Sunday, July 20, 2014

हर दिल अजीज़ "अज़ीम प्रेमजी "



अजीम हाशिम प्रेमजी का जन्म 24-जुलाई-1945 को बम्बई में हुआ था, विप्रो कारपोरेशन के अध्यक्ष अज़ीम भारतीय कार्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े दानकर्ता हैं, अबतक वो अपनी एक चौथाई से जादा संपत्ति दान कर चुके हैं    
स्टेनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग स्नातक कर रहे 21 साल के युवा अजीम प्रेमजी की पढ़ाई अभी बाकी थी, जब नियति ने उनकी सहज जीवन की राह बंद कर दी, पिता की मौत के साथ अज़ीम के पास विकल्प सिमित थे | पढ़ाई पूरी न कर पाने की कसक के साथ युवा अजीम ने अमरीका से वतन वापसी की और वनस्पति तेल के अपने पारिवारिक व्यवसाय की बागडोर थाम ली| 1966 में अजीम ने जब अपने व्यवसाय की बागडोर थामी तो उसका सालाना व्यवसाय 2 मिलियन डालर था, अजीम चाहते तो बड़ी आसानी से अपने व्यवसाय को दुनियादारी से चला सकते थे, पर प्रेमजी को आरामतलबी और समझौतापरस्ती स्वीकार नहीं थी|
भारत उस वक्त कोटे परमिट राज में था, जहाँ पामोलिन आयल जैसी आम जरूरत की वस्तु का कोटा भी देखते देखते आदमी को धनवान बना सकता था, पर अज़ीम प्रेमजी ने अलग राह चुनी, नौकरशाहों की खुशामद करने की बजाय अपने धंधे के गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित किया | उस वक़्त अचरज की बात थी, कि  इस स्तर पर कोई व्यवसायी नौकरशाही को खुश कर परमिट या लाइसेंस में अपना वक़्त जाया करने की बजाय, सीधे सीधे अपने ग्राहकों को उनकी अपेक्षा से भी बेहतर माल देने, ग्राहक और उत्पादक के बीच कम से कम बिचौलियों के जरिये, सबको जादा मुनाफा के सिधांत के साथ बाजार में उतर रहा हो|
पर अजीम को यहीं नहीं रुकना था, उन्होंने अपने व्यापार का प्रबंधन पूरीतरह पेशेवर रवैये से किया और देश के सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन और इंजीनिरिंग स्नातको को नौकरी पर रखा| आज भी जब भारत के तमाम कार्पोरेट घराने पारिवारिक प्रबंधन से संचालित होते हैं, तो सत्तर के दशक के भारत में यह बहुत बड़ी बात थी, जिसके साथ बहुत बड़ा जोखिम भी जुड़ा था, पर अजीम तो सबकुछ सिर्फ और सिर्फ “उत्कृष्ट” चाहते थे, अपने भावों को शब्द देते उन्होंने कहा भी “उत्कृष्टता सिर्फ दिमाग से नहीं, बल्कि दिल और आत्मा से भी सोचो तब आती है”
अजीम के लिए व्यवसाय दिमाग से नहीं दिल और आत्मा से होता था, जहाँ कठिनाइयों नजर नहीं आती नज़रों में बस अपने आदर्स बसे होते है, यही वजह थी कि 1979 में जब कंपूटर मशीन की दिग्गज कंपनी आईबीएम् को भारत छोड़ना पड़ा तो उससे उपजे शून्य को भरने के लिए अजीम की “विप्रो कारपोरेशन” ने वनस्पति तेल के धंधे से कंपूटर निर्मार्ण में छलांग लगा दी | अजीम का यह निर्णय इतनी बड़ी बात था कि भारत में विप्रो कारपोरेशन के विकास की कहानी कंपूटर उद्योग के विकास की कहानी है |
दो मिलियन डालर के सालाना धंधे से शुरुआत करते हुए आज अजीम की कंपनी का व्यवसाय 8 बिलियन डालर सालाना का है, पर आज भी अज़ीम और उनकी कसक जस की तस है, बेशक अजीम अपनी पढाई अधूरी छोड़ने को मजबूर हुए पर 2 मिलियन की हजार गुनी रकम अर्थात 2 बिलियन डालर की रकम अज़ीम प्रेमजी ने बच्चो की पढ़ाई से जुड़े कार्यो के लिए 2010 में दान की, अज़ीम प्रेमजी की कसक अभी बाकी है, उनकी जिंदगी लम्बी चले यह दुआ है |
अजीम के जीवन की रोचक बातें :
·         अजीम का परिवार गुजरात के कच्छ इलाके से है, ये इस्माइली मुसलमान है |
·         अजीम के पिता को बंटवारे के वक़्त जिन्ना ने पाकिस्तान में बसने औए वहां के वित्तमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे अजीम के पिता एम एच प्रेमजी ने नकार दिया
·         अजीम के दादा एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे, उन्हें “बर्मा का राइस किंग” भी कहा जाता है
·         1999 से 2005 तक लगातार छः वर्ष तक फ़ोर्ब्स के अनुसार अज़ीम सबसे अमीर भारतीय थे
·         दुनिया के साठ देशो में विप्रो का कारोबार फैला है, जिसमे डेढ़ लाख कर्मचारी है
·         “विप्रो” ब्रांड “वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्टस लिमिटेड” का संक्षित नाम है
·         2013 तक अजीम अपनी कुल संपत्ति का एक चौथाई दान कर चुके है    
·         “टाइम” पत्रिका द्वारा अज़ीम को दो बार, 2004 और 2011 में, दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया जा चुका है, “एशियावीक” ने 2000 में उन्हें दुनिया के सर्वाधिक प्रभावी बीस लोगों में शुमार किया
·         अज़ीम जीवन में सादगी को महत्वपूर्ण मानते है और हवाई यात्राए “मितव्ययी श्रेणी” अर्थात इकोनामी क्लास में करते है, किसी शहर में अगर उनकी कंपनी का गेस्टहाउस हो तो होटल की बजाय गेस्टहाउस में रुकना पसंद करते हैं
·         शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत अजीम प्रेमजी फाउन्डेशन भारत के सात राज्यों के तीन लाख से जादा स्कूलों में कार्यरत है  
सम्मान और पुरस्कार :
·         2005 में पदम् भूषण भारत सरकार द्वारा
·         2011 में पदम् विभूषण भारत सरकार द्वारा
·         फैराडे मेडल पाने वाले पहले भारतीय
·         “लीजन ऑफ़ आनर” फ़्रांस की सरकार द्वारा 
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कश्यप किशोर मिश्र 

