है एक गाँव में चर्चा हो रही थी की दो और दो कितना होता है ? सभी ने कहा इस पर वोटिंग कराओ , गाँव के सभी लोगों ने वोट दिया की दो और दो पांच होते हैं सिवाए एक गांववाले के जिसका कहना था की दो और दो पांच किसी सूरत में नहीं हो सकते अगर ऐसा हुआ तो दुनिया के सारे नियम, सारे कायदे कानून ,सिद्धांत पलट जायेंगे | गाँव वालों ने उस से कहा की मूर्ख तू क्या नहीं जानता की 'लोकतंत्र' में जो बहुमत में होता है वही सच होता है बाकी सब झूठ ,उस अकेले गाँव वाले ने बहुत तर्क दिए, समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उन गाँव वालों को कुछ नहीं समझ आया बात आगे बढ़ने लगी ,गाँव वालों ने उस अकेले को धमकी दी की अगर आगे से तूने दो और दो चार बताया तो तुझे मृत्युदंड दिया जायेगा इससे वोह गाँव वाला डर गया और वोह गाँव छोड़ कर चला गया बस तभी से उस गाँव में अब दो और दो पांच होता है|
----लघु कथा कल्पना पर आधारित है और तथाकथित 'लोकतंत्र' की सचाई भी बताने का प्रयास है !
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एक कथा भाई Kashyap Kishor Mishra की उसके जबाब में ;-
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एक बार की बात है एक पोलित ब्यूरो में चर्चा हो रही थी की दो और दो कितना होता है ? छः -आठ दिन के गहन विचार मंथन के बाद यह तय हुआ कि सबकी राय इसपे अलग -अलग है, लिहाजा केन्द्रीय समिति ने निर्णय लिया दो और दो दस होते है , पोलित व्यूरो के कुछ सदस्यों की राय में दो और दो चार होते थे, लिहाजा उन्होंने केन्द्रीय समिति के राय से ना ईतिफाक जाहिर किया , उनका कहना था की दो और दो पांच किसी सूरत में नहीं हो सकते अगर ऐसा हुआ तो दुनिया के सारे नियम, सारे कायदे कानून ,सिद्धांत पलट जायेंगे ! केन्द्रीय कमिटी ने उन्हें समझाया की मूर्ख तू क्या नहीं जानता की 'साम्यवाद र' में जो केन्द्रीय कमिटी " कहती है वही सच होता है बाकी सब झूठ ,उन कुछ पोलित सदस्यों ने बहुत तर्क दिए, समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन केन्द्रीय कमिटी ने उन्हें नाफ़रमानी का दोषी मान "श्रम शिविर " में भेज दिया , जिससे उनके भीतर से लोकतंत्र वाली "वाद विवाद संवाद " वाली कुत्सित आदत छूट जाये और जो केन्द्रीय कमिटी का निर्णय वो सबका निर्णय के साथ वो रोबोट की तरह आदेश पालन कर सके !
-- लघु कथा कल्पना पर आधारित है और तथाकथित 'साम्यवाद ' की सचाई भी बताने का प्रयास है !
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कुछ निठल्लों का निष्कर्ष ;- व्यक्ति कभी भी अपने राग -द्वेष से मुक्त नहीं हो सकता, लिहाजा मानव संचालित किसी भी तंत्र में दोष रहेगे ही, पर व्यक्ति को भेड़-बकरी बनाने वाली व्यवस्थाओ के मुकाबले, मनुष्य की व्यक्तिगत पहचान और मानवीय गरिमा को सर्वाधिक सम्मान देने वाली व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ होती है, लिहाजा किसी भी शासन पद्धति के मुकाबले लोकतंत्र सर्व-श्रेष्ठ शासन पद्धति है !
 

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