Saturday, August 24, 2013

सावन का पहला सोमवार और एक नास्तिक व्रती ..!

आज की सुबह जरा व्यस्त रही और करीब साढ़े सात बजे जब मै सुबह की पहली चाय पी रहा था, मेरी पत्नी ने मुझे बताया आज सावन का पहला सोमवार है, उसे पता है, मै मंदिर नहीं जाता, पूजापाठ नहीं करता, कोई व्रत नहीं रखता पर उसने मुझसे सीधे सीधे बताया "आज आपका व्रत है, न " मैंने उसकी तरफ देखते हुए लगभग पूछा "व्रत...?" "मै कबसे व्रत रखने लगा ?" मेरी पत्नी ने बताया "आप पिछले साल भी व्रत थे, मेरे साथ ही" और फिर उसने मेरी तरफ से तय भी कर दिया "हम दोनों का आज व्रत है "|

घर से कार्यालय आते याद आया, बीते साल सावन के पहले सोमवार को हम जबकि खाम्भारखेडा थे, मेरी पत्नी पूरे परिवार के साथ लिलौटीनाथ का दर्शन करने गयी थी और मैंने दर्शन करने जाने या व्रत रखने से साफ मना कर दिया था और अपने लिए सबकी गैर-मौजूदगी में अपना भोजन खुद बनाया था|

...फिलवक्त प्लांट पे हू, यहाँ व्रत के लिहाज से कुछ खा सकू ऐसा कुछ भी उपलब्ध नहीं, मेरा व्रत इश्वर के लिए कतई नहीं, न ही ईश्वर के प्रकोप से मै भयभीत होने वाला मै आदमी हू, पर प्रायः मुझसे झूठ न बोलने वाली मेरी पत्नी, जब झूठ बोल कर मुझे व्रत रखने की कोशिश कर सकती है, तो क्या मुझे उसकी इस कोशिश को सफल होते देखने के सुख से वंचित करना चाहिए ?

मेरी माँ भी, ऐसी ढेर सारी कोशिशे करती थी ...!

(शायद धर्म के "धारयति सः धर्मम" का मर्म यही रहा होगा !)

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