Thursday, July 17, 2014

दो जर्मन राजकुमारियाँ और रुसी क्रांति


दो जर्मन राजकुमारियाँ और रुसी क्रांति


एलिस के लिए जीवन जख्मो के साज से निकलता दर्दनाक सुर था, बेशक वह राजकुमारी थी, पर जबसे उसने होश सम्हाला, अकेलापन, दुःख और विछोह जैसे भाव उसके जीवन में निरंतर संगी बने रहे | इसके बाद भी जीवन उसके लिए कोमलतम भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम था, अपने दर्द को भूल दूसरो की पीड़ा से मर्माहत हो उठने वाले दयालुता के भाव से वह ओतप्रोत थी
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एलिस की बड़ी बहन एलिजाबेथ, के लिए जीवन विधाता के गूढ़ अर्थ को समझने का नाम था, स्वभाव से संत एलिजाबेथ के लिए दीन दुखियो की सेवा, भूखो को भोजन, रोगियों का इलाज, परमार्थ के कार्य वो कुंजी थे, जिनसे विधाता के दिए जीवन के गूढ़ अर्थ सहज हो उठते थे| एलिजाबेथ हालाकि राजकुमारी थी, पर उसका जीवन त्याग से रोशन था |

दोनों बहने जर्मन राजकुमारियां थी, जिनका ननिहाल इंग्लॅण्ड का राजपरिवार था और वे महारानी विक्टोरिया की नातिन थी| माँ की मृत्यु के बाद दोनों बहनों का लालन-पालन इंग्लॅण्ड में हुआ | दोनों बहनों की शादी रूस के राज परिवार में हुई और नियति ने उनके लिए रूस में एक त्रासद और अकल्पनीय अंत की पटकथा लिखी थी |

एलिस और एलिजाबेथ बहनों का त्रासद अंत, बोल्शेविक क्रांति के नाम पर गढ़े गए सफ़ेद झूठ का एक ऐसा पृष्ठ है, जिसकी सच्ची कहानी, कम्युनिष्ट और उनके क्रांति के झूठे दावों पर सिर्फ नफ़रत के भाव पैदा करती है, एलिस और एलिजाबेथ बहनों की कहानी, रुसी क्रांति के नाम पर की गई न जाने कितनी निर्मम और बर्बर हत्याओं का शर्मनाक इतिहास है, जिससे मानवता शर्मशार हुई |


एलिस का जन्म जर्मनी में हुआ था, राजकुमारी एलिस जब महज आठ बरस की बच्ची थी, उसकी माँ चल बसी, आठ साल की बच्ची एलिस एक शांत, गमखोर और अंतर्मुखी बच्ची थी, जिसकी दुनियाँ बस माँ तक सिमटी थी, लिहाजा माँ की मौत के साथ ही वह अपने परिवार में ही अजनबी बन गई इस अजनबीपन से उसे उसकी नानी और इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने उबारा, महारानी विक्टोरिया अपनी मातृविहीन नातिन को अपने साथ लेती आई यह बच्ची इतनी प्यारी थी कि महारानी विक्टोरिया के प्राण इस बच्ची में बसते थे | एलिस के लिए भी अब दुनिया बस उसकी नानी तक सिमटी हुई थी| 


समय के साथ-साथ एलिस बड़ी हुई, पर वह थी अंतर्मुखी और संकोची ही | राजकुमारी होते हुए भी उसकी आवाज में राजकुमारियो वाली कड़क कतई नहीं थी, उसकी आँखे एक हिरनी सी मासूमियत लिए हुए थी, वह बेहद दयालू और कोमल ह्रदय थी और बस अपने में सिमटी रहती थी |

एलिस की बड़ी बहन एलिज़ाबेथ का विवाह रूसी राजकुमार सेर्गेई से हुआ था, एलिजाबेथ का स्वभाव कोमल और दयालुतापूर्ण था, एलिस और एलिजाबेथ के स्वभाव का यह साम्य, एलिस को एलिजाबेथ के साथ सूकून पहुचता था, लिहाजा 1889 के दौरान छः हफ्तों के लिए एलिस अपनी बहन एलिजाबेथ के पास रूस आई, यह एलिस की पहली रूस यात्रा थी |

सर्गेई और एलिजाबेथ का विवाह जून-1884 में हुआ था, राजपरिवार का सदस्य होने के बाद भी सर्गेई और एलिजाबेथ का आचरण संतो की तरह आध्यात्मिक था, सांसारिक आमोद प्रमोद से दूर सर्गेई और एलिजाबेथ सहज जीवन जीते थे और राज और उसके वैभव से निस्पृह ही रहते थे | एलिस को उनके साथ रहना बहुत भला लगा | पर एलिस के इस रूस प्रवास की जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी वह थी निकोलाई से एलिस की मुलाकात |

निकोलाई, सर्गेई के बड़े भाई और रूस के सम्राट अलेक्सांद्र तृतीय का बेटा था, अर्थात सर्गेई का भतीजा| एलिस और निकोलाई ने जब एक दूसरे को पहली बार देखा, तभी दोनों एक दूसरे की तरफ बेतरह आकर्षित हो गए, निकोलाई रुसी ताज का उत्तराधिकारी था पर स्वभाव उसका अपने पिता के विपरीत अपने चाचा से भी कोमल था, उसे किताबें पढ़ना, संगीत और परिवार के साथ समय बिताना पसंद आता था, राज काज से जुड़े कार्य उसके लिए महज उत्तरदायित्व की पूर्ति थे |

निकोलाई और एलिस की यह मुलाक़ात, जो बड़े कम समय तक के दौरान हो पाई पर इसने दोनों के दिल एक दूसरे से जोड़ दिए | रूस से वापस लौटने के बाद एलिस रुसी भाषा और तौर तरीके सिखने लगी, उसने निकोलाई को अपने लिए चुन लिया था, इधर वही हाल निकोलाई का भी था, पर दुर्भाग्य से एलिस की नानी महारानी विक्टोरिया और निकोलाई की माँ महारानी मरिया दोनों इस विवाह के पक्ष में नहीं थी |

महारानी विक्टोरिया अपनी सबसे चहेती नातिन, जिसे वो स्नेह से “सन्नी” बुलाती थी, का विवाह रूस जैसे अबूझ और रहस्मय देश में नहीं करना चाहती थी, लिहाजा प्रेमी जोड़ों ने अपने प्रेम को समय पर छोड़ दिया| चार वर्ष बाद रूस के सम्राट अलेक्सांद्र गंभीर रूप से बीमार पड़े और उनका बचना अब संभव नहीं था, लिहाजा सिहासन के उतराधिकारी का सवाल उठा, पर भावी सम्राट तो विवाहित ही नहीं था, लिहाजा निकोलाई के विवाह की बात उठी, निकोलाई एलिस के नाम पर अड़ गए और आखिरकार निकोलाई और एलिस एक हो गए|

शीघ्र ही निकोलाई रूस का ज़ार बन गया और एलिस रूस की महारानी, जिसे अलेक्सांद्रा का नाम दिया गया, एलिस की बड़ी बहन एलिजाबेथ और उसके पति सर्गेई, क्रेमलिन में साथ ही रहते, सर्गेई मास्को के गवर्नर जनरल भी थे, दोनों बहने जर्मन थी और दोनों संकोची दोनों के पति भी शालीन और मृदुल स्वभाव के थे, लिहाजा यह परिवार कुलीन परिवारों से जरा सिमटा-सिमटा अपने आप में रहता, जिसे उनका जानबूझ कर दूरी बनाना समझा जाता, वैसे भी एलिजाबेथ और सर्गेई संतो सा जीवन जीते थे, लिहाजा राजपरिवार के आमोदी जीवन से एक दूरी बना कर रहते थे, जबकि निकोलाई के लिए राज्य महज एक उत्तरदायित्व था |

वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा और बीसवी सदी के साथ साथ रूस एक बार फिर विद्रोह के मुहाने पर था, सर्गेई के पिता की हत्या विद्रोही आतंकियों ने 1881 में बम से उड़ा कर कर दी थी, सर्गेई उस पीड़ादायक दौर से गुजरे थे, उनकी आँखों के सामने अपने पिता का “क्षत विक्षत शव” घूमता रहता, उन्हें पता था, आतंक को ढील देने का अंजाम क्या होता है, लिहाजा वह उनसे कड़ाई से निपटना चाहते थे, पर उनके भतीजे और रूस के सम्राट निकोलाई द्वितीय बगावतियों से कड़े रवैये के पक्षधर नहीं थे, लिहाजा सर्गेई ने पहली जनवरी-1905 को गवर्नर जनरल के पद से इस्तीफ़ा दे दिया| सर्गेई अब राजनीति से दूर रहना चाहते थे, उन्हें पता था, बगावती उन्हें जिन्दा नहीं छोड़ेगे, उन्होंने अपने पिता की हत्या देखी थी, जिसमे उनके साथ तमाम अन्य भी हताहत हुए थे, लिहाजा सर्गेई अपने साथ कम से कम लोगों को रखते थे |

4 फरवरी 1905 को दिन के दो बजे सेर्गेई अपनी बग्घी पर क्रेमलिन से निकले, बग्घी में उनके और कोचवान के अलावा कोई नहीं था| सर्गेई अपने साथ किसी की ज़िंदगी खतरे में नहीं डालना चाहते थे, कि एक जोरदार धमाका हुआ | सर्गेई की बगावतियों ने बम से हत्या कर दी, उनके शरीर के अवशेष एक किलोमीटर के दायरे में बिखर गए थे, जिन्हें इकठ्ठा कर उनका अंतिम संस्कार किया गया |


एलिजाबेथ ने अपने पति के हत्यारे को माफ़ कर दिया था, वह उससे मिलने जेल में गई थी अपने साथ वह हत्यारे के लिए जीसस का चित्र और इंजील ले गई थी, एलिजाबेथ ने सम्राट से विनती भी की कि उसके पति के हत्यारे को माफ़ कर दिया जाए पर सम्राट और उसकी छोटी बहन के पति निकोलाई ने हत्यारे को माफ़ी देने से इन्कार कर दिया| इस घटना से महँ साहित्यकार टालस्टाय भी मर्माहत हो उठे थे | 


अपने पति की हत्या के बाद एलिज़ाबेथ ने अपने आप को पूरी तरह परोपकार में अर्पित कर दिया, एलिजाबेथ ने अपने महल और आभूषण बेच डाले और इन पैसों से अस्पताल और अनाथालय और नारी-निकेतन खोल कर ख़ुद इनकी ज़िम्मेदारी सम्हाल ली, यहाँ यहाँ अनाथालय, अस्पताल, दवाखाना और भोजनालय भी था जहाँ दीन-दुखियों को न सिर्फ भोजन और वस्त्र दिए जाते बल्कि उनका इलाज भी किया जाता था | 

अब एलिजाबेथ का जीवन एक तपस्विनी का जीवन था वह गंभीर रोगियों की सेवा करती, उनके आश्रम में जो उनकी सहायिकाए थी, वह अन्य धार्मिक माथो के विपरीत धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ चिकित्सा की पढाई भी करती थी आश्रम में कुछ साल काम करने के बाद वे सांसारिक जीवन में लौट सकती थीं| एलिजाबेथ पेशेवर भिखारियों या शराबियो के परिवारों में जाकर उन्हें मनाकर, उनके बच्चो को आश्रम ले आती जहां उनका ढंग से लालन-पालन होता वे पढ़ते लिखते| इस काम के लिए एलिजाबेथ अपनी सहायिकाओं के साथ स्वयं मास्को के निचले तबके की सबसे गंदी और अपराधों के लिए बदनाम बस्ती “खित्रोव रीनक” में जाया करती |


दोनों बहने साथ होते हुए भी अलग अलग थी, उनके अवसाद अलग थे उनके कष्ट अलग थे और जीवन की गति भी अलग ही चल रही थी, पर प्रथम-विश्वयुद्ध के साथ दोनों बहनों की किस्मत एक बार फिर एक ही मोड़ पर आ मिली|


रूस प्रथम-विश्युध में शामिल था, ज़ार निकोलाई अपने परिवार से कहते “तुम जितने ऊँची जगह हो, उतना त्यागमय भी होना होगा और वह भी बिना किसी को अपना परिचय दिए हुए” लिहाजा महारानी अलेक्सांद्रा अर्थात एलिस और उनकी चारों बेटियों ने अपना जीवन दया-कार्यों को अर्पित कर दिया | महारानी और उनकी दो बेटिया नर्स बन गई, वे घायल सिपाहियों के मवाद से भरे और बदबूदार घावों की सफाई करती, उनकी सेवा करती बिना यह बताये कि वह कौन है, इधर एलिजाबेथ ने रूसी सेना की सहायता के लिए विशेष टुकड़ी का गठन किया जो अस्पतालों में रूसी सैनिकों और घायल युद्धबंदियों की तीमारदारी करती | 

एक तरफ एलिस और एलिजाबेथ अपने सारे सुख त्याग, घायलों और रोगियों की सेवा में ख़ुद को अर्पित किये हुए थी, जबकि रुसी जनता के लिए उनकी महारानी का जर्मन होना एक मुद्दा बन गया, विश्वयुद्ध में रूस जर्मनी से लड़ रहा था, लिहाजा रुसी जनता महारानी के जर्मन होने की वजह से उनके खिलाफ हो गई, प्रारंभ से थोड़े बहुत विरोध से हुई शुरुआत समय के साथ-साथ महारानी के खिलाफ तीव्र अशंतोश में बदल गई, रुसी जनता ने बिना किसी वजह के यह मान लिया कि जर्मन होने की वजह से महारानी की सहानुभूति जर्मनों के साथ है, इधर रूस युद्ध में कमजोर पड़ रहा था | 

साथ ही रूस गृहयुद्ध से भी झुलस रहा था, बगावत के स्वर प्रबल होने लगे थे, विरोधियों का सबसे बड़ा धड़ा जो बोल्शेविको का था, उसने युद्ध से नाराज जनता के असंतोष को भड़का रूस को गृहयुद्ध में झोक दिया, रूस के लिए यह एक विकट स्थिति थी, भीतर वह बगावती लोगों से गृहयुद्ध लड़ रहा था और बाहर विश्वयुद्ध में जर्मनी के विरुद्ध लड़ रहा था, लिहाजा जार निकोलाई द्वितीय ने सिंहासन त्यागने का निर्णय कर लिया | बगावती क्रांतिकारियों ने ज़ार परिवार को पीटर्सबर्ग से पहले तोबोल्स्क और फिर वह से येकातेरिनबर्ग ले जा कर एक मकान में में नज़रबंद कर दिया | उनके साथ उनका एक चिकित्सक और उनके तीन सेवक भी नजरबन्द थे | 

एक छोटे से कमरे में ज़ार और उनके परिवार को उनके तीन सेवको और सेवको सहित बंद रखा जाता था और खाने तथा व्यायाम के अतिरिक्त अन्य किसी समय बाहर जाने की उन्हें इजाज़त नहीं थी | इधर सत्ता परिवर्तन के बाद एलिजाबेथ को इंग्लैण्ड के राज परिवार ने रूस छोड़ इंग्लैण्ड चले आने को कहा, जबकि जर्मन राजपरिवार उन्हें जर्मनी चले आने को कह रहा था, पर एलिजाबेथ ने रूस छोड़ने से मना कर दिया| 1918 के वसंत में एलिजाबेथ को भी बोल्शेविकों ने गिरफ्तार कर के पेर्म में नजरबन्द कर दिया |


निकोलाई ने स्वयं सत्ता त्याग ख़ुद को बगावती लोगों को सौप दिया था, उन्होंने ऐसा इस वजह से किया था, कि बिना किसी खून खराबे के सत्ता-त्याग देने से बगावती उनके परिवार के साथ कुछ नहीं करेंगे, पर 1917 में हुई अक्टूबर क्रांति से सत्ता में  लेनिन के नेतृत्व में आई बोल्शेविक पार्टी राजतंत्र की न सिर्फ कट्टर विरोधी थी, बल्कि वह राजवंश का नामोनिशान मिटा देना चाहती थी, लिहाजा बोल्शेविक शासन ने ज़ार, उसके परिवार और उनके सारे रिश्तेदारों समेत सम्पूर्ण राजवंश के रक्त का नामोनिशान मिटा देने का क्रूर निर्णय ले लिया|


16-17 जुलाई 1918 की रात के दो बज रहे थे, कमरे में ज़ार निकोलाई उसकी पत्नी अलेक्सांद्रा अर्थात एलिस जार की चार बेटियाँ ओल्गा, तत्याना, मरिया और अनस्तसिया, और बेटा अलेक्सेई जो एक भयानक आनुवंशिक रोग “हेमोफीलिया” से ग्रस्त था, जिसमे रक्तवाहिकाएं कमज़ोर होती हैं और फटती रहती हैं जिससे खून बहने लगता है, अपने तीनो सेवको और चिकित्सक समेत गहरी नीद में सो रहे थे | बोल्शेविक सैनिको ने उन्हें जगा कर बताया कि उन्हें दूसरी जगह भेजा जा रहा है, लिहाजा उन्हें तहखाने में चलना होगा| निकोलाई ने अपने तेरह वर्षीय बीमार बेटे को गोंद में उठा लिया, किसी अज्ञात को ज़ार परिवार समझ चुका था, पर उसने अपने आप को नियति के हाथो में छोड़ दिया| आगे आगे निकोलाई गोंद में अपने बेटे को लिए चला, उसके पीछे पीछे एलिस थी, और उसके पीछे उनकी बेटियाँ| तहखाने में पहुचते ही ज़ार परिवार समझ गया अब उनका अंत आ गया है, एलिस और बड़ी बेटी ओल्गा ने ईश्वर का नाम लेते हुए अपने सीने पर सलीब का निशान बनाया ही था, कि बन्दूक धारियों ने निकोलाई और एलिस को गोलियां मार दी, चारो बेटियों और बेटे को पहले गोलिया मारी गई फिर उन्हें संगीनें भोंक-भोंक कर निर्दयतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया |

इधर येकातेरिनबर्ग से करीब ही पेर्म में अगली रात अर्थात 18 जुलाई 1918 की रात को एलिज़ाबेथ को ज़ार परिवार के अनेक रिश्तेदारों समेत ज़िंदा ही एक खान में धकेल दिया गया, बोल्शेविक लड़ाकों ने उसके बाद खान में हथगोले फेंक दिए, कई दिनों तक एलिजाबेथ और ज़ार परिवार के अन्य रिश्तेदार अपने ज़ख़्म भूख और प्यास से उस खान में तड़प-तड़प कर मरते रहे, खान के बाहर पहरा दे रहे फौजी, घावों और भूख-प्यास से कराहते लोगों की आहें सुन मदद को करीब आने वाले आम लोगों को खदेड़ देते |

ज़ार की विश्वासपात्र सैनिको की स्वेत सेना ने, 25-जून 1918 को येकातेरिनबर्ग पर और 1919 में पेर्म पर पुनः कुछ वक़्त के लिए कब्ज़ा कर लिया, पर ज़ार के परिवार के अवशेष वे नहीं पा सके, एलिजाबेथ के शव को उस खान से निकाल पीकिंग ले जाया गया और फिर वहां से यरुशलम ले जाकर उसका विधिवत अंतिम संस्कार किया गया |

कम्युनिष्टो ने रूस की जनता से ज़ार के परिवार के हत्या की बात छुपाई और जनता से झूठ बताया गया कि ज़ार को अभियोग चला कर सजा दी गई, जबकि ज़ार के परिवार को सुरक्षा की दृष्टि से वह से हटा दिया गया है, रूस की जनता ज़ार परिवार की या ज़ार की हत्या के पक्ष में कतई नहीं थी और यह खबर बाहर जाने पर जनमानस कम्युनिष्टो के विरुद्ध हो सकता था |

मानवता की बड़ी बड़ी डींग हांकने वाले कम्युनिष्टो ने यह सफाई कभी नहीं दी कि “महान अक्तूबर क्रांति” के बाद कम्युनिष्ट शासन को एलिस- एलिजाबेथ उनकी मासूम बेटियों और तेरह साल के बच्चे से क्या ख़तरा था? अगर कम्युनिष्ट वाकई रुसी जनता की अकांक्षाओ के प्रतिनिधि थे तो रूस की जनता से लम्बे समय तक ज़ार परिवार के क़त्ल की बात क्यों छुपाई गई, वस्तुतः कम्युनिष्टो ने इस हत्या को रुसी जनता के सामने कभी नहीं स्वीकारा, ये बाते अपने आप उभर आई, ज़ार परिवार को गोली मारने वाले सैनिको ने इन बातों को जाहिर किया, कम्युनिष्ट शासन ने हमेशा इस हत्या को छिपाने का यत्न किया |

कम्युनिष्ट तमाम कोशिश के बाद भी ज़ार को रुसी जनमानस के मन से निकाल नहीं पाए, रुसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने एलिज़ाबेथ को “यातनाएं सहती रही हुतात्मा संत” घोषित किया जबकि एलिस उसकी चारो बेटियों बेटे और निकोलाई को रुसी चर्च द्वारा “संतत्व” की उपाधि प्रदान की गई |


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कश्यप किशोर मिश्र 


जनज्वार में प्रकाशित लेख का लिंक ;- दो जर्मन राजकुमारियाँ और रुसी क्रांति

Monday, July 7, 2014

गुन-गुन गीत

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बरसो पहले, अपने ग्रेजुएशन के दौरान, शाम को ट्यूशन पढ़ाने निकलता और रात दस बजे तक ट्यूशन ख़तम करके लौटते वक्त, गोरखपुर के रेती रोड पर एक अपाहिज भिखारी को देखता था | दुकानों के सामने, फूटपाथ पर वह अपने चीथड़ो में समाये, बगल में खडी अपनी व्हील चेयर से ख़ुद को टिकाये और प्लास्टिक की पन्नियो और कचरे का अलाव जला, उसकी गरमी के सहारे, रात गुजारने की जुगत में लगा रहता था | गर्मियों में तो अक्सर, और जाड़ों में कभी-कभी हमारी आँखे आपस में मिलती, उसकी आँखे काफ़ी बड़ी और गोल थी, एक अज़ब सी कशिश भी थी उन आँखों में और वो जीवन से भरपूर थी ! मै उसे देखता और वह मुझे और एक बड़ी सी मुस्कराहट वह मेरे लिए देता, जबाब में मै भी मुस्कुरा देता |

इस स्मृति के अवांतर, एक अन्य स्मृति है, जो सन दो हजार दो (या फिर सन चौरानबे भी हो सकता है ) की सर्दियों से जुडी है | बेतियाहाता से गोलघर आते, बीते पाच-सात दिन से एक किशोर को, लाल बहादुर शास्त्री चौराहे पर, सेंट एंड्रूज कालेज के गिरिजाघर वाली पटरी पर पड़े देख रहा था, उसका पैर घायल था और वह पटरी पर घायल पड़ा हुआ था, उसके सामने चुक्कड़ में चाय या पानी पड़ी रहती, शरीर पर मक्खियाँ भिनभिनाती रहती और लोगो की इकट्ठी की लकड़ियों का अलाव जलता रहता, पर यह बस पांच छः दिन से ही था, उसके पहले उसे वहां मैंने कभी नहीं देखा था | पच्चीस दिसम्बर की रात, जब सेंट एंड्रूज गिरिजाघर में क्रिसमस कार्निवाल हो रहा था, सेंटा क्लाज बच्चो को उपहार बाँट रहे थे, बाहर पड़ रही कड़कती ठण्ड में, वह आदमी उस कार्निवाल के शोर-शराबे को सुनता, हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया | छब्बीस दिसंबर की सुबह, जब कि उधर से मै गुजरा, ठण्ड से अकड़ी उसकी लाश उस पटरी पर पड़ी थी | उसने कोई क्रिसमस गीत नहीं गाया था, उसके होठ अकड़े थे |

अब चले जीवन से भरी मुस्कराहट वाले भिखारी की तरफ, तो सर्दिया काफ़ी पड़ रही थी और ऱोज रात लौटते उसका ठिठुरता शरीर मुझे परेशान करता, मेरी खुद की आर्थिक स्थिति बढ़िया नहीं थी, अपनी पढाई ट्यूशन के जरिये कर रहा था और खर्चे मुश्किल से पूरे पड़ते थे | एक शाम मुझसे रहा नहीं गया और मै उर्दू बाजार की एक दूकान में घुस गया, सबसे सस्ता कम्बल अस्सी रूपये का था, एक बण्डल कम्बलों का ऐसा था, जिसे चूहों ने किनारे कुतर दिया था, थोडा किनारे कुतरा कम्बल दूकानदार चालिस रूपये में देने को तैयार हो गया, यह दूकानदार के लिए राहत की बात थी कि जिस माल से उसे कुछ नहीं मिलना था, उससे उसे कुछ मिल गया, पर मेरे लिए बहुत बड़ी राहत की बात थी |

उस शाम, उस कम्बल को साथ लिए मै ट्यूशन पढ़ाने गया और जानबूझ कर लौटते हुए, मैंने ग्यारह से जादा बजा दिए, सड़क एकदम ख़ामोश थी, धुंध अपनी चादर फैलाये हुए थी और स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी, ठण्ड को और ठंडा बना रही थी | भिखारी अपने सामने अलाव जलाये अपनी गुदडी में समाया सिमटा सा सो रहा था, मैंने पहले कम्बल उसके पहलू में सटा कर रखा, पर तेज पड़ रहे पाले ने मुझे रोक दिया, मैंने ख़ामोशी से कम्बल खोला, उसे उढ़ा दिया |

अगली रात मै लौट रहा था, सड़क खाली थी, मै अपनी जेबों में हाथ डाले लौट रहा था, हमारी आँखे मिली, उसकी आँखों में हमेशा की तरह बड़ी मुस्कराहट थी, हमारे बीच कभी कोई मौखिक-संवाद नहीं हुआ था पर उस रात जैसे ही मैंने उसकी ओर देखा, उसने कहा "रात नींद बहुत अच्छी आई, कोई ये कम्बल दे गया" |

...मुझे यह एक गुनगुन गीत सा लगा !

जब भी ठण्ड आती है, मुझे यह गुनगुन गीत याद आता है और अवांतर स्मृति उन मृत होठो की आती है |
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कश्यप किशोर मिश्र

Monday, June 30, 2014

जो है !

जो है !
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ख़ामोशी का शोर, बहुत गहरा होता है,
बड़ी टीस पहुचाती है, भुरभुरी बर्फ सी चुप्पी|

चुप्पी ढंक देती है,प्रतिरोध की असल सूरत |
कुछ भी नहीं बदलता, प्रतिरोध रहता है, जस का तस |

बस एक परदा चढ़ जाता है, ख़ामोशी का |
जैसे पसर जाती है, बर्फ दूर दूर तक,
जो भी होता है, उसे वैसे ही रखे, बस ढक कर |

चुप्पी का यह परदा, बहुत डराता है, सोने नहीं देता रात रात भर|
गो की, भिची मुठ्ठियों से प्रतिरोधी नारे लगाते चेहरे चीन्ह लिए जाते है, आसानी से|
ख़ामोशी के परदे तले, फैलते प्रतिरोध चीन्हे नहीं जाते |
ये कितने गहरे है, पता ही नहीं चलता |

और एक दिन !
सर्कस का जोकर,
शो के बाद,
या हो सकता है शो के दौरान ही,
अपना मुखौटा उतार फेकता है,
उसके हाथ में है, ख़ामोशी से बना खंजर,
(ख़ामोशी दुनिया की सबसे कठोर वस्तु है,
यह बात किताबों में पढ़ानी खतरनाक मानी जाती है)
जोकर इस खंजर से कलेजा चाक कर देता है |
और अपना मुखौटा पहन लेता है |

शो चलता रहता है !

...तुम जिस विदूषक पर हँस रहे थे
वह ख़ामोशी की बर्फ तले हत्यारा था |

अरे !
तुम्हारी तालियाँ रुक क्यों गई ?
तुम्हारी हंसी को क्या हो गया ?
ओह !
तुम खामोश भंगिमाओ की नक़ल कर रहे हो,
है न ?
करो करो !!!
______________
कश्यप किशोर मिश्र

Tuesday, June 3, 2014

एक आम आदमी का ख़त, प्रधानमंत्री के नाम

माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी जी,

इस देश के एक नागरिक के तौर पर मै अपने प्रधानमंत्री को, उनके निर्वाचन पर बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ, वह यकीनी तौर पर, किसी व्यक्ति, जाति, राज्य या सम्प्रदाय के प्रधानमंत्री न होकर, पूरे मुल्क के प्रधानमंत्री होंगे और एक भारतवासी के तौर पर हमें अपना सर गर्व से ऊँचा रखने का मौका प्रदान करेगे, कि हमने जिस व्यक्ति को अपने प्रधानमंत्री के रूप में निर्वाचित किया है, वह लोकतंत्र की हमारी अधूरी समझ का नतीजा नहीं है, बल्कि भारत का मतदाता और लोकतंत्र समय के साथ-साथ परिक्व हो चुका है और उसके चयन में, समय के साथ-साथ खामियां कम से कमतर होती जा रही है|

प्रधानमंत्री जी, आपने अपने संसदीय क्षेत्र के रूप में दुनिया के सर्वाधिक प्राचीन शहर बनारस का चयन कर, हमारे भीतर एक उम्मीद की लौ जगाई कि आपके बनारस का चयन करने के पीछे की वजह, इसका महज एक संसदीय क्षेत्र न होकर, मानवता की सतत जिजीविषा के प्रतीक रहे शहर के साथ जुड़ने की चाह भी रही होगी| एक ऐसा शहर जो सतत-निरंतर अनादी काल से मानव-सभ्यता के उत्थान-पतन के साथ साथ अविचल रूप से जुड़ा रहा| बनारस सिर्फ एक शहर, संस्कृति या समाज नहीं है, बल्कि उससे जादा एक भाव है| हमें उम्मीद है मनुष्य जाति के सतत-निरंतर अविचल शंघर्ष के भाव, बनारस को चुनने के पीछे, आपकी वजह यही रही होगी|

आपने यह कह कर हमें उद्धेलित कर दिया कि आपको
“माँ गंगा ने बुलाया है” एक माँ का ह्रदय अपने बच्चो को सदैव ही बुलाता रहता है, आपने माँ गंगा की पुकार सुनी, उनका ख्याल किया हम इसके आभारी है|

प्रधानमंत्री महोदय, संसद में प्रवेश करने के पूर्व जब आपने संसद की सीढ़ियों पर अपना माथा टिकाया, तो आपने इस देश की सवा अरब आबादी के लोकतान्त्रिक अधिकारों की उम्मीद पर भी एक टेक लगाईं| आपके लोकतंत्र के मंदिर की सीढ़ियों पर सादर माथा टिकाने ने, हमें आश्वस्त किया कि हमारा प्रधानमंत्री, इस देश के किसी भी नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार को अपनी टेक देगा, भले ही इसके लिए एक व्यक्ति के तौर पर नरेंद्र भाई मोदी को झुकना भी क्यों न पड़े, लोकतंत्र को दी गई इस प्रतीकात्मक टेक पर हमने बड़े गर्व से अपने भारत के प्रधानमंत्री को देखा, सराहा|

शपथ के पूर्व आपका गाँधी समाधि पर जाना और महात्मा गाँधी को श्रध्दा-सुमन अर्पित करना, उन गांधीवादी मूल्यों को पुनः वैद्यता प्रदान करना था, जिसका आधार समरसता, सहिष्णुता, समानता, बंधुत्व और समदृष्टि जैसे भाव होते है| हम यह यकीन करते है, कि सत्य के इन आधारभूत मूल्यों का सम्मान करने को आप सतत सजग रहेगें|

प्रधानमंत्री जी, निश्चय ही देश की जनता, जनतांत्रिक प्रतीकों से प्रभावित होती है और अपने नायकों के समान आचरण की कोशिश भी करती है, लिहाजा यह जरूरी हो जाता है कि अपने निर्वाचन के पूर्व, दौरान और ठीक बाद एक निर्वाचित शासक जिन जनतांत्रिक प्रतीकों और मूल्यों का प्रतीक रूप में इस्तेमाल करता हो, उन्हें अपने शासन के दौरान अपने व्यवहार में भी अमल करता हो| ऐसा होने पर न सिर्फ उस शासक पर जनता की निष्ठा बलवती होती है, बल्कि एक नागरिक के तौर पर ऐसे राष्ट्र के नागरिकों के आचरण में भी जनतांत्रिक मूल्यों के सम्मान की भावना बलवती होती है|

लिहाजा जनतांत्रिक प्रतीकों के सांकेतिक सम्मान के पश्चात आचरण से भी तदनुरूप ही जनतांत्रिक मूल्यों का संवर्धन करना, किसी देश के नागरिको के आचरण में भी गुणात्मक वृद्धि करता है|

प्रधानमंत्री जी, दुनियां के सबसे बड़े जनतांत्रिक मुल्क का नागरिक होने के बाद भी, बीते चौदह बरस से एक महिला ख़ामोशी से, बड़े ही लोकतान्त्रिक तरीके से अपने लोकतान्त्रिक हक़ के लिए सत्याग्रह रत है| यह आश्चर्य की बात है कि एक महान लोकतंत्र होने का दावा करने वाले हमारे मुल्क में, बीते चौदह बरस से, एक औरत जो बेहद विनम्रता से अपनी बात कहना चाहती है और सत्याग्रह कर रही है, उसकी बात कोई सुन ही नहीं रहा| इस देश की एक नागरिक बड़ी ही विनम्रता से अपनी बात कहना चाहती है और इसके लिए उसके सत्याग्रह की, इस मुल्क के शासक वर्ग में, कही भी कुछ भी कोई पूछ ही नहीं है|

आमरण अनशन पर बैठी एक महिला के इरादों का दमन करने को बड़े ही पाशविक जतन किये गए| कोशिशे होती रही वह थक-हार कर टूट जाए पर बजाय टूट जाने के वह महिला मानवता की सतत जिजीविषा की प्रतीक-बनारस बन गई| इस महिला ने टूटने से इन्कार कर दिया, इसे जबरजस्ती नाक में नली के जरिये तरल पदार्थ देकर, इसका अनशन तोड़ने की कोशिश हुई, पर यह महिला, इस महान मुल्क की महान मातृशक्ति का प्रतीक बन अड़ गई| इसका अनशन सिर्फ अपने लिए थोड़े था, यह तो मणिपुर, जो इसका गृहराज्य है, के बच्चे-बच्चे के लिए था, यह मणिपुर की आवाज बनारस बन गई, इसने टूटने से इन्कार कर दिया, अविचल हो गई| यह एक शरीर से एक भाव बन गई, सम्पूर्ण मणिपुर के जनतांत्रिक अधिकार की मांग का भाव, यह मणिपुर में बनारस बन गई|

प्रधानमंत्री जी, यह महिला कविताएँ लिखती थी, जिसमे भावों की लहर बनती बिगड़ती दिखती, गंगा की लहरों की ही तरह| इसका मन एक माँ का मन था, कोमल और सबको प्यार करने वाला, यह जीवनदायनी भावों से अभिप्रेरित थी, गंगा की तरह ही| इसका ह्रदय भी अपने बच्चो को पुकारता था, जैसे माँ गंगा ने आपको पुकारा था, पर दुर्भाग्य से इस माँ के बच्चो में से तमाम बच्चे, निरपराध ही, बस शक के आधार पर, सेना द्वारा मार दिए गए| इस माँ के तमाम बच्चे, अपनी माँ की पुकार सुनने को बचे ही नहीं थे| 

इस माँ की तमाम बेटियों ने बलत्कृत हो आत्महत्या कर ली| प्रधानमंत्री जी, जिस माँ की बेटियाँ बलत्कृत हो जाये उसके लिए कुछ बचा नहीं रह जाता, वो नंगी हो जाती है, शरेआम| 15-जुलाई-2004 की दोपहर जो घरेलू औरते “भारतीय सेना आओ हमारा बलात्कार करो” का नारा लगाते और यही नारे लिखे परचम लहराते असम राइफल्स के मुख्यालय पर एकदम नगी खड़ी हुई, वो इस आमरण-अनशन पर बैठी महिला के भाव की सामूहिक अभिव्यक्ति मात्र न होकर, नग्न खड़ी हमारी भारत माँ भी थी| आजाद भारत के लिए यह सबसे शर्मशार करने वाली बात थी, जब इस मुल्क की जननी अपने जनों के सामने नग्न खड़ी थी, “आओं हमारा बलात्कार करो” कहते पर न उन औरतो की आवाज सुनी गई न गंगा बन सत्याग्रह कर रही इस महिला की आवाज सुनी गई|

प्रधानमंत्री जी, इस महिला के सवाल बड़े सरल है, उदार मन से, ईमानदारी पूर्वक इन्हें सुना जाए तो इनका जबाब इस मुल्क के एक बच्चे के पास भी है, बस नियत में खोट न हो| यह औरत जानना चाहती है, भला वह कौन सा जनतंत्र है, जो बस शक के आधार पर अपने नागरिको के एक तबके को गोलियों से भून देने वाली सेना पर कोई सवाल न उठाने का विशेषाधिकार देता है| प्रधानमंत्री जी, यक़ीनन किसी मुल्क में, उसके शासको का जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान होता है, पर उससे महत्वपूर्ण वह नागरिक चेतना होती है जो जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरक्षण को अपनी टेक देती है| लिहाजा जब आप संसद भवन की सीढ़ियों पर अपना शीश टिका, इस देश के किसी भी नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार को अपनी टेक दे रहे थे, तो आपकी टेक के साथ एक टेक इस सत्याग्रही मणिपुरी महिला की भी थी|

प्रधानमंत्री जी, यह महिला आंदोलनरत है, आमरण अनशन पर है, पर अपनी बात कड़े लहजे में कहने से इन्कार करती है, अपने सत्याग्रह के जरिये यह कोई भी अराजकता नहीं पहुचाना चाहती, अपने आन्दोलन से यह किसी को कष्ट या ठेस भी नहीं पहुचाना चाहती, किसी को सजा दिलवाना भी, इस महिला के अनशन का उद्देश्य नहीं है, बल्कि किसी को उसकी वजह से कोई कष्ट या नुकसान ना हो, इसका ध्यान रखना, इस दशा में भी, वह अपना दायित्व समझती है| प्रधानमंत्री जी, गाँधी जी की आत्मा का वास उनकी समाधि पर हो न हो, पर हमारे देश की इस महान माँ में बापू की आत्मा का वास अवश्य है |

प्रधानमंत्री जी, जरा सोचिये! आपके निर्वाचन के दौरान चुने गए समूचे जनतांत्रिक प्रतीकों को यह एक अकेली महिला जिसे हम “शर्मिला ईरोम” के नाम से जानते है, अपनी करनी में धारण करती है, प्रतीकात्मक संकेतो के बाद अब वक्त इन संकेतो को अपने आचरण में उतारने का आ गया है, हम भारत के लोग बड़ी उम्मीद से आपसे आस लगाये बैठे है, आप इस महिला की बात जरूर सुनेगे और बीते चौदह बरस से, एक महान जनतंत्र के नागरिक के तौर पर, हम जिस शर्मनाक सवाल से अहर्निश रु-ब-रु है, उससे हमें मुक्ति दिलायेगे |


एक नागरिक के तौर पर हम सम्मान महसूस करें, इसके लिए हमें आपसे बड़ी आशा है |

इस देश का एक आम नागरिक

कश्यप किशोर मिश्र  

Sunday, May 25, 2014

जिन्होंने बुलंद हौसलों से दी अक्षमता को मात

वीरान रेगिस्तान में दो दरवेस बैठे बात कर रहे थे, दूर-दूर तक फैले वीराने को देखते हुए पहले दरवेस ने लम्बी साँस भरी और कहा, कितना वीरान है यहाँ सबकुछ| दूसरा दरवेस जो बुजुर्ग था, वह उन पत्थरों को उललने-पुलटने लगा, जिसपर वो बैठे थे, रात की ओस पत्थरों की तली में मौजूद थी, एक पत्थर के तले एक अंकुरित बीज दिखा, बुजुर्ग दरवेस ने उसे दिखाते हुए कहा “यह देखो, यहाँ जीवन है”|

आदमी का अपना दृष्टिकोण उसकी जीवन दृष्टि तय करता है, एक ऐसा आदमी जो अपने शरीर का कोई भी हिस्सा नहीं हिला सकता, कोई इशारा नहीं कर सकता, कुछ बोल नहीं सकता, कुछ खा पी नहीं सकता, इसके बाद भी, हार मानने से इन्कार करता है और दुनिया उसे ब्रह्माण्ड की जटिल गुत्थिया सुलझाने वाले शख्स “स्टीफन हाकिंग” के नाम से पहचानती है| हाकिंग की लिखी किताब “अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम’ की एक करोड़ से जादा प्रतियां बीस वर्षो के भीतर बिक चुकी है, हाकिंग थमे नहीं है, उनकी जीवन यात्रा सतत जारी है|

एक ऐसा मनोरोगी जिसे भ्रम होता हो कि कोई उससे बात कर रहा है, वह यह समझ ही नहीं पाए कि सामने जो आदमी खड़ा है, वो असल में खड़ा है अथवा मनोविकार की वजह से उसका भ्रम है| एक ऐसा आदमी जो अपने दिमाग में विकार के वजह से, जो नहीं है, उन्हें भी उसी तरह देखता समझता हो जैसे असल दुनिया को देखता समझता हो और इस पागलपन की वजह से महज इकतीस वर्ष की उम्र में ईलाज के लिए पागलखाने भेज दिया गया हो, जीवन से हार मान लेने से इन्कार कर देता है, ग्यारह साल बाद वह पागलखाने से बाहर आता है और दुनियाँ को एक से एक गणितीय और आर्थिक सिधांत देता है और “नोबेल पुरस्कार” प्राप्त करता है, दुनियाँ “जॉन नैश” को आज उसके ढेर सारे गणितीय और अर्थशास्त्र के सूत्रों की वजह से जानती है|

कुँए की पथरीली सिल पर रस्सी बार-बार ऊपर-नीचे आती-जाती है, यह सतत-निरंतर प्रक्रिया पत्थर को घिस देती है, पथरीली जगत पर रस्सी के निशान बन जाते है, दुनियाँ ऐसे लोगो से भरी पड़ी है, जिनकी उपलब्धियां “रस्सी से पत्थर की जगत पर पड़े निशान” की तरह सतत प्रयास का नतीजा है|

हम थामस एडिसन को जानते है, जो बहरा था पर बहरापन उसके लिए अवरोध नहीं बन सका | एक नया धर्म चलाने वाले, सम्पूर्ण भारत में अपना विशाल साम्राज्य बनाने वाले, जमीनों की ठीक ठीक पैमाईस की व्यवस्था करने वाला अकबर पूरी तरह अनपढ़ था, पर लिखना-पढ़ना न जानना भी, कभी उसके लिए बाधा नहीं बन सका|
जरा कल्पना करिए उस संगीतकार की जिसका संगीत सुनकर श्रोता अपने भाव पर नियंत्रण न रख सके, एक तरफ जिसकी धुनों की उदासी सुननेवाले को रुला दे, तो दूसरी तरफ़ उसके संगीत का उल्लास, उदासी भरे माहौल में भी लोगो को नृत्य करने को मजबूर कर दे, बीती दो शताब्दियों से जादा वक्त से अपने संगीत से दुनिया को अभिभूत करने वाला संगीतकार लुडविग बीथोवन ख़ुद अपना संगीत सुनने में असमर्थ  था, पर उसका बहरापन उसकी बाधा नहीं बन सका|
जीवन वही है, जैसा उसे हम देखते है, जैसा उसे हम बनाते है, मन के हारे हार, मन के जीते जीत है